परीक्षा के बाद होने वाली आत्महत्याएं ऐसे रूक सकती हैं

यह 3 रोक सकते हैं आत्महत्याएं

हाल ही में 12वीं के नतीजे घोषित हुए। आत्महत्याओं का दौर एक बार पुनः चल पड़ा। अनुत्तीर्ण होने की निराशा इस कदर आजकल के बच्चों पर हावी होती है कि वे ऐसा नकारात्मक कदम उठा लेते हैं। इसलिए आजकल नतीजों के पहले अभिभावक भी भयभीत रहते हैं।
मेरा मानना है कि ऐसी घटनाओं को कुछ उपाय करके रोका जा सकता है। अभिभावक, बच्चे और विद्यालय तीनों की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण होगी।

अभिभावक अपने बच्चों के साथ आरंभ से ही मित्रवत् रहें। अब वह ज़माना गया, जब बच्चा अठारह का होने पर उससे समानता का व्यवहार करने की सलाह दी जाती थी। आज के बच्चे टीवी और इंटरनेट के साथ बड़े हो रहे हैं,इसलिए उनमें अल्पायु से ही अधिक समझ विकसित हो जाती है।
ऐसी परिस्थिति में अभिभावक उनके साथ स्नेह और अनुशासन मिश्रित मृदु व्यवहार करें। बेशक आपने अपने माता पिता और गुरु के हाथों की मार खाई होगी और दंड व प्रतिबंध भी भरपूर भोगे होंगे, लेकिन वर्तमान पीढ़ी संवेदनशील है और अपने अधिकारों के प्रति सजग भी। इसलिए उसकी सहनशक्ति आप के मुकाबले काफी कम है। यदि आप पुराने समय की भांति तानाशाही और आक्रामक रवैया अपनाएंगे तो बच्चे आपसे मन-ही-मन दूर हो जाएंगे और आप से भयभीत रहते हुए ऐसे विपरीत परीक्षा परिणाम के वक्त गलत कदम भी उठा सकते हैं।
इसलिए अपने बच्चों से मधुर मित्रवत् व्यवहार कीजिए। उनकी समस्याएं,भावनाएं,इच्छाएं, आकांक्षाएं आदि सब कुछ ध्यान से सुनिए, समझिए और फिर उन्हें उचित दिशाबोध दीजिए।
एक और काम किया जा सकता है। आप स्वयं का 'मन' भी उन से साझा कीजिए। आपकी भावनाएं और इच्छाएं वे जानें और उनकी आप। इस परस्पर साझेदारी से उनके मन में आपके प्रति स्नेह पूर्ण विश्वास कायम होगा। इस भावनात्मक सेतु के निर्मित हो जाने के बाद मुझे लगता है कि वे संभवतः कभी ऐसा गलत कदम नहीं उठाएंगे।
अब आते हैं आज की पीढ़ी पर। माना कि आप बेहद बुद्धिमान और संवेदनशील हैं। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक और अपनी अस्मिता को लेकर सजग, लेकिन अपने दायित्वों की पहचान में आपसे चूक हो रही है। जो माता-पिता आपके जन्म से लेकर युवा होने तक और उसके बाद भी तन-मन-धन से आप की समग्र देखभाल करते हैं ,क्या उन्हें आत्महत्या जैसा कायराना प्रतिफल दिया जाना चाहिए ?आप उनके स्नेह और सेवा का मूल्य इस दुखद रूप में कैसे चुका सकते हैं ?

ऐसा करते समय कम से कम एक क्षण विचार तो कीजिए कि आप अपने अभिभावकों को पहाड़ जैसा दुःख देकर जायेंगे,जो आजीवन उनके ह्रदय पर भारस्वरूप रहेगा और वह जीवित होकर भी मृतक सम ही होंगे।
उचित तो यह होगा कि कभी कहीं कोई असफलता मिले,तो उसे अपने माता पिता से साझी करें,अपनी गलतियां सुधारें और भविष्य में बेहतर करने के लिए उन से सलाह लें।

स्मरण रखिए, जीवन सरल रेखा की तरह सीधा नहीं होता। उस में उतार-चढ़ाव आते ही हैं। उम्र के अनुकूल आपको चढ़ाव अर्थात

उन्नति तो पसंद है लेकिन उतार अर्थात अवनति के दौर में आप विचलित हो जाते हैं। इस उतार में कैसे संतुलित रहें,इसकी शिक्षा माता-पिता से बेहतर कोई अन्य नहीं दे सकता क्योंकि वे भी यहां तक इसी प्रकार अपनी जीवन यात्रा करके आए हैं।

यहां उनका अनुभव आपके ज्ञान से बड़ा है,इसलिए विफलता के क्षणों में निराश होकर आत्महत्या करने के स्थान पर बैठ जाइए अपने अभिभावकों के चरणों में और जीवन के हर रंग में प्रसन्न रहने और आगे बढ़ने के गुर सुनने के साथ गुन भी लीजिए।
बढ़ती आत्महत्याओं के इस दौर में विद्यालयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो चली है। इसी के मद्देनज़र आजकल अनेक विद्यालयों में काउंसलिंग के कालखंड भी रखे जाते हैं। इस विषय में मैंने शहर के श्रेष्ठतम निजी विद्यालय में अध्ययनरत अपने पुत्र से जानकारी ली।
उसके अनुसार काउंसलिंग के कालखंड में सदा काउंसलिंग नहीं होती। कई बार अन्य विषयों से संबंधित बातें भी की जाती हैं। जैसे,खेल,

पिकनिक,गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस की तैयारी,विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं के बाबत नाम और विषय तय करना आदि। उसकी बात सुनकर मुझे महसूस हुआ कि काउंसलिंग को लेकर उतनी गंभीरता नहीं बरती जा रही जितनी वर्तमान समय की आवश्यकता है।

वस्तुतः काउंसलिंग में न केवल प्रत्येक छात्र से उसकी समस्याएं पूछकर समाधान बताया जाए बल्कि उनका आत्मविश्वास बढ़ाने विषयक गतिविधियां भी शामिल की जाएं। इसके लिए उन्हें विविध प्रेरक प्रसंग सुनाए जाएं,संघर्ष और सफलता की परस्पर कड़ी समझाई जाए और सबसे महत्वपूर्ण यह सिखाया जाए कि उत्तीर्ण या अनुत्तीर्ण होना आपके मूल्यांकन का अंतिम पैमाना नहीं है। इसके बाद और इसके साथ भी ऐसा बहुत कुछ है,जिसकी उपलब्धि पर वे आत्मगर्वित हो सकते हैं।
काउंसलिंग के अतिरिक्त विद्यालय योग और ध्यान के सत्रों का आयोजन नियमित रुप से करें। उससे छात्र मानसिक रूप से मजबूत होंगे और असफलता की दशा में आत्महत्या करने के स्थान पर पुनः परिश्रम कर अपनी हार को जीत में बदलने के लिए प्रेरित होंगे।
यदि उपर्युक्त तीनों स्तरों पर सक्रियता के साथ काम हो,तो कोई वजह नहीं दीखती कि हमारे ये नवांकुर छोटी-सी असफलता की कीमत अपना जीवन देकर चुकाएं। कितना अच्छा हो कि यह संकल्प त्रयी साकार रूप ले और परिणाम में ऐसी शानदार और मजबूत पीढ़ी प्रदान करे,जो भारतवर्ष की कीर्ति-पताका दिग्-दिगंत तक फहराए।

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