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Rohini Vrat 2019 : जैन समुदाय में क्यों जरूरी है ‘रोहिणी व्रत’, जानिए महत्व एवं पौराणिक कथा

गुरुवार,अक्टूबर 17, 2019
Rohini Vrat Katha
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संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महापुरुष मानव जाति के प्रकाश पुंज हैं, जो मनुष्‍य को धर्म की प्रेरणा देकर उनके जीवन के अंधेरे को दूर करके उन्हें मोक्ष का मार्ग दिखाने का महान कार्य करते हैं।
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राष्ट्रसंत आचार्य श्री विद्यासागरजी ने राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी अजमेर में आषाढ़ सुदी पंचमी विक्रम संवत्‌ 2025 को लगभग 22 वर्ष की आयु में संयम-धर्म के परिपालन हेतु उन्होंने पिच्छी कमंडल धारण करके मुनि दीक्षा धारण की थी।
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आज दिगंबर जैन समुदाय का क्षमावाणी पर्व है। जैन धर्म की परंपरा के अनुसार वर्षा ऋतु में मनाया जाने वाला पर्युषण पर्व, जैन धर्मावलंबियों में आत्मशुद्धि का
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दसलक्षण पर्व के दिनों में किया गया त्याग और उपासना हमें जीवन की सच्ची राह दिखाते हैं। क्षमा शब्द मानवीय जीवन की आधारशिला है। जिसके जीवन में क्षमा है, वही महानता को प्राप्त कर सकता है।
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दसलक्षण पर्व के इन दन दिनों में कोई एकासन कर रहा है, तो किसी ने उपवास का संकल्प लिया है। सुबह जल्दी उठकर घर के सारे कामों को पूरा करके मंदिर जाना और फिर दिन भर विभिन्न आयोजनों में व्यस्त रहना।
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ऋषि पंचमी से दिगंबर जैन समाज के दशलक्षण महापर्व शुरू हो गए है। इस पर्व के अंतर्गत 8 सितंबर 2019, रविवार को सुगंध दशमी पर धूप खेवन का पर्व मनाया जाएगा।
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भारतीय वाङ्मय की कतिपय धाराएं सर्वज्ञ एवं सर्वज्ञता के धरातल पर अपना अस्तित्‍व बनाकर रखती हैं। सर्वज्ञ की अवस्‍था जीवात्‍मा की सर्वोत्‍कृष्‍ट अवस्‍था है। चरम एवं परम स्थिति है। सामान्‍य भाषा में चैतन्‍यता के प्रकर्षता को सर्वज्ञता कहा जाता है।
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पर्युषण पर्व जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है। यह पर्व बुरे कर्मों का नाश करके हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा से यह पर्व अलग अलग तरीके से मनाते हैं। हालांकि ...
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3 सितंबर 2019, मंगलवार से दिगंबर जैन समाज में पर्वों के राजा कहे जाने वाले महापर्व पर्युषण शुरू हो गए हैं। यह आने वाले 10 दिन सभी के जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है,
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पर्युषण पर्व पर क्षमावाणी का कार्यक्रम ऐसा है जिससे जैनेतर जनता को काफी प्रेरणा मिलती है। इसे सामूहिक रूप से विश्व-मैत्री दिवस के रूप में मनाया जा सकता है।
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श्वेतांबर जैन समाज महापर्व पर्युषण की समाप्ति पर 3 सितंबर को संवत्सरी महापर्व मनाया जाएगा। प्रति वर्ष की भांति आत्म जागरण का महापर्व पर्युषण समाप्त हो गए हैं।
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एक समय विपुलाचल पर श्री वर्धमान स्वामी समवशरण सहित पधारे। तब राजा श्रेणिक ने नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करी, कि महाराज! रोट तीज व्रत कैसा और इस व्रत से किसको लाभ हुआ और यह व्रत कैसे किस विधि से किया जाता है, सो कृपा करके कहो।
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रोट तीज का व्रत भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है, हिन्दू धर्मानुसार इस दिन हरतालिका तीज पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2019 में रोटतीज का व्रत 1 सितंबर, रविवार मनाया जा रहा है।
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पयुर्षण तप और त्याग का पर्व है। इस दौरान आत्मा की अज्ञानता दूर करना यही सच्चा धर्म है। पयुर्षण पर्व के दौरान आठ कर्मों का दहन करना तथा जीवमात्र के प्रति दया रखना यही सभी का परम कर्तव्य है।
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26 अगस्त 2019, सोमवार से श्वेतांबर जैन समाज के पर्युषण पर्व शुरू हो गए है, जो कि 2 सितंबर तक मनाए जाएंगे। इस दौरान सुबह पूजा-पक्षाल, व्याख्यान होगा तथा शाम को प्रतिक्रमण और
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जैन समुदाय की मान्यताओं में रक्षा बंधन की कथा कुछ अलग है। यह कथा एक मुनि द्वारा 700 मुनियों की रक्षा करने पर आधारित है। यह कहानी ही रक्षा बंधन के त्योहार का आधार है।
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तमाम रिश्तों के मध्य एक रिश्ता भाई-बहन का बड़ा पवित्र रिश्ता है। यह रिश्ता बनाया नहीं जाता बल्कि बना हुआ आता है। बाकी सभी रिश्ते खानदान के होते हैं,
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बुधवार, 7 अगस्त 2019 को जैन आगम के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक दिवस मोक्ष सप्तमी महामहोत्सव के रूप में मनाया जाएगा।
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पार्श्वनाथ वास्तव में ऐतिहासिक व्यक्ति थे। उनसे पूर्व श्रमण धर्म की धारा को आम जनता में पहचाना नहीं जाता था। पार्श्वनाथ से ही श्रमणों को पहचान मिली।
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Jain Chalisa- शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करूं प्रणाम। उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम। सर्व साधु और सरस्वती, जिन मंदिर सुखकार। अहिच्छत्र और पार्श्व को, मन मंदिर में धार।|
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शनि ग्रह त्याग का कारक है। जब गुरु ग्रह व शनि ग्रह का दृष्टियोग होता है, तो दीक्षा योग प्राप्त होता है। शनि ग्रह वैसे तो स्थिर ग्रह है जिसका फल लंबे समय के बाद मिलता है।
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जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन शुभ नक्षत्रों के योग में हुआ था। उनका जन्म, तप और मोक्ष तीन कल्याणकों का अवसर एक ही तिथि यानी ज्येष्ठ मास की चतुर्दशी पर 2 जून को मनाया जाएगा।
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जैन धर्म शास्त्रों में पर्यावरण को लेकर बहुत कुछ लिखा हुआ है। दुनिया के सभी धर्मों की अपेक्षा सबसे ज्यादा जैन धर्म ने प्रकृति के महत्व को समझा है और सभी को उचित सम्मान दिया है।
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सरयू नदी के तट पर बसे इस नगर की रामायण अनुसार विवस्वान (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज द्वारा स्थापना की गई थी। माथुरों के इतिहास के अनुसार वैवस्वत मनु लगभग 6673 ईसा पूर्व हुए थे। ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ। कश्यप से विवस्वान ...
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प्रत्येक वर्ष भगवान महावीर की जन्म-जयंती हम मनाते हैं। समस्त विश्व में जैन समाज और अन्य अहिंसा प्रेमी व्यक्तियों द्वारा बड़े हर्ष और उल्लास के साथ उनकी जयंती मनाई जाती है।
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महावीर एक राजा के परिवार में पैदा हुए थे। उनके घर-परिवार में ऐश्वर्य, धन-संपदा की कोई कमी नहीं थी, जिसका कि वे मनचाहा उपभोग भी कर सकते थे, परंतु युवावस्था
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हिन्दू और जैन दो शरीर लेकिन आत्मा एक है। जानते हैं कि कैसे दोनों ही धर्म दो होकर भी एक हैं।
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जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म चैत्र कृष्ण नौवीं के दिन सूर्योदय के समय हुआ। उन्हें ऋषभदेव जी, ऋषभनाथ भी कहा जाता है।
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जैन और हिन्दू दो अलग अलग धर्म है, लेकिन दोनों ही एक ही कुल और खानदान से जन्मे धर्म है। भगवान ऋषभदेव स्वायंभुव मनु से 5वीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वायंभुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24 तीर्थंकरों ...
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भगवान आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्ण नौवीं के दिन सूर्योदय के समय हुआ। उन्हें जन्म से ही संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञान था। उन्हें ऋषभनाथ, ऋषभदेव, आदिब्रह्मा, पुरुदेव और वृषभदेव भी कहा जाता है।
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भगवान महावीर का संपूर्ण जीवन तप और ध्यान की पराकाष्ठा है इसलिए वह स्वतः प्रेरणादायी है। भगवान के उपदेश जीवनस्पर्शी हैं जिनमें जीवन की समस्याओं का समाधान निहित है। भगवान महावीर का जीवन एक खुली किताब की तरह है। उनका जीवन ही सत्य, अहिंसा और मानवता का ...
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भारत में हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म में दीपावली का त्योहार हर्षोउल्लास से मनाया जाता है। इस दिन सभी धर्मों के लोग लक्ष्मी की पूजा करते, दीपक जलाते, मिठाईयां बांटते और पटाखे छोड़ता हैं। लेकिन इसके अलावा भी सभी धर्मों में किसी अन्य खास कारण से भी ...
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