बाल कविता: दादी मां के घर झूले

घर की मियारी पर दादी ने,
डाले दो झूले रस्सी के।

चादर की घोची डाली है,
तब तैयार हुए हैं झूले।
अब झूलेगी चिक्की-पिक्की,
चेहरे हैं खुशियों से फूले।

इन्हें झुलाएंगे दादाजी,
हुए उमर में जो अस्सी के।

छप्पर पर पानी की बूंदें,
खरर-खरर कर शोर मचातीं।
चिक्की-पिक्की झूल रही हैं,
दादी गीत मजे से गातीं।

खाती दोनों चना-कुरकुरे,
हो-हल्ले होते मस्ती के।

दादी मां के घर झूलों की,
चर्चा गली-गली में फैली।
झांक-झांककर गए देखकर,
मोहन, सोहन, आशा, शैली।

हर दिन आने लगे झूलने,
और कई बच्चे बस्ती के।

अब दादीजी बड़े प्रेम से,
सबको झूला झुलवाती हैं,
एक-एक लोरी गाती हैं।

होते रहते मना-मनौव्वल,
स्वांग रोज गुस्सा-गुस्सी के।

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