शिव, शंभू और शंकर यानी शांति, कल्याण और मंगल


- स्वामी अवधूतानंद

भगवान शंकर ही सबसे बड़े नीतिज्ञ है क्योंकि वे ही समस्त विद्याओं, वेदादि शास्त्रों, आगमों तथा कलाओं के मूल स्रोत है। इसलिए उन्हें विशुद्ध विज्ञानमय, विद्यापति तथा सस्त प्राणियों का ईश्वर कहा गया है। भगवान शिव ही समस्त प्राणियों के अंतिम विश्रामस्थान भी है। उनकी संहारिका शक्ति प्राणियों के कल्याण के लिए प्रस्फुटित होती है। जब भी जिसके द्वारा धर्म का विरोध और नीति मार्ग का उल्लंघन होता है, तब कल्याणकारी शिव उसे सन्मार्ग प्रदान करते हैं।
भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल एवं अमंगलों का उन्मूलक है। शिव, शंभू
और शंकर, ये तीन नाम उनके मुख्य हैं और तीनों का अर्थ है- परम कल्याण की जन्मभूमि, संपूर्ण रूप से कल्याणमय, मंगलमय और परम शांतिमय।

भगवान शिव सबके पिता और भगवती पार्वती जगजननी तथा जगदम्बा कहलाती हैं। अपनी संतान पर उनकी असीम करुणा और कृपा है। उनका नाम ही आशुतोष है। दानी और उदार ऐसे हैं कि नाम ही पड़ गया औढ़रदानी। उनका भोलापन भक्तों को बहुत ही भाता है। अकारण अनुग्रह करना, अपनी संतान से प्रेम करना भोलेबाबा का स्वभाव है। उनके समान कल्याणकारी व प्रजा रक्षक और कौन हो सकता है।
समुद्र से कालकूट विष निकला जिसकी ज्वालाओं से तीनों लोकों में सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी प्राणी काल के जाल में जाने लगे, किसी से ऐसा सामर्थ्य नहीं था कि वह कालकूट विष का शमन कर सके। प्रजा की रक्षा का दायित्व प्रजापतिगणों का था, पर वे भी जब असमर्थ हो गए तो सभी शंकरजी की शरण में गए और अपना दुख निवेदन किया।

उस समय भगवान शंकर ने देवी पार्वती से जो बात कही, उससे बड़ी कल्याणकारी, शिक्षाप्रद, अनुकरणीय नीति और क्या हो सकती है। विष से आर्त और पीड़ित जीवों को देखकर भगवान बोले- 'देवी! ये बेचारे प्राणी बड़े ही व्याकुल हैं। ये प्राण बचाने की इच्छा से मेरे पास आए हैं। मेरा कर्तव्य है कि मैं इन्हें अभय करूं क्योंकि जो समर्थ हैं, उनकी सामर्थ्य का उद्देश्य ही यह है कि वे दोनों का पालन करें।
साधुजन, नीतिमान जन अपने क्षणभंगुर जीवन की बलि देकर भी प्राणियों की रक्षा करते हैं। कल्याणी! जो पुरुष प्राणियों पर कृपा करता है, उससे सर्वात्मा श्री हरि संतुष्ट होते हैं और जिस पर वे श्री हरि संतुष्ट हो जाते हैं, उससे मैं तथा समस्त चराचर जगत भी संतुष्ट हो जाता है।'

भगवान शिव स्वयं नीतिस्वरूप हैं। अपनी चर्चा से उन्होंने जीव को थोड़ा भी परिग्रह न करने, ऐश्वर्य एवं वैभव से विरक्त रहने, संतोष, संयम, साधुता, सादगी, सच्चाई परहित-चिंतन, अपने कर्तव्य के पालन तथा सतत्‌ नाम जप-परायण रहने का पाठ पढ़ाया है। ये सभी उनकी आदर्श अनुपालनीय नीतियां हैं।
अपने प्राणों की बलि देकर भी जीवों की रक्षा करना, सदा उनके हित चिंतन में संलग्न रहना- इससे बड़ी नीति और क्या हो सकती है। कृपालु शिव ने यह सब कर दिखाया। 'मेरी प्रजाओं का हित हो इसलिए मैं इस विष को पी जाता हूं।' ऐसा कह वे हलाहल पी गए और नीलकंठ कहलाए। तीनों लोकों की रक्षा हो गई।


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