बाल कविता : मम्मी पिलाती डांट की घुट्टी




करना पड़ता है,
किस बात की होती छुट्टी।
जब देखो तब मम्मी मेरी,
पिलाती डांट की घुट्टी।

घूमने कहीं जाने न देती,
घर पर ही खेलूं कोई खेल।
कहती करो पढ़ाई जम के,
नहीं तो हो जाओगे फेल।

सैर-सपाटा जाने नहीं देती,
बांध के हरदम रखती मुट्ठी।
जब देखो तब मम्मी मेरी,
पिलाती डांट की घुट्टी।

कुछ दिन ही हैं खुलेंगे,
फिर समय न जल्दी आएगा।
समझ मजबूरी अपनी पप्पू,
नित्य विद्यालय जाएगा।

लिखी कॉपियां मुरझाएंगी,
बन जाएगी जल्द ही रद्दी।
जब देखो तब मम्मी मेरी,
पिलाती डांट की घुट्टी।


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