अब कोई मेराज फैज़ाबादी नहीं हो सकेगा

- दिनेश 'दर्द'

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कहते हैं हर शब के बाद सहर और सहर के बाद फिर शब आती है। दोनों की उम्र क़रीब-क़रीब बराबर ही तय है। मगर कभी-कभी शब की उम्र सहर के मुकाबले दराज़ होने का अहसास होता है। अज़ीम मेराज फैज़ाबादी के चले जाने से शायरी की दुनिया भी इन दिनों ऐसे ही एक तारीकी दौर से गुज़र रही है। जी हाँ, बरसों-बरस अपनी शायरी की ज़िया से अदब को रौशन करने वाला ये चराग़ 30 नवंबर को मरज़े मोहलिक (जानलेवा बीमारी) कैंसर के चलते बरोज़ शनिवार, नवंबर 30, 2013 को गुल हो गया।

दुनियाभर में अपनी शायरी का अलम फहराने वाले मेराज ने शहरे लखनऊ में आँखें मूंदी और अपने छोटे से गाँव कोला शरीफ के शहरे ख़मोशाँ की ख़ाक ओढ़कर सो गए। उनके जाने से शायरी के जिस हल्क़े में अंधेरा हुआ है, वहाँ अब अंधेरा ही रहेगा क्योंकि दुनिया में शायर तो बहुत हैं और रहती दुनिया तक होंगे भी, लेकिन अब कोई मेराज फैज़ाबादी नहीं हो सकेगा।
उत्तरप्रदेश के एक छोटे से गाँव कोला शरीफ़ में क़रीब 71 बरस पहले आँखें खोलीं थीं मेराज फैज़ाबादी ने। हालाँकि उस वक्त उनका नाम मेराजुल हक़ था। मेराजुल हक़ से मेराज फैज़ाबादी हो जाना, फ़क़त नामों का बदल जाना नहीं है। बल्कि इसके बीच एक तवील सफ़र है, पुरख़ार और संगज़ार रास्तों का। इसके बीच शदीद आँच है मुख़ालिफ़ हालात की, जिसने इस भट्टी में तपाकर मेराजुल हक को मेराज फैज़ाबादी बनाया।
ये परवरदिगार का करम ही रहा कि इसमें तपकर मेराजुल हक़, ख़ाक नहीं हुए बल्कि मेराज फैज़ाबादी बनकर निखरे। उनकी शायरी भी इसी बात की ताईद करती है। 1962 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएससी ग्रेजुएट मेराज फैज़ाबादी का ग़ज़ल संग्रह ''नामूस'' ख़ासा मशहूर हुआ। बतौर बानगी, देखिए एक ग़ज़ल-

बेख़ुदी में रेत के कितने समंदर पी गया,

प्यास भी क्या शय है, मैं घबराके पत्थर पी गया

अब तुम्हें क्या दे सकूँगा, दोस्तों, चारागरों,

जिस्म का सारा लहू मेरा मुक़द्दर पी गया

मैकदे में किसने कितनी पी ख़ुदा जाने मगर,

मैकदा तो मेरी बस्ती के कई घर पी गया

पता नहीं मुल्क के कितने अख़बारों तक मेराज फैज़ाबादी के इंतिक़ाल की ख़बर पहुँची, या फिर क्या मालूम अख़बारों के लिए ये ख़बर थी भी या नहीं। शायरी के मैदान में जो रुतबा मेराज का था, मुआफ़ करें- उसके मुताबिक़ उन्हें अख़बारात में जगह नहीं मिल सकी। दु:ख होता है कहते हुए, कि औरों की तारीकियों में अपनी साँसों के चराग़ों से उजाला करने वाले हर दौर में बदसीब ही रहे। बड़ी आसानी से भुला दिया गया उन्हें। लोग उनकी रौशनी में अपनी-अपनी मंज़िले मुराद तक पहुँचे और अपने रहबर को ही भूलकर मंज़िलों के होकर रह गए। ऐसे मसीहाओं की फेहरिस्त हालाँकि बहुत तवील है मगर ख़ुदा करे, इस रहबर का नाम इस फेहरिस्त में शुमार न हो।

मेराज ने बारहा अपनी रूह को कुरेदा। अगले पन्ने पर।


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