गांधी विचार की समकालीनता और समग्र विकास का दृष्टिकोण

-डॉ. कश्मीर उप्पल

हमारे देश में ही नहीं, वरन पूरे विश्व में गांधीजी के जन्म के 150 वर्ष के कार्यक्रमों की चर्चा है। इस वर्ष 12वें का आयोजन गांधीजी के सेवाग्राम आश्रम, वर्धा (महाराष्ट्र) में किया गया। इसका मकसद जनसरोकारों के मुद्‌दों पर पत्रकारों के बीच एक गहन संवाद स्थापित करना है। पूर्व में हुए मीडिया संवादों में पत्रकारिता, कृषि, आदिवासी, सूखा, विकास, स्वास्थ्य, बाल अधिकार और असहिष्णुता आदि विषयों पर केंद्रित बातचीत की जाती रही है। इसी तारतम्य में 'गांधी-150' के अवसर पर समकालीन भारत की व्यवस्थाओं पर चर्चा करने के लिए देशभर के 150 पत्रकार 3 दिनों तक विचार-विमर्श करते रहे। इसमें देश के ख्यात पत्रकार, कृषि विशेषज्ञ और मीडिया के सभी माध्यमों के साथी उपस्थित थे। इस बार मीडिया कॉन्क्लेव सेवाग्राम कलेक्टिव, सेवाग्राम आश्रम, नई तालीम समिति और विकास संवाद के बैनर तले 'गांधी-150' के तहत किया गया।
मीडिया कॉन्क्लेव के बड़े आकर्षण के बिंदु पत्रकार पी. साईंनाथ थे। उनके व्याख्यान को सुनने के लिए वर्धा और आसपास स्थित संस्थाओं के विद्यार्थी, प्रतिनिधि भी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए थे। साईंनाथ ने राष्ट्रीय मीडिया संवाद के समापन सत्र में विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि हमारे देश का मापन कृषि से है इसलिए कृषि अर्थव्यवस्था ही सबकी चिंता का विषय होना चाहिए। आश्चर्य की बात है कि देश के लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, परंतु किसी भी तरह की चिंता का विषय कृषि क्षेत्र नहीं बन पाया है।

हमारे देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति को इसी बात से समझा जा सकता है कि मीडिया ने पिछले 5 सालों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अपने मुख्य पृष्ठ पर 0.7 प्रतिशत ही स्थान दिया है। इन वर्षों में चुनाव के वर्ष भी शामिल होते हैं इसलिए यह औसत अधिक दिख रहा है। वास्तव में इससे भी कम ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चर्चा होती है।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में मप्र की भावांतर योजना का प्रकाशन जिस दिन हुआ था, उसके ठीक 24 घंटे के अंदर ही मंदसौर का गोलीकांड हो जाता है। इससे कृषि के विरोधाभास स्पष्ट होते हैं। आजकल एमएस स्वामीनाथन रिपोर्ट की चर्चा हो रही है, परंतु वास्तव में वह रिपोर्ट नेशनल कमीशन फॉर फॉर्मर की रिपोर्ट है, जो देश के कई विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार की थी। एक ओर देश में स्वास्थ्य सेवाओं और बैंकों का निजीकरण हो रहा है ताकि उनकी स्थिति सुधारी जा सके। ऐसा करते हुए हम भूल जाते हैं कि संपूर्ण कृषि हमेशा निजी क्षेत्र में रही है और उसकी स्थिति इतनी बदहाल हो गई है।

पानी का संकट कृषि का एक विशेष संकट है। इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि कोयम्बटूर शहर में पानी का निजीकरण करने के लिए पानी की व्यवस्था 20 वर्षों के लिए एक विदेशी कंपनी को दे दी गई है। उस शहर के गरीबों को 45 पैसे प्रतिलीटर पानी दिया जाता है जबकि यही पानी शराब और बीयर बनाने वाली कंपनी को 4 पैसे लीटर के भाव से दिया जा रहा है। इसी तरह बैंकों का प्राथमिकता क्षेत्र भी बदल दिया गया है। कृषि लोन को टर्मलोन बना दिया गया है जिसकी वजह से किसानों को 14 से 18 प्रतिशत ब्याज का भुगतान करना होता है।

सरकार किसानों को जो सहायता देती है, उसे अनुदान कहा जाता है जबकि कंपनियों को दिए गए करोड़ों रुपए के लोन को इन्सें‍टिव या प्रोत्साहन कहा जाता है। हमारे बैंकों पर बड़ी कंपनियों का लोन लगभग 42 खरब रुपए का है। इसी कारण हमारे देश के बैंकों का वापस न मिलने वाला लोन इतना बड़ा हुआ है। बैंकों की न वसूली गई राशि का 75 प्रतिशत केवल बड़ी-बड़ी कंपनियों के कारण है।
सरकार ने किसानों की आत्महत्या का पैमाना तक बदल दिया है। नेशनल क्राइम रिपोर्ट में किसान आत्महत्या के आंकड़ों के प्रकाशन पर रोक लगा दी गई है। इसी तरह देश के कुपोषण पर अपनी रिपोर्ट देने वाले नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो को भी बंद कर दिया गया है। हमारे किसानों को भी यह समझना चाहिए कि आत्महत्या का विकल्प ठीक नहीं है, उससे अच्छा है कि सड़कों पर खड़े होकर विरोध प्रदर्शन करना।

देश में किस तरह की कृषि चाहिए, इस विषय पर कभी लंबी बहस नहीं हुई है इसलिए 201 किसान संगठनों ने लाखों किसानों के साथ दिल्ली में संसद के सामने प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है। किसानों की मांग है कि संसद का 21 दिनों का एक विशेष सत्र बुलाया जाए जिसमें केवल किसानों के संकट और देश के पानी के संकट पर बहस हो। उसके साथ ही किसान महिलाओं को भी कृषि भूमि पर अपना अधिकार मिलना चाहिए।

महाराष्ट्र के कृषि विशेषज्ञ एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. तारक काटे ने भी बताया कि कृषि संकट को हल करने के केवल 3 सूत्र हैं- उत्पादन बढ़ाना, कृषि खर्च कम करना और फसलों का उचित दाम देना। देश में शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण करोड़ों हैक्टेयर कृषि भूमि कृषि क्षेत्र में कम हो चुकी है और जो शेष बची है, उस भूमि से भी 40 प्रतिशत जमीन रासायनिक प्रभावों के कारण कृषियोग्य नहीं रही है।

किसानों के संकट का एक बड़ा कारण यह है कि उन्हें कंपनियों से हर बार हायब्रीड बीज खरीदने पड़ते हैं, क्योंकि ये बीज उगाने के बाद दोबारा नहीं उगते हैं। इन बीजों के कारण रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग भी बढ़ा है। हमारे देश में 59 करोड़ टन कचरा खेती से निकलता है जिसे हमारे किसान जला देते हैं। सरकार रासायनिक खाद कारखानों को 77 हजार करोड़ रुपए का अनुदान देती है। यदि इतनी राशि देश के कृषि कचरे से खाद बनाने में लगाई जाए तो ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के कई अवसर पैदा होंगे और जमीन की उत्पादकता में भी सुधार होगा।

सरकारें फूड सिक्यूरिटी की बातें करती हैं, परंतु न्यूट्रिशियन सिक्यूरिटी की बात नहीं करती है। किसान परिवारों को सही पोषण नहीं मिलने के कारण कई तरह के दबाव कृषि पर भी पड़ते हैं। एक समय गांवों में अलसी का तेल बहुत होता था, परंतु आजकल देश के अमीर परिवार के लोग ही अलसी का तेल खाते हैं।

पत्रकार अरुण त्रिपाठी ने अपने एक सत्र में कहा कि गांधी अपने जीवन और अपनी मृत्यु से भी संदेश देते हैं। यह कितने आश्चर्य और दु:ख की बात है कि गांधी की हत्या का अपराधबोध भी हम में नहीं बचा है। राम का मंदिर बनाने वाले लोग गांधी की हत्या को उचित मानते हैं। सरोजिनी नायडू ने कहा था कि ईश्वर महात्मा गांधी की आत्मा को शांति न दे जिससे कि उनकी आत्मा धरती पर रहे। गांधीजी के हत्यारे गोडसे की आत्मा को शांति मिले, पर गांधीजी की आत्मा इस धरती पर विचरती रहनी चाहिए।

मुंबई की पत्रकार रजनी बक्षी ने कहा कि आजकल हमारे देश में हिंसा न्यूज बनती है, परंतु अहिंसा नहीं। हमें यह समझना चाहिए कि इस पृथ्वी पर जिस प्राणी ने अहिंसा पर विश्वास किया, वहीं मनुष्य बना और हिंसा पर विश्वास रखने वाले प्राणी आज भी जानवर ही है। भोपाल के पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने एक सत्र में कहा कि हमारे सामने कई प्रश्न हैं, परंतु उनके समाधान नहीं है। हमें सोचना होगा कि गांधी के विचार को व्यवहार में लाने का क्या उपक्रम होना चाहिए। देश में इस समय गांधी के विचार को खारिज करने वाले लोग ज्यादा हैं। गांधीजी ने हमेशा मशीनों का विरोध किया था, परंतु हम बौद्धिक रूप से गूगल मशीन पर निर्भर हो गए हैं।

कश्मीर उप्पल ने कहा कि यूनानी भाषा के शब्द 'इकॉनॉमिक्स' का अर्थ है परिवार का प्रबंधन और गांधी का समस्त चिंतन देश को एक परिवार के रूप में देखने का था। हमारे देश में दुनिया की 17 प्रतिशत जनसंख्या रहती है जबकि हमारे पास दुनिया के भू-भाग का केवल 2.4 प्रतिशत भाग ही है इसलिए हमें मानव प्रबंधन की गांधी दृष्टि को आगे बढ़ाना चाहिए। गांधीजी उत्पादन के लिए मानव शक्ति की ही बात करते थे। आजकल हमारे देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन होने के कारण देश की अधिकांश मानव शक्ति बेकार हो गई है। इसी कारण कई तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याएं खड़ी होने लगी हैं।

इस 3 दिवसीय विचार-विमर्श में मगन संग्रहालय, वर्धा की अध्यक्ष डॉ. विभा गुप्ता ने एक दिन सभी प्रतिभागियों को लेकर गांधी आश्रम का भ्रमण कार्यक्रम रखा। इस कार्यक्रम में उन्होंने सरकार द्वारा 145 करोड़ रुपए के बजट द्वारा लोहे और कांक्रीट के बड़े-बड़े निर्माण कार्य प्रतिभागियों को दिखलाए। ये सारे निर्माण कार्य सरकार द्वारा गांधी विचार की अनदेखी कर किए जा रहे हैं। सरकार गांधी की कुटिया को एक बड़े पर्यटन स्थल के रूप में बदल देना चाहती है, परंतु इससे गांधी के विचार और सिद्धांत कहीं पीछे छूटते हुए दिखलाई देते हैं। (सप्रेस)

(डॉ. कश्मीर उप्पल शासकीय महात्मा गांधी स्मृति स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटारसी से सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं।)

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