नज्म : मेरे महबूब !

सोमवार,जनवरी 9, 2017
लगाया दांव पर दिल को जुआरी है, मगर हारा कि दिल क्या, जान हारी है। पयामे-यार आना था नहीं आया, कहें किससे कि कितनी ...
घबराइए मत…! अभी बारिश का मौसम शुरू नहीं हुआ है यह तो इंद्रदेव अपनी पिचकारी चेक कर रहे थे…होली आने वाली है रंगों से ...

नज़्म - कली का मसलना देखा

सोमवार,मार्च 7, 2016
रात के पिछले पहर मैंने वो सपना देखा, खि‍लने से पहले, कली का वो मसलना देखा, एक मासूम कली, कोख में मां के लेटी, सिर्फ ...

नज़्म - कली क्यूं झरे

सोमवार,मार्च 7, 2016
मां मेरे कत्ल की तू हां क्यूं भरे? खि‍लने से पहले इक कली क्यूं झरे ?मेरे बाबुल बता, मेरी क्या ख़ता? मेरे मरने की बददुआ ...
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चांद तन्हा है आसमां तन्हा...चांद तनहा है आसमां तन्हा, दिल मिला है कहां-कहां तनहा, बुझ गई आस, छुप गया तारा, थरथराता रहा ...
हिन्दी से जो लोग उर्दू मंचों पर आ रहे हैं, उनकी शायरी में एक अलग ही ताज़गी और अलग ही चमक है।
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता, बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले, ये ऐसी आग ...

गजल : छलकते जाम

बुधवार,अक्टूबर 7, 2015
गोया वो मदहोश होकर मेरी कसमों से यूं मुकर से जाते हैं जब मयकदे में उनके आगे आशि‍की में जाम छलक जाते हैं इक पल को ...
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नई दिल्ली। उर्दू की नामचीन लेखिका हमीदा सालिम का आज निधन हो गया। वह 93 साल की थीं। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि हमीदा ...
वो आजादी बहिश्तों की हवाएं दम भरें जिसका। वो आजादी फरिश्ते अर्श पर चरचा करें जिसका। वो आजादी शराफत जिसकी खातिर जान तक ...
'बहुत इंतिहाई आकर्षक आँखें, बिल्कुल हीरे की तरह चमकती हुईं। लंबे-लंबे बाल, जिन्हें वो निहायत ही दिलचस्प अंदाज़ से ...

आजाद की क्रांतिकारी शायरी

गुरुवार,जुलाई 23, 2015
चंद्रशेखर आजाद का नाम भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में अमिट है। ऐसा निडर, सहज और निष्कलंक चरित्र वाला इतिहास में ...

उर्दू शायर बशर नवाज का निधन

गुरुवार,जुलाई 9, 2015
मुंबई। हिन्‍दी फिल्म बाजार के लोकप्रिय गीत 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी' के रचनाकार और मशहूर उर्दू शायर बशर नवाज का ...

होली की रोमांटिक शायरी

सोमवार,मार्च 2, 2015
होली की रोमांटिक शायरी- नेचर का हर रंग आप पर बरसे। हर कोई आपसे होली खेलने को तरसे। रंग दे आपको सब मिलकर इतना। कि वह रंग ...
आह को चाहिए इक उम्र, असर होने तक, कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होने तक ...
गालिब के खास शागिर्द और दोस्त अक्सर शाम के वक़्त उनके पास जाते थे और मिर्ज़ा सुरूर के आलम में बहुत पुरलुत्फ बातें किया ...
एक रोज़ बादशाह चन्द मुसाहिबों के साथ आम के बाग ' हयात बख्श ' में टहल रहे थे-साथ में गालिब भी थे- आम के पेडों पर तरह-तरह ...
यह बात आज भी संदिग्ध बनी हुई है कि मिर्जा ग़ालिब शिया थे या सुन्नी। इस संबंध में हमारी जानकारी का आधार उनकी अपनी रचनाएं ...
एक दिन हमने मिर्ज़ा ग़ालिब से पूछा कि 'तुमको किसी से मुहब्बत भी है?' कहा कि, 'हाँ हज़रत अली मुर्तज़ा से।' फिर हमसे पूछा ...