कहानी : अर्द्धांगिनी

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Author सुशील कुमार शर्मा| Last Updated: मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017 (17:00 IST)


आज था। वसुधा में रंगोली डाल रही थी। बच्चे दोस्तों के साथ मौज-मस्ती कर रहे थे। शैलेष सामान लेने बाजार गया था।

वसुधा की सास बहुत मजाकिया स्वाभाव की थीं। वसुधा को देखकर बोलीं, 'बहुत सुन्दर लग रही हो बहूरानी। ऐसा लगता है, जैसे आज ही आई हो ब्याह के।'

'मांजी आप भी', वसुधा शरमाकर बोली।

वसुधा के सामने से पिछले 20 साल का जीवन फ्लैशबैक की तरह गुजर गया। वह 20 साल पहले शैलेष की दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। अपने माता-पिता की लाड़ली व अपने भाइयों की राजकुमारी थी वसुधा। रिश्तेदारों ने वसुधा और शैलेष के विवाह की बात आगे बढ़ाई। शैलेष से पहली बार मिलने पर ही वसुधा उसकी वाक् पटुता की कायल हो गई। शैलेष के हंसमुख स्वभाव को घर में सबने पसंद किया और आनन-फानन में दोनों की शादी हो गई।

वसुधा भोपाल की उच्च शिक्षित संस्कारित लड़की थी और उसे इस कस्बे के माहौल में ढलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। शैलेष के घर वाले भी वसुधा जैसी सुन्दर व सुशील बहु पाकर बहुत खुश थे।

शैलेष की कोई स्थायी इंकम नहीं थी फिर भी कुछ ठेकेदारी वगैरह करके घर का खर्च ठीक-ठाक चल जाता था। शैलेष को राजनीति और समाजसेवा का नशा था। कोई भी व्यक्ति की कैसी भी समस्या हो, शैलेष उसे मिनटों में सुलझ देता था। क्षेत्र के विधायक और सांसद उसके बहुत खास थे, इस कारण राजनीति में उसका दबदबा था। विधायक का तो वो दाहिना हाथ था। उसके बगैर विधायक कहीं नहीं जाते थे। शहर के हर छोटे-बड़े राजनीतिक और सामाजिक आयोजन उसके बगैर नहीं होते थे।
पहले-पहल तो वसुधा को यह सब अच्छा लगा था, लेकिन जब उसने देखा कि शैलेष का सिर्फ 'उपयोग' किया जा रहा है तो उसने शैलेष को समझाया।

'आप कुछ अपना बिजनेस शुरू क्यों नहीं करते?' वसुधा ने पूछा।

'राजनीति और समाजसेवा ही तो मेरा बिजनेस है।' शैलेष ने मुस्कुराते हुए कहा।

'लेकिन मैं देख रही हूं कि इससे हमें कोई लाभ नहीं है।' वसुधा ने चिंतित स्वर में कहा।
'फायदा होगा अर्द्धांगिनी, तुम देखती जाओ कि एक दिन तुम विधायक बनोगी।' शैलेष ने मुस्कुराते हुए कहा।

'नहीं, मैं अपने घर-परिवार से संतुष्ट हूं, मुझे राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है।' वसुधा ने लगभग झल्लाते हुए कहा।

लेकिन शैलेष पर तो जैसे नशा सवार था। उसने वसुधा की किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लिया।

कुछ समय बाद पार्षद के चुनाव में उसने अपनी राजनीतिक पकड़ के चलते विधायक की अनुशंसा से चुनाव का टिकट हासिल कर लिया। महिला सीट होने के कारण वसुधा को चुनाव लड़ना पड़ा। वसुधा ने बहुत मना किया लेकिन शैलेष नहीं माना।
'देखिए, मुझे इस चुनाव की झंझट में मत डालिए। मुझे मेरा घर और बच्चे देखने दीजिए।' वसुधा ने प्रतिरोध करते हुए कहा।

'अरे मेरी अर्द्धांगिनी, तुम नहीं समझोगी कि कितनी मुश्किल से टिकट मिली है। महिला सीट है और मैं इस पर चुनाव नहीं लड़ सकता, तुम्हें ही खड़ा होना होगा। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते हैं। कौन जाने कल इसी आधार पर विधायक की दावेदार हो जाओ अगर विधानसभा सीट महिला के लिए आरक्षित होती है तो। तुम्हें चुनाव तो लड़ना ही है।' शैलेष ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए कहा।
वसुधा को मालूम था कि शैलेष से बहस करना मूर्खता है, क्योंकि वह बहुत जिद्दी था। एक बार उसने जो ठान लिया फिर उसको मोड़ना बहुत मुश्किल होता है।

अपने व्यवहार और लोकप्रियता के चलते शैलेष और वसुधा वो चुनाव जीत गए। इसके बाद तो शैलेष पर राजनीति का जुनून सवार हो गया। वह बच्चों और वसुधा को अब पहले से भी कम समय देने लगा। इसकी शिकायत वसुधा अक्सर करती।

'सुनो जी, अब बच्चे बड़े हो रहे हैं, खर्च भी बढ़ रहे हैं, ऐसे-कैसे काम चलेगा?'
'क्या चीज की कमी है तुम्हें? और बच्चों को सारी-सुख सुविधाएं मिल रही हैं। भैया हैं, पापा हैं, चिंता किस बात की है तुम्हें?' शैलेष ने कहा।

'राजनीति बहुत खराब चीज है, इसका कोई भरोसा नहीं है। आज सत्ता साथ है, कल नहीं रहेगी तब हम फिर क्या करेंगे?' वसुधा ने चिंतित स्वर में कहा।

'अरी अर्द्धांगिनी, कल तुम विधायक बनोगी। काहे चिंता कर रही हो। हमेशा आशावादी रहो, नकारात्मक मत सोचो।' शैलेष मुस्कुराते हुए बोला।
वसुधा शैलेष को कैसे बताती कि हर छोटी-छोटी बात के लिए परिवार वालों से पैसा मांगना कितना बुरा लगता है, लेकिन शैलेष को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

आखिर परिवार का खर्च चलाने के लिए वसुधा को ही आगे आना पड़ा। उसने जिद करके पोस्ट ऑफिस एवं एलआईसी की एजेंटशिप ले ली। पार्षद के काम को देखने के साथ-साथ उसने घर-घर जाकर पोस्ट ऑफिस के बचत खाते और एलआईसी की पॉलिसीज खुलवाईं। इससे इतना कमीशन मिलने लगा कि घर का खर्च आराम से चलने लगा।

विधायक का अति विश्वासपात्र होने के कारण शैलेष बहुत व्यस्त रहने लगा था। रात-दिन विधायकजी के साथ घूमना, दौरे करना, उनको प्राप्त शिकायतों का निराकरण करना, इसके साथ-साथ अपने वार्ड की समस्याओं को सुलझाना आदि उसकी नियमित दिनचर्या हो गई थी।

वसुधा उसको अक्सर टोकती, 'देखो आप बहुत व्यस्त रहते हो, आपका स्वास्थ्य दिनोदिन गिर रहा है, मुझे बहुत चिंता होती है।'
'अरी अर्द्धांगिनी, मुझे कुछ नहीं होगा, तुम जो मेरी सुरक्षा कवच हो।' शैलेष हंसकर उसकी बात टाल देता था।

'मुझे अच्छा नहीं लगता। आप विधायकजी की हर जिम्मेवारी अपने ऊपर ले लेते हैं।' वसुधा ने शिकायती स्वर में कहा।

'देखो वसुधा, आज शहर में हमारा नाम है। विधायक, मंत्री व सांसद हमारे घर आते हैं, हमें मानते हैं, इसके लिए मेहनत तो करनी होगी। फिर कल हमारे विधायक बनने के रास्ते भी तो इसी मेहनत से खुलेंगे।' शैलेष ने वसुधा को समझाते हुए कहा।

'देखिए, मुझे आपकी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। मैं अपने परिवार और बच्चों के साथ ही खुश हूं।' वसुधा ने थोड़ा उत्तेजित होते हुए कहा।

'अरे गुस्सा मत हो मेरी अर्द्धांगिनी, वैसे गुस्से में बहुत खूबसूरत लगती हो।' शैलेष ने स्थिति भांपते हुए वसुधा को मस्का लगाया।

वसुधा को समझ में नहीं आ रहा था कि शैलेष को वो कैसे समझाए? बच्चे बड़े हो रहे हैं। उनका भविष्य, महंगाई के समय में परिवार का खर्च आदि बहुत सारी चिंताओं से वसुधा इस समय घिरी हुई थी।

आखिर वही हुआ जिसका वसुधा को डर था। एक दिन शैलेष देर रात तक विधायकजी के यहां से काम निबटाकर आया था। सुबह जैसे ही उठा, उसे चक्कर आ गए। आनन-फानन में डॉक्टर को दिखाया गया तो पता चला कि उसकी शुगर 400 के आसपास थी। डॉक्टर ने वसुधा और शैलेष को बहुत समझाया कि अब दौड़-धूप छोड़कर व्यवस्थित जिंदगी जीने की आवश्यकता है, क्योंकि शुगर खतरनाक स्तर तक पहुंच चुकी है।

शैलेष ने में डॉक्टर से पूछा, 'डॉक्टर साहब विधायक बनने तक तो कुछ नहीं होगा न?'
'शुगर थोड़े ही जानेगी कि तुम विधायक हो। वो तो अपना काम करेगी और तुम्हें ज्यादा मिठाई खिलाएगी।' डॉक्टर ने भी हंसते हुए जवाब दिया।

वसुधा घर आकर बहुत चिंतित हो गई।

उसने शैलेष से कहा, 'देखिए, आप स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न करें। मैं आपके हाथ जोड़ती हूं।' वसुधा ने लगभग रोते हुए कहा।

'अरे अर्द्धांगिनी, तुम तो ऐसे रो रही हो, जैसे मुझे कैंसर हो गया है। अरे शुगर ही तो है। पिताजी को पिछले 30 साल से है। उन्हें कुछ हुआ? 1 गोली हर दिन सुबह-शाम खाना है खाने से पहले। बस शुगर ठीक।' शैलेष ने बड़ी बेफिक्री से वसुधा को समझाया।

उसी समय विधायकजी का फोन आया, 'शैलेष, भोपाल चलना है। नगर पालिका चुनाव के संबंध में प्रदेश अध्यक्ष मीटिंग ले रहे हैं।'

शैलेष की बांछें खिल गईं। उसे तो जैसे इसी पल का ही इंतजार था। उसे लगा कि नगर पालिका अध्यक्ष की उसकी टिकट अब पक्की हो गई है।

उसने जल्दी से कपड़े पहने और वसुधा से कहा, 'मैं भोपाल जा रहा हूं। अपने पिताजी को कोई संदेश तो नहीं देना?'
वसुधा ने कुछ सामान अपनी मां के लिए रख दिया व साथ में शैलेष को हिदायत दी कि वह समय पर भोजन से पहले शुगर की गोली जरूर ले ले। वसुधा बहुत चिंतित थी, क्योंकि उसे मालूम था कि शैलेष की दिनचर्या बहुत ही अस्त-व्यस्त है। न समय पर खाना, न सोना। ऐसे में शुगर की रिस्क खतरनाक होती है। लेकिन वह शैलेष के स्वभाव को जानती थी कि वह किसी की बात नहीं मानता है।

भोपाल में मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, चुनाव प्रभारी सबसे मिलने के बाद शैलेष निश्चिंत हो गया कि उसकी नगरपालिका अध्यक्ष की टिकट पक्की है। इसी बीच नगर में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम रखा गया जिसमें उन्होंने संपूर्ण जिले के बाह्य शौचमुक्ति की घोषणा की। कार्यक्रम की पूरी जिम्मेवारी और अधिकांश खर्च शैलेष और वसुधा ने उठाया। समापन पर मुख्यमंत्री ने विधायकजी एवं शैलेष की बहुत तारीफ की।
आखिर नगरपालिका चुनाव की घोषणा हुई और नगर की सीट महिला घोषित हुई। जब टिकट की लिस्ट आई तो उसमें से वसुधा का नाम गायब था। शैलेष को बहुत जबरदस्त झटका लगा, विधायकजी को भी बहुत आश्चर्य हुआ कि उनका अनुमोदन भी खारिज कर दिया गया।

पता चला कि जिसे टिकट मिला है उसने पार्टी फंड के साथ-साथ चुनाव प्रभारी को भी भारी राशि से 'उपकृत' किया है। शैलेष का हृदय टूट चुका था। वसुधा ने उसे बहुत सांत्वना दी कि जो हुआ, वो ठीक है और ईश्वर ने कुछ सोच-समझकर ही फैसला लिया होगा।
लेकिन शैलेष के पूरे ख्वाब चकनाचूर हो गए। दिनोदिन उसका स्वास्थ्य गिरता गया। एक दिन पुन: उसे चक्कर आए और खून की उल्टी हुई। अचेत अवस्था में उसे नागपुर ले जाया गया।

नागपुर में उसके बहुत सारे टेस्ट हुए और डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर वसुधा को बुलाया और कहा, 'वसुधाजी, बड़े दु:ख के साथ आपको बताना पड़ रहा है कि आपके पति की दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं, शुगर ने इनके प्राय: सभी अंगों को प्रभावित किया है। अगर जल्दी से इनका ऑपरेशन नहीं किया गया तो इनके हार्ट को खतरा हो सकता है।' डॉक्टर ने बहुत गंभीर स्वर में वसुधा को बताया।
वसुधा की आंखों में से झर-झर आंसू गिर रहे थे। डॉक्टर ने वसुधा को सांत्वना देते हुए कहा, 'फिलहाल अभी खतरा नहीं है, फिर भी आपको हर 8 दिन में डायलिसिस तो कराना ही पड़ेगा।'

वसुधा को शैलेष से ज्यादा खुद पर गुस्सा आ रहा था कि उसने शैलेष को रोका क्यों नहीं? क्या वो अपना अर्द्धांगिनी होने का फर्ज निभा पाई?

डॉक्टर से बात करके वसुधा जब शैलेष के पास पहुंची तो माहौल बहुत गमगीन था। सबको पता चल चुका था कि समस्या बहुत गंभीर है। परिवार के लोग एक-दूसरे को ढांढस बंधा रहे थे। वसुधा तो जैसे कि पत्थर की हो चुकी थी। उसने सोचा कि अगर उसने हिम्मत हार दी तो सब समाप्त हो जाएगा।

'पापाजी, आप चिंता न करें। डॉक्टर कह रहा था सब ठीक हो जाएगा। कई बार डायलिसिस से भी ठीक हो जाते हैं।' वसुधा ने अपने अंतरमन को कड़ा करते हुए अपने सास-ससुर को हिम्मत बंधाई।

'हां बेटी, अब तो ईश्वर का ही सहारा है। भगवान करे, तेरा सुहाग जल्दी ठीक हो जाए।' वसुधा की सास ने रोते हुए वसुधा को गले लगाया।

कुछ महीनों तक शैलेष डायलिसिस पर चलता रहा किंतु स्वास्थ्य धीरे-धीरे और बिगड़ने लगा। पूरे शरीर पर सूजन आने लगी, साथ ही साथ अब हर 2 दिन में डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगी। खर्च बहुत बढ़ने लगा। धीरे-धीरे शैलेष का साहस भी जवाब देने लगा।
वसुधा उसे हिम्मत देते हुए बोली, 'आप धीरज रखो। मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगी।'

'नहीं वसुधा, अब मैं शायद ही ठीक हो पाऊं। तुम बच्चों का ख्याल रखना। काश! मैं तुम्हारी बात मान लेता।' शैलेष रोते हुए बोला।

'क्या आपको अपनी अर्द्धांगिनी पर विश्वास नहीं है? जब तक मैं हूं, आपको कुछ नहीं होगा।' वसुधा अंदर से अपने आपको मजबूत करके बोली।

'नहीं, मुझे पूरा विश्वास है तुम पर, मुझे बचा लो वसुधा।' शैलेष वसुधा की गोदी में अपना सिर छुपाकर फफककर रोने लगा।
'चिंता मत करो, मेरी विधायकजी से बात हुई है। नगर में तुम्हारे लिए मैंने लोगों से आग्रह किया है कि वो कुछ मदद करें। कुछ आपके पापाजी और कुछ मेरे पापाजी सहायता करेंगे। मैं आपको बहुत जल्दी स्वस्थ कर लूंगी।' वसुधा ने शैलेष के बालों में प्यार से हाथ फेरते हुए कहा।

विधायक एवं शहर के समाजसेवी संगठनों के प्रयासों से शैलेष की किडनी प्रत्यारोपण के लिए रकम का प्रबंध तो हो गया लेकिन अभी किडनी का प्रबंध नहीं हो सका था। बाहर के लोग बहुत ज्यादा पैसे मांग रहे थे। मां-पिताजी को शुगर थी और उनकी किडनी उतनी सुरक्षित नहीं थी। आखिरकार वसुधा ने ही निर्णय लिया कि वह अपनी किडनी शैलेष को देगी।
वसुधा के मायके वालों ने इस बात का विरोध भी किया और कहा, 'दीदी तुम्हारे सामने पूरी जिंदगी पड़ी है तथा बच्चों को पालना है और क्या भरोसा कि इसके बाद भी जीजाजी सुधर जाएंगे? तुम क्यों अपने जीवन की रिस्क ले रही हो।' भाई ने वसुधा के निर्णय का पुरजोर विरोध किया।

'तो क्या मैं अपने सामने अपना सुहाग उजड़ जाने दूं?' वसुधा ने भाई से प्रश्न किया।

'नहीं बेटा, लेकिन तुम्हें कुछ हो गया या प्रत्यारोपण असफल रहा तो बच्चों का क्या होगा?' पिताजी ने उसे समझाया।
'लेकिन पापा, मैं अपने सामने शैलेष को मौत के मुंह में जाते नहीं देख सकती। मैं अपनी अंतिम सांस तक उन्हें बचाने की कोशिश करूंगी।' वसुधा ने सबको अपना अंतिम निर्णय सुना दिया।

भोपाल के चिरायु अस्पताल में वसुधा और शैलेष ऑपरेशन थिएटर में थे। करीब 8 घंटे तक मुंबई से आए डॉक्टरों ने शैलेष के शरीर में वसुधा की किडनी का सफल प्रत्यारोपण किया। करीब 6 माह की सघन चिकित्सा व देखरेख के बाद शैलेष और वसुधा आज अपने घर आ रहे थे। घर में उत्सव का माहौल था, क्योंकि परसों दीपावली थी।
दीपावली के दिन पूरा परिवार खुशियों में डूबा था। शैलेष लक-दक नए कुर्ते-पायजामे में जम रहा था। वसुधा लाल रंग की साड़ी में दुल्हन जैसी लग रही थी।

शैलेष ने वसुधा को अपने पास खींचते हुए कहा, 'अब तुम सही मायने में मेरी अर्द्धांगिनी बनी हो।'

'क्यों क्या पहले नहीं थी?' वसुधा ने मुस्कुराते हुए कहा।

'पहले सिर्फ रिश्तों में थीं, अब तो तुम्हारे अंग से मैं पूरा हुआ हूं।' शैलेष ने वसुधा की गोदी में अपना सिर रखते हुए कहा।

बाहर बच्चों की किलकारियां और दिवाली के पटाखों की आवाजें आ रही थीं, इधर वसुधा शैलेष के बालों में हाथ फिराते हुए सोच रही थी कि क्या सावित्री अपने सत्यवान को इसी तरह से यमराज से लड़कर वापस लाई होगी?

उधर शैलेष सोच रहा है कि वाकई पुरुष अपनी अर्द्धांगिनी के बिना कितना अधूरा रहता है?

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