हिन्दू धर्म के 10 रहस्यमयी ज्ञान, जानिए....

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
6. वास्तु शास्त्र : वास्तु शास्त्र की उत्पत्ति भी वेदों से हुई है। वास्तु शास्त्र के अनुसार ही मंडप, मंदिर, देवालय, घर और शहर का निर्माण किया जाता है। यदि शहर निर्माण में वास्तु का ध्यान नहीं रखा गया है तो उस शहर की आबोहवा ठीक नहीं रहती जिसके चलते मानसिक क्लेश उत्पन्न होता है। वास्तु विज्ञान का स्पष्ट अर्थ है चारों दिशाओं से मिलने वाली ऊर्जा तरंगों का संतुलन...। यदि ये तरंगें संतुलित रूप से आपको प्राप्त हो रही हैं, तो घर में स्वास्थ्य व शांति बनी रहेगी। घर बनाने या लेने में तिथि, माह और नक्षत्रों पर विचार करने के बाद ही उसके वास्तु (दशा और दिशा) पर विचार किया जाता है। जीवन में सुख और दुख का कारण घर और शहर का चयन होता है।
दक्षिण भारत में वास्तु विज्ञान की नींव मय दानव ने रखी थी तो उत्तर भारत में विश्वकर्मा ने। दोनों को ही शिल्पकार, निर्माणकर्ता और यंत्र निर्माता माना जाता है। भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, भगवान शंकर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति- ये 18 वास्तुशास्त्र के उपदेष्टा माने गए हैं। इन्होंने ही महाराजा मनु को वास्तु का उपदेश दिया था। वास्तु का विवरण अथर्ववेद में भी मिलता है।

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