तोरा मन दर्पण कहलाए... अपना साथी 'मन' को बनाएं

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मन को बनाएं अपना मार्गदर्शक


प्रत्येक मनुष्य के दो व्यक्तित्व होते हैं-आंतरिक और बाह्य। आंतरिक व्यक्तित्व का निर्माण मन के भावनागत स्तर पर होता है और बाह्य व्यक्तित्व का निर्माता मस्तिष्क होता है।
आज के भौतिकतावादी युग में मन और मस्तिष्क के टकराव में प्रायः मस्तिष्क की जीत होती है।

मेरा विचार है कि बढ़ती हुई हिंसा,नारी-अत्याचार,बच्चों व बुज़ुर्गों के प्रति असंवेदनशील व्यवहार की जड़ में यही मस्तिष्क की जीत काम कर रही है क्योंकि मन का तो मूल स्वभाव ही 'संवेदनशीलता' है,भावना है अर्थात् कुल मिलाकर 'मृदुता',मन की परिभाषा है। फिर मन ये दुराचरण कैसे कर सकता है?
वस्तुतः मस्तिष्क यानी बुद्धि की सोच निजमुखी होती है और मन की परांगमुखी। बुद्धि स्वहित और निजी सुख को वरीयता देती है। ऐसा करना कदापि बुरा नहीं है। भला अपना सुख किसे प्रीतिकर नहीं होगा और उसके लिए प्रयासरत होने में कुछ भी गलत नहीं है।

लेकिन समस्या तब आती है जब इस सुख की लालसा चरम पर पहुंच जाती है क्योंकि तब यह अनैतिकता के तमाम स्तर पार कर जाती है। सुख का घोर अभिलाषी मस्तिष्क ही अपने जन्मदाताओं पर अत्याचार या उनकी हत्या,स्त्रियों और अल्पायु बच्चियों के साथ शारीरिक दुराचार,छोटे बच्चों से उनका बचपन छीनकर नौकर या मजदूर बनाने जैसे स्वार्थपरक कर्म करता है।
आज का भारत लगभग प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति कर रहा है, लेकिन संवेदना के धरातल पर अवनति की ओर उन्मुख है। ध्यान से देखिएगा कि लगभग हर दिन के अख़बार में उपर्युक्त घटनाओं में से एक न एक अवश्य होती है।

यह परिदृश्य वास्तव में अत्यंत भयावह है। क्या यह वही भारत देश है, जो अपने सुसंस्कारों व सद्भावनाओं के लिए सदियों से एक मिसाल रहता आया है? क्या हमारा ज्ञान इतना आत्मकेंद्रित हो गया है कि 'स्व' से आगे कुछ देख ही नहीं पाता है? क्या हाईटेक होते-होते हमारा मन भी अपने मूल भाव को छोड़कर यंत्रवत् हो गया है?
सोचिए,विचार कीजिए।

-'हम क्या थे,क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिलकर,ये समस्याएं सभी'

मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों में स्वतंत्र भारत के गौरव और परतंत्र भारत की गौरवहीनता की ओर संकेत देकर भविष्य को सुधारने का आग्रह है।

ये पंक्तियां आज के इस संवेदनहीन दौर में भी मौजूं हैं।

हमारा अतीत अत्यंत उज्ज्वल था,किन्तु शर्मनाक वर्तमान से भविष्य का बहुत भयावह चित्र उभरता है। हमें याद रखना होगा कि हम जैसा बोयेंगे,वैसा ही काटेंगे। अभी वक़्त है-सम्भल जाएं,सुधर जाएं।
अपने बाह्य व्यक्तित्व को आंतरिक व्यक्तित्व से अलग ना करें बल्कि उसका आइना बनाएं। जो निर्मलता भीतर है, वही बाहर भी रहे। मन की सतोमुखी सोच मस्तिष्क की बुद्धि को पवित्र करेगी। तब रिश्तों का महत्व भी उचित सम्मान पाएगा और मानवीय होने का भाव भी स्थायी होगा।
मन के उजास की भोर उदित होने पर ही ये पंक्तियां सही मायनों में सार्थकता पाएंगी-' मेरा भारत महान।'

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