नीतीश के बयान भविष्य की कठिनाइयों का संकेत

जो लोग जनता दल-यू की कार्यकारिणी से भाजपा एवं राजग के बारे में कुछ प्रतिकूल ध्वनि निकलने की कल्पना कर रहे थे उन्हें निश्चय ही निराशा हाथ लगी होगी। पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें उड़ रही थीं कि जद-यू ने बिहार के 40 में से 25 सीटों की मांग रखी है तथा यह साफ कह दिया है कि अगर पूरा सम्मान नहीं मिला तो गठबंधन से बाहर जाने पर भी विचार हो सकता है। इस खबर के बाद ही तेजस्वी यादव ने यह बयान दे दिया कि मेरे चाचा के लिए अब दरवाजा बंद हो गया है, किंतु कार्यकारिणी में ऐसा कुछ नहीं हुआ।
जद-यू ने न केवल प्रदेश में भाजपा के साथ बने रहने बल्कि राजग के एक घटक के रूप में ही राजनीतिक भूमिका निभाने की स्पष्ट घोषणा कर दी। 2019 के की दृष्टि से यह माना जा रहा था कि जद-यू ऐसा कोई प्रस्ताव पारित कर सकता है, जिनसे भाजपा पर दबाव बने एवं उनकी बात न माने जाने पर साथ छोड़ने का संदेश भी निकले। नीतीश कुमार के चरित्र को देखते हुए यह उम्मीद अस्वाभाविक नहीं थी। किंतु पत्रकार वार्ता में जद-यू के महासचिव केसी त्यागी ने साफ कर दिया है कि लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर कार्यकारिणी में कोई चर्चा ही नहीं हुई।

जद-यू के लिए यही स्थिति यथेष्ठ है। हालांकि जद-यू के नेताओं को पता है कि बनाने का प्रयास करने वाले अभी भी चाहते हैं कि किसी तरह नीतीश बाहर आ जाएं। हां, राजद उनको साथ लेने के मूड में नहीं, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति को ध्यान में रखते हुए अन्य नेताओं को उम्मीद है कि अंततः तेजस्वी एवं लालू यादव को मना लिया जाएगा। किंतु नीतीश ने इसका तत्काल खंडन कर दिया। उनका यह कहना कि कांग्रेस जब तक भ्रष्टाचार के बारे में अपना मत स्पष्ट नहीं करती, बिहार में उसको साथ लेने पर विचार करने का प्रश्न ही नहीं है।


भ्रष्टाचार से उनका सीधा इशारा के परिवार से है। यह बयान उन्होंने निश्चय ही काफी सोच-समझकर दिया है। कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों के लिए साफ संदेश है कि राजद से उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नाता तोड़ा और उस पर वे कायम हैं यानी वे किसी भी स्थिति में राजद के साथ नहीं जा सकते। वर्तमान राजनीति को देखते हुए यह अत्यंत महत्वपूर्ण वक्तव्य है। तत्काल इसका निष्कर्ष यही है कि बिहार में भाजपा के विरुद्ध किसी बड़े गठबंधन की संभावना निःशेष है।

भले राष्ट्रीय स्तर पर जो भी चर्चा चले लेकिन लालू परिवार के एक-एक सदस्य पर जिस तरह से अवैध तरीके से संपत्ति बनाने के आरोप लग रहे थे तथा कुछ के प्रमाण सामने आ रहे थे उनमें नीतीश के लिए राजद के साथ बने रहना मुश्किल था। स्वयं तेजस्वी एवं तेज प्रताप यादव तक पर अवैध तरीके से संपत्ति बढ़ाने का आरोप है। ऐसा नहीं होता तो नीतीश नरेन्द्र मोदी विरोध के नाम पर जिस सीमा तक जा चुके थे उसमें सामान्य स्थिति में वे स्वयं भाजपा के साथ वापस जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। भाजपा भी मान चुकी थी कि अब बिहार में उसकी राजनीति नीतीश विरोध की ही रहेगी।

अंदरखाने कुछ घंटों के अंदर नीतीश ने अरुण जेटली से बात कर जिस तरह फिर से पुरानी स्थिति में लौटने का राजनीतिक कारनामा कर दिया उसमें अब विस्तार से जाने की कोई आवश्यकता नहीं। किंतु उनके सामने स्वयं अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को बचाने का प्रश्न है। इस समय भाजपा के लिए कोई भी प्रतिकूल बयान उनको राजनीति में हास्य का पात्र बना सकता है। उन्हें इसका भान है। वैसे भले ही भाजपा के साथ आने की पहल उनकी थी, लेकिन प्रदेश भाजपा के नेताओं ने उनके साथ छोटे भाई की भूमिका अपना ली है।

नोटबंदी के बारे में उनके बयान पर किसी भाजपा नेता ने प्रतिक्रिया नहीं दी। नीतीश जैसा चाहते हैं बिहार गठबंधन में इस समय वही होता है। आज की स्थिति में भाजपा गठबंधन में उनका अनुसरण करने वाली पार्टी है। ऐसी स्थिति राजद के साथ नहीं थी। लालू प्रसाद यादव उसमें एक दूसरे सत्ता केन्द्र बन चुके थे। अधिकारियों से लेकर नेता तक उनसे सलाह लेने जाते थे तथा वे स्वयं भी लगातार इनके कामों में हस्तक्षेप करते थे। तो गठबंधन के अंदर नीतीश के लिए भाजपा ज्यादा अनुकूल है।

अभी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से नीतीश कुमार की मुलाकात होनी है। अमित शाह गठबंधन के सभी प्रमुख दलो के नेताओं से मिल रहे हैं। उनकी उद्धव ठाकरे तथा प्रकाश सिंह बादल से मुलाकात हो चुकी है। उस बातचीत में क्या निकलता है, यह देखने वाली बात होगी। हालांकि उसमें भी सीटों के बंटवारे पर कोई विमर्श होगा ऐसा लगता नहीं। प्रदेश भाजपा ने इस मामले पर अत्यंत ही संयमित रुख अपनाया है।

प्रदेश के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस संबंध में पूछे जाने पर कहा कि नीतीश कुमार बड़े भाई हैं, जब दिल मिल गया तो सीटों में भी कोई समस्या नहीं होगी। किंतु इन सबका अर्थ यह नहीं है कि 2019 के लिए बिहार में सीटों का बंटवारा वाकई आसानी से हो जाएगा। इस समय भाजपा के पास लोकसभा की 22 सीटें हैं। उसके सहयोगी लोजपा के छह तथा रालोसपा के दोनों गुटों के तीन। तो 40 में से 31 सीटें इनके पास पहले से हैं। क्या इनमें से कोई भी पार्टी अपनी जीती हुई सीटें जद-यू के लिए छोड़ने को तैयार होगी? यह आसानी से संभव नहीं है। अगर ये छोड़ेंगे नहीं तो जद-यू के लिए केवल नौ सीटें बचतीं हैं। इतने में वह मान जाएगी?

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर तलाशने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार एवं जद-यू के अन्य नेताओं को इस स्थिति का आभास नहीं है। आपस में उनके बीच इसकी चर्चा होती रहती है। ध्यान रखिए कार्यकारिणी में नीतीश ने इस विषय को परोक्ष रूप से उठाया भी। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी हमें 17 प्रतिशत वोट मिले थे। हमें कमजोर न माना जाए जो हमें नजरअंदाज करेगा वो खुद राजनीति में नजरअंदाज हो जाएगा।

उनका कहना था कि हमें जो भी मिलेगा उससे संतुष्ट हुए तो ठीक नहीं तो देखा जाएगा। आप मत घबराइए जद-यू को कोई एलिमिनेट नहीं कर सकता है। तो यह भाजपा सहित राजग के वर्तमान साथियों के लिए एक संदेश है जिसे सबको समझना होगा। इस समय इतने वक्तव्य तक सीमित रहने में ही बुद्धिमानी थी। जब अभी सीटों पर बात आरंभ ही नहीं हुई है इससे ज्यादा वक्तव्य देने का कोई अर्थ भी नहीं था। यह वक्तव्य साबित करता है कि बिहार में घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा आसान नहीं है।

जद-यू कितने से संतुष्ट होगी यह नीतीश ने नहीं बताया है। वह नौ सीटों पर मान जाएगी इसकी कल्पना तक बेमानी है। रास्ता यही होगा कि अन्य पार्टियां अपने खातें से कुछ सीटें कम करें या फिर बिहार में राजग एक होकर चुनाव नहीं लड़ पाएगा। क्या भाजपा नीतीश को प्रसन्न करने के लिए अभी के साथियों में से कुछ का परित्याग करेगी? या नीतीश राजग में रहते हुए कुछ सीटों पर दोस्ताना संघर्ष के लिए अपने उम्मीदवार खड़ा करेंगे? ये सारे प्रश्न तब तक प्रासंगिक हैं जब तक कि कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा इसकी घोषणा नहीं हो जाती।

कार्यकारिणी में कड़ा तेवर न दिखाने का यह अर्थ कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि बिहार में लोकसभा चुनाव के पूर्व सीटों को लेकर नीतीश कुमार या जद-यू कड़े तेवर नहीं अपनाएगी। ऐसे में यह भी संभव है कि प्रदेश में राजग टूट जाए यानी वर्तमान साथी बाहर जाएं एवं पहले की तरह भाजपा जद-यू साथ लड़े। राजद अपना दरवाजा नीतीश को छोड़कर अन्यों के लिए खोलकर तैयार बैठी है। इस तरह सभी प्रकार की संभावना अभी बिहार में बनी हुई है। तो देखते हैं क्या होता है। हां, बंटवारे तक बिहार की राजनीति काफी रोचक हो गई है।

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