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गजल : छलकते जाम

बुधवार,अक्टूबर 7, 2015
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जन्नत पुकारती है...

सोमवार,नवंबर 11, 2013
एक बार फिर से मिट्टी की सूरत करो मुझे इज्जत के साथ दुनिया से रुख्सत करो मुझे
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उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था, सारा घर ले गया, घर छोड़ के जानेवाला - निदा फ़ाज़ली
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जान लेने का हक़ नहीं वरना

मंगलवार,जून 16, 2009
फ़ैसले सच के हक़ में होते हैं मैं अभी तक इसी गुमान में था---- अशफ़ाक़ अंजुम
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न समझने की ये बातें हैं न समझाने की , ज़िंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की - फिराक़
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ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ...

शुक्रवार,मार्च 13, 2009
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है , तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा - बशीर बद्र
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अशआर : (मजरूह सुलतानपुरी)

शुक्रवार,जनवरी 2, 2009
जला के मिशअले-जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे सात चले
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इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

शुक्रवार,दिसंबर 26, 2008
होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब को न जाने शाइर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
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ग़ज़ल में तसव्वुफ़ (भक्ति भाव)

गुरुवार,दिसंबर 18, 2008
जब यार देखा नयन भर दिल की गई चिंता उतर ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर
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हर एक रास्ता मंज़िल है चल सको तो चलो बने बनाए हैं सांचे जो ढल सको तो चलो
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मैं अक्सर चाँद पर जाता हूँ

बुधवार,दिसंबर 10, 2008
तुम हो क्या ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद, तुम बदलते हो तो मौसम भी बदल जाते हैं...
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जोया के अशआर

सोमवार,दिसंबर 1, 2008
ज़िन्दगी लगती है इक प्यारी ग़ज़ल सी लेकिन, इस का हर शे'र बड़ा दर्द भरा होता है।
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दिल से पहुँची तो हैं

बुधवार,नवंबर 26, 2008
सब ग़लत कहते थे लुत्फ़-ए-यार को वजहे-सुकूँ दर्द-ए-दिल उसने तो हसरत और दूना कर दिया-------हसरत मोहानी
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आप बन्दा नवाज़ क्या जानें

शुक्रवार,नवंबर 21, 2008
मेरे दिल को किया बेख़ुद तेरी अंखयाँ ने आख़िर कूँ के जूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता आहिस्ता ----------वली
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इतना न अपनी क़िस्मत-ए-रोशन पे नाज़ कर चढ़ता है आफ़ताब तो ढलता ज़रूर है आया था अपने गाँव से दामन में लेके फूल जाता ...
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मुफ़लिसी सब बहार खोती है

शनिवार,नवंबर 15, 2008
ज़िन्दगी है या कोई तूफ़ान है, हम तो इस जीने के हाथों मर चले।------
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ख़ुदा है वो भी

बुधवार,नवंबर 12, 2008
लोग ख़ुश हैं उसे दे-दे- के इबादत का फ़रेब वो मगर ख़ूब समझता है ख़ुदा है वो भी -------ग़नी एजाज़
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हम सायादार पेड़ ज़माने के काम आए जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए
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दोस्तों ने भी तमन्नाओं को पामाल किया दुश्मनों पर ही न इलज़ाम लगाया जाए
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तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं ------फ़ैज़
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