चलो, हम अपनी धरती को स्वर्ग बनाएं

'हमें क्या करना' की सोच से बचें

सांध्यकालीन भ्रमण मेरी नियमित दिनचर्या का हिस्सा है।राह पर आते-जाते दृष्टि-पथ में कई ऐसे व्यक्ति,घटनाएं या क्रियाएं सहज ही आ जाते हैं, जो विचार-प्रवाह का अंग बन जाते हैं।
ऐसे ही किसी दिन भ्रमण से लौटते वक़्त दो युवा लड़के मेरे निकट से तेज़ गति से वाहन चलाते हुए गुज़रे। मेरे दिल की धड़कन उनकी रफ़्तार देख तेज़ हुई और अगले ही क्षण हवा से बातें करते हुए वे युवा ज़मीन पर आ गिरे। तीव्र गति से असंतुलित हुआ उनका वाहन एक तरफ और लहूलुहान, कराहते वे दोनों दूसरी तरफ गिरे।

आप यकीन मानेंगे कि उनकी मदद के लिए मेरे अतिरिक्त मात्र 2 लोग आए जबकि अनुमानतः उस समय सड़क पर 15 से 20 लोग मौजूद रहे होंगे। लेकिन उन सभी के मन और वाणी पर एक ही बात थी-'हमें क्या करना?'
उस दिन उन दोनों लड़कों को सही समय पर उपचार भी मिल गया और वे भविष्य में ऐसी गलती ना करने का संकल्प भी हम तीनों के समक्ष व्यक्त कर गए।

घटना तो होकर गुज़र गई,लेकिन मेरे मन में एक गहरी पीड़ा छोड़ गई-'क्या हम इतने अमानवीय हो गए हैं कि एक जीवन को यूं तड़पता छोड़कर चल देंगे?'

जिसके लिए अभी आप ये सोचकर आगे निकल गए कि हमें क्या करना,उसके स्थान पर कभी कोई आपका भी हो सकता है। उस समय कोई मदद का हाथ नहीं बढ़ेगा,तो आप तो सदा के लिए उस अपने को खो देंगे ना...

हमारे देश में इतनी सड़क दुर्घटनाएं होती हैं।इनमें कई लोग तो इसी अमानवीयता के शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि पास से गुज़रने वाले इंसान 'हमें क्या करना' वाले निंदनीय भाव के हामी होते हैं।

तनिक गहराई से विचार करें तो पाएंगे कि यह स्वार्थपरक जड़ता हमारी सामाजिक सोच में बहुत भीतर तक पैठ चुकी है।

हम कहीं भी,किसी भी क्षेत्र में सहायता के अपेक्षी को देखते ही मुंह फेर लेते हैं। कहीं कुछ गलत होते हुए पाते हैं,तो विरोध करने के स्थान पर उसे अनदेखा करने की कोशिश करते हैं जब तक कि वो 'गलत' हमें ना प्रभावित करे।
हमारी सोच की हदें हमने सिर्फ स्वयं से स्वयं तक ही तय कर दी हैं। पड़ोसियों में कोई विवाद हो,तो हमें क्या करना? कोई बेटा अपने माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करे,तो हमें क्या करना? कोई पति अपनी पत्नी पर अत्याचार करे,तो हमें क्या करना? कोई सास,बहू के साथ या कोई बहू,सास के साथ अभद्रता करे,तो हमें क्या करना? कोई छात्र अपने शिक्षक से अनुचित व्यवहार करे,तो हमें क्या करना? दुकानदार किसी को कम तौलकर अधिक पैसा ले रहा है, तो हमें क्या करना? किसी को अपने जायज काम के लिए रिश्वत देनी पड़े,तो हमें क्या करना?
यानी हर वो बात,जिससे हम तत्काल में प्रभावित नहीं हो रहे हैं, हमारे लिए ध्यान देने योग्य भी नहीं है।

हमारे दिमाग में एक पल के लिए भी ये विचार नहीं आता कि उपर्युक्त सभी स्थानों पर भोक्ता के रूप में कभी हम भी हो सकते हैं। तब कैसा लगेगा,जब शेष समाज से सहयोग का एक हाथ,संवेदना का एक स्पर्श,स्नेह का एक क़तरा भी ना मिलेगा?

वस्तुतः इस जड़ता ने हमारे समाज का बहुत अहित किया है। निरंतर एक दूसरे की अनदेखी से अपराध बढ़ रहे हैं। नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। समाज भौतिक प्रगति तो कर रहा है, लेकिन भीतर से खोखला होता जा रहा है। व्यक्तिवाद की आंधी में समाजवाद औंधे मुंह गिरा पड़ा है।
व्यक्ति समृद्ध हो रहे हैं, लेकिन आत्मा निर्धन हो रही है।अपने मूल भाव को खोते जा रहे हम बाहर से समृद्ध दीखते हैं, लेकिन अंदर वीराना भोग रहे हैं।

वस्तुतः हम सभी मानव,मानवीयता के रिश्ते से बंधे हैं और स्मरण रखिये,इस रिश्ते में स्वयं ईश्वर ने हमें आबद्ध किया है। उसी ईश्वर ने,जिसकी आराधना हम नित्य इस कामना के साथ करते हैं कि वो सदा हमारा हित करे,कल्याण करे।

तो ज़रा अपनी स्वार्थ बुद्धि से ही सोचकर देखिये कि आप ईश्वर का काम करेंगे,तभी वह आपका काम करेगा।
आशय यह कि आप मानवीय धर्म का निर्वाह करेंगे,तो वह प्रसन्न होकर ईश्वरीय कृपा करेगा। आप प्राणी मात्र के प्रति स्नेह,सहयोग और सम्मान का भाव रखेंगे,तो
प्रतिफलस्वरूप आपको भी वही मिलेगा।

सद्भाव से सद्भाव का,निर्मलता से निर्मलता का और परोपकार से परोपकार का प्रसार होगा।

विश्वास रखिये,जब आपमें 'मानवीयता' घटेगी,तो ईश्वर का 'कल्याण' घटेगा और तब इस धरती पर ही वो स्वर्ग घट जायेगा,जो मृत्योपरांत हममें से हर एक की अखंड कामना है।

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