कहानी : नाम गुम


-प्रवीण शर्मा

हल्की फिनाइल की खुशबू से आंख खुल गई। बहुत से लोगों की आवाजें आ रही थीं जिसे समझ पाना मुश्किल था। 4-5 लोग ऐसी भाषा बोल रहे थे कि उनकी भाषा बस सुन ही पा रहा था, परंतु उसका अर्थ निकाल पाना मुश्किल था। आंख खुलने के पश्चात अपने आस-पास देखा तो कुछ लोग लेटे हुए दिखाई दिए।
पड़ोस बाले पलंग पर एक 16-17 साल का लड़का लेटा हुआ था जिसका एक पैर प्लास्टर चढ़ा होने की वजह से आधा हवा में लटका हुआ था। आधी दीवारों पर टाइल और पास में ही रखे से मुझे यह तो ज्ञात हो गया कि मैं एक अस्पताल में हूं। अचानक नजर गंदी चादर पर पड़ी, जो कि पड़ोस वाले लड़के के पलंग पर बिछी हुई थी जिससे यह साफ हो गया कि मैं एक सरकारी अस्पताल में हूं।
मुझे होश में देखकर नर्स ने डॉक्टर साहब को बुलाया। डॉक्टर साहब ने मुझसे पूछा कि अब आपको कैसा लग रहा है? उन्होंने मुझसे मेरा नाम पूछा लेकिन मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मैं अपने मन में अनेक प्रश्नों के उत्तरों को खोजने लगा, जैसे कि मेरा नाम क्या है? मेरी उम्र क्या है? मेरा मजहब क्या है? मैं (मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा) आखिर किस जगह पूजा-अर्चना करता हूं आदि।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मेरा मन बहुत व्यथित हो रहा था। मन में अनेक अच्छे-बुरे ख्याल आ रहे थे। तभी डॉक्टर साहब ने मुझे बताया कि मेरा एक्सीडेंट हुआ था और उस बेंच पर बैठी हुई खूबसूरत-सी लड़की ही आपको अस्पताल लेकर आई थी और वह पिछले 4 दिनों से आपका हाल-चाल लेने आ रही है।
तभी मुझे उस लड़की पर कुछ संदेह हुआ कि आखिर क्या वजह है, जो यह लड़की मेरा इतना ख्याल रख रही है। मुझे उस लड़की पर शंका होने लगी कि कहीं इसी की वजह से तो मेरी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हो गई?

तभी अचानक से डॉक्टर साहब ने मुझसे कहा कि फैसल घबराने की कोई बात नहीं है। आप जल्दी ही स्वस्थ हो जाओगे।

'फैसल' नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए तभी मैंने तुरंत डॉक्टर से पूछा कि क्या मेरा नाम 'फैसल' है?
मेरे प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉक्टर साहब ने कहा कि आपके पास से हमें कोई भी पहचान-पत्र नहीं प्राप्त हुआ इसीलिए हमने आपको यह नाम प्रदान किया।

तभी उस लड़की ने मेरे हाल-चाल लिए।

मैंने उस लड़की से पूछा कि क्या आप मुझे जानती हो? तो उसने मना कर दिया कि मैं आपको नहीं जानती हूं।

उसके पश्चात मैंने उससे दूसरा प्रश्न किया कि आखिर आपने मेरी इतनी सहायता क्यों की, तो उसने मुझे जवाब दिया कि मैंने आपकी मदद सिर्फ इंसानियत के खातिर की।
एक तरफ तो उस लड़की ने इंसानियत के लिए मेरी इतनी सहायता की, परंतु आज कुछ मीडिया मित्रों के हिसाब से महाराष्ट्र में दलित और हिन्दु आपस में भिड़ रहे हैं। अच्छा हुआ इन लोगों ने मेरी आंखें खोल दीं। मैं तो सभी को हिन्दू ही समझ रहा था। मैंने तो सुना था कि 'ईश्वर एक है'।

आज जो लोग आपस में लड़ रहे हैं, उनमें से अगर किसी भी वजह से उन लोगों की याददाश्त चली जाए तो क्या याद रहेगा उन्हें? क्या करेंगे वे लोग ऐसी जिंदगी का? सिर्फ ये ही नहीं, बल्कि वे लोग भी जो जाति व समुदाय के नाम पर सामने वाले व्यक्ति पर हेकड़ी जमाते हैं एवं उनको नीचा दिखाना चाहते हैं।
क्या फायदा इन सब बातों का यदि हमारे घर वालों ने हमें यह बताया ही नहीं होता कि हमारा धर्म क्या है? तो सोचिए आखिर कैसा होता हमारा जीवन? क्या हम खाना नहीं खाते? बोलना नहीं सीख पाते या हमें चलना नहीं आता? परंतु जैसी भी बात होती, आज के जीवन से तो अतिउत्तम ही होती।

आज जिसे देखो वह अपने धर्म पर मर-मिटने को तैयार है। अरे भाई, पहले अपने घर में बैठे अपने माता-पिता की तो सेवा कर लो। धर्म को जिंदा रखने के लिए अभी तुम्हारी जरूरत नहीं। किसी के भी परिवार ने यह नहीं सिखाया कि दूसरे के धर्म को बुरा-भला कहो, जबकि परिवार वालों ने तो यह सिखाया कि 'ईश्वर एक है', सभी के साथ प्रेम-भावना से रहना चाहिए। हमें सभी समुदायों के लोगों की मदद करना और सभी धर्मों की इज्जत करना चाहिए।
हमारा धर्म हमें यह सिखाता है कि सामने वाले व्यक्ति में भगवान को देखो, क्योंकि ईश्वर सभी के अंदर विराजमान है। फिर क्यों हम सामने वाले व्यक्ति को अपमानित करते हैं। विश्व के सभी धर्म इंसानियत का ही पाठ पढ़ाते हैं, परंतु यह हमारे पर निर्भर करता है कि हम एक अच्छे इंसान बनते हैं या कि फिर हैवान?

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