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फनी बाल कविता : दादाजी अब हंस देते

शुक्रवार,मार्च 29, 2019
child poem
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लल्लू पीला रंग ले आया कल्लू ने भी हरा रंग उड़ाया। रंग लगाया एक-दूजे को, लड़े-भिड़े थे परकी साल।
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जिसे बचाने मुहिम चली है, सिर पर चढ़ा जुनून। नाम बताओ इसका क्या है? भैया अफ़लातून।
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रौनक थी बड़ी; हमें कुछ नहीं भाया, मेले में मज़ा नहीं आया। चहल-पहल; धक्का-मुक्की; रेलमपेल,
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कड़क ठंड में शाला जाना, बहुत कठिन है, बहुत कठिन है। घर से बाहर थोड़ा निकलूं,
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नए साल! तुम जल्दी आना । संग में अपने खुशियां लाना ।। छोड़ दिए हैं काम अधूरे उसको पूरे करके जाना ।
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शीत लहर में आंगन वाले, बड़ के पत्ते हुए तर बतर। चारों तरफ धुंध फैली है, नहीं कामवाली है आई।
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हो जाते हम बोनसाई तो, कितने मज़े हमारे होते। तीस इंच के होते पापा, बीस इंच की मम्मी। मैं होता बस आठ इंच का, पांच इंच की ...
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कविता : तारे घबराते हैं

गुरुवार,अक्टूबर 11, 2018
तारे घबराते हैं, शायद इसीलिये टिमटिमाते हैं, सूरज से डरते हैं, इसीलिये दिन में छिप जाते हैं।
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रानी दुर्गावती पर कविता- जब दुर्गावती रण में निकलीं हाथों में थीं तलवारें दो। धीर वीर वह नारी थी, गढ़मंडल की वह रानी
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बाल साहित्य : झांसी की रानी...

बुधवार,अक्टूबर 3, 2018
रानी थी वह झांसी की, पर भारत जननी कहलाई। स्वातंत्र्य वीर आराध्य बनी, वह भारत माता कहलाई॥ मन में अंकुर आजादी का, शैशव से ...
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हमें बताओ कैसे भागे,आप रात की जेल से। सूरज चाचा ये तो बोलो, आए हो किस रेल से।
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रक्षाबंधन पर फनी कविता- बजी द्वार पर घंटी ट्रिन ट्रिन, हाथी जी चकराए। फंदक-फंदक कर गुस्से में वह, दरवाजे तक आए।
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मैं हूं नन्हीं परी, बगल में, पंख छुपे हैं मेरे। आसमान से उड़कर आई, बिलकुल सुबह सवेरे।
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मिन्नी बोली टिन्नी से, टिन्नी टिन्नी शाला चल। छुपी हुई है घर में क्यों, घर से बाहर अभी निकल।
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कुत्ता भौंका बड़ी जोर से, बिल्ली भागी जान छोड़के। चुहिया ने तब मौज उड़ाई
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छुट्टी के दिन गजब के बीते हैं, सौ मीटर की रेस हमीं तो जीते हैं। खेलकूद और शेर के चक्कर में,
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कूद-कूदकर, उछल-उछलकर, होता है मस्ती का मन। जब बजती छुट्टी की घंटी, टन-टन-टन-टन, टन-टन-टन-टन।
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आलू की चड्डी ढीली थी, कुर्ता ढीला बैंगन का। दोनों ही नाराज बहुत थे,
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चींटी के घर चिट्ठी आई, हाथी से पढ़वाई। पापाजी बीमार बहुत हैं, सुनकर वह घबराई।
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