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बालगीत : ई-मेल से धूप

बुधवार,सितम्बर 19, 2018
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रक्षाबंधन पर फनी कविता- बजी द्वार पर घंटी ट्रिन ट्रिन, हाथी जी चकराए। फंदक-फंदक कर गुस्से में वह, दरवाजे तक आए।
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मैं हूं नन्हीं परी, बगल में, पंख छुपे हैं मेरे। आसमान से उड़कर आई, बिलकुल सुबह सवेरे।
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मिन्नी बोली टिन्नी से, टिन्नी टिन्नी शाला चल। छुपी हुई है घर में क्यों, घर से बाहर अभी निकल।
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कुत्ता भौंका बड़ी जोर से, बिल्ली भागी जान छोड़के। चुहिया ने तब मौज उड़ाई
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छुट्टी के दिन गजब के बीते हैं, सौ मीटर की रेस हमीं तो जीते हैं। खेलकूद और शेर के चक्कर में,
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कूद-कूदकर, उछल-उछलकर, होता है मस्ती का मन। जब बजती छुट्टी की घंटी, टन-टन-टन-टन, टन-टन-टन-टन।
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आलू की चड्डी ढीली थी, कुर्ता ढीला बैंगन का। दोनों ही नाराज बहुत थे,
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चींटी के घर चिट्ठी आई, हाथी से पढ़वाई। पापाजी बीमार बहुत हैं, सुनकर वह घबराई।
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मेंढक पानी का राजा है। टर्राना उसका बाजा है। जल के बाहर जब आता है।
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सेहत का शुभ संयोग हो प्रकृति का सहयोग हो स्वस्थ सारे लोग हो.... योग हो... योग हो ...
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योग से मन स्वच्छ हो योग से तन स्वस्थ हो योग पर ना धन खर्च हो योग करें हम योग करें
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कविता : बरखा रानी आती है

शुक्रवार,जून 8, 2018
जब-जब पानी आता है, पत्ते, फूल खिलाता है। बरखा रानी आती है, रिमझिम पानी लाती है।।
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हिम पर्वत पर मिलने वाला, फूल बड़े मतवाले। छोटी झाड़ी से पौधे तक, इसके रूप निराले।। छह हजार मीटर ऊंचाई,
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आई आई गर्मी आई कैसे-कैसे खेल लाई। आओ चुन्नी खेलें खेल सोनू क्या तुम कंचे लाई आई आई गर्मी आई।
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राम-श्याम सुबहोशाम खाते रहते मीठा आम। बाल-पाल गए चौपाल
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आसमान में उड़े बहुत हैं, सागर तल से जुड़े बहुत हैं। किंतु समय अब फिर आया है, हमको धरती चलना है।
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नानाजी के गांव है जाना, गांव खेत की सैर करेंगे। शुद्ध हवा सांसों में भरकर, छुप्पा-छुप्पी के खेल करेंगे।
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मां अहिल्या देवी हैं अवतार हैं। हर तरफ उनकी ही जय-जयकार है, लोग मंगल गीत उनके गा रहे उन्हीं के दीप जलाए जा रहे
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गुड़ की लैया नहीं मिली है, बहुत दिनों से खाने को। बचपन फिर बेताब हो रहा, जैसे वापस आने को।
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