...जब हथेलियों पर सजाईं मुनव्वर राना की जूतियां

- दिनेश ‘दर्द’

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वैसे तो मुनव्वर राना का उज्जैन-इंदौर से ख़ासा राबिता रहा है। लिहाज़ा, यहां के सामिईन को कई बार उनके कलाम सुनने का मौका मिला। इसी सिलसिले में एक बार उनका उज्‍जैन आना हुआ। कहने की ज़रूरत नहीं कि मुशायरा उन्हींक ने लूटा। नवम्बर की सर्दियां और उस पर सुबह के क़रीब 3.30 या 3.45 बजे का वकआत।

नंगे पैर उतरना पड़ा डायस स

महफ़िल तमाम होते-होते सर्दी की शिद्दत और सिवा हो चुकी थी। हां, अगर माहौल में कुछ हरारत थी, तो वो राना साहब के अशआर की ही वजह से। और यही राना साहब मुशायरा तमाम होते ही प्रशंसकों से घिर गए। घिरे-घिरे ही जैसे-तैसे डायस से नीचे उतरे। अब उतर तो आए लेकिन बरहना पा (नंगे पैर)। ज़ेरे गुफ़्तगू उन्होंने अपनी तकलीफ़ बयां भी की लेकिन सुने कौन। हर कोई उनके क़रीब होना चाहता था, उन्हें छूना चाहता था और चाहता था कि इस भीड़ में राना साहब देर तक महज़ उसी से बातें करते रहें।
कौन सुने किसी की आ

फ़ित्रतन मैं इस हुजूम से कुछ ही दूरी पर सिर्फ़ बातें सुनने की गरज़ से कान लगाए खड़ा था। और इस बीच पता नहीं क्यूं तमाम गहमा-गहमी के बीच भी मेरे कानों तक उनकी ये बात पहुंच ही गई कि ‘अरे हमारी जूतियां नहीं मिल रहीं भाई, ज़रा दिखवा दीजिए’। लेकिन अफ़सोस मुंह से निकली बातें तो लोगों तक पहुंच रही थीं, मगर दिल से निकली आह सुनने वाला कोई नहीं था शायद। या हो सकता है कोई उनसे दूर न जाना चाहता हो या कुछ और भी...। बात मुझ तक पहुंची और ज़ेहनो-दिल में उस्ताथद की जूतियों की सिफ़त के क़िस्से भी ताज़ा हो गए।
रूहानी ताक़त मिल गई हो जैस

और फिर यह सोचकर कि ये एज़ाज़ किसी और के नसीब में न चला जाए, मैं दूसरे ही पल बिना वक्त गंवाए डायस की ओर लपका। डायस का हर कोना छान मारा मगर जूतियां नहीं मिलीं, फिर झुककर लकड़ी से तैयार किए डायस के नीचे पहुँचा। कुछ ही दूरी पर एक जोड़ी जूतियां पड़ी हुईं मिली तो सही। बस्स, फिर क्या था।
जैसे कोई रूहानी ताक़त मिल गई हो। दोनों जूतियां हथेलियों पर सजाकर भीड़ से घिरे राना साहब की तरफ ख़ुशी-ख़ुशी दौड़ पड़ा और मैंने पूछा कि ‘सर, देखिए कहीं यही तो नहीं हैं आपकी जूतियां?’ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘अरे हां, यही तो हैं। कहां से मिलीं?' मैंने डायस की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘सर, डायस के नीचे पड़ी थीं।'

इसी बीच मैंने झुककर जूतियां नीचे रख दीं। खड़ा हुआ तो देखा, इस भीड़ में उनकी नज़र सिर्फ़ मुझ पर थी, पूरी तरह से मुझ पर। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा चेहरा अपनी हथेलियों में भर लिया और बुलंद आवाज़ में कहा ‘वाह। बहुत-बहुत शुक्रिया, खुश रहो बेटे’।
मिला जूतियां हथेलियों पर सजाने का सवा

इसके अलावा भी कुछ कहा या नहीं, ठीक से याद नहीं। क्योंकि मैं तो इसी बात से दीवाना हुआ जाता था कि उनकी जूतियां अपनी हथेलियों पर सजाकर, उनके पैरों तक रखने का सवाब मुझे हासिल हुआ था।

मेरी नज़र में थीं तो बस्स उनकी मुस्कुराती पनीली आंखें, जो उनके होंठों से निकले लफ़्ज़ों को दुआ में तब्दील करती हुई जान पड़ती थीं। इससे ज़ियादा मुझे कुछ होश नहीं। हां, इतना याद है कि फिर उन्होंने रवानगी ली और मैंने भी ख़ुद पर फ़ख़्र करते हुए अपनी राह पकड़ ली। राना साहब तो उज्जैन से इंदौर और फिर इंदौर से कलकत्तेर (उन्होंने कोलकाता को कलकत्तेर ही कहा था) के लिए रवाना हो गए लेकिन फिर मैंने कई दिनों तक महसूस की उनकी लरज़ती हथेलियों की छुअन।

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