पीछा करता विपक्ष और भागती सरकार

लोकसभा में मोदी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के गिरने पर शायद ही किसी को हैरानी हुई होगी। जिन विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस दिए थे, उन्हें भी यह गलतफहमी कतई नहीं थी कि उनके प्रस्ताव से सरकार गिर जाएगी। इसके बावजूद सत्ताधारी खेमे में अविश्वास प्रस्ताव के पेश होने से लेकर उस पर मत-विभाजन होने तक जिस तरह की बेचैनी और बदहवासी तथा बहस के दौरान जो बौखलाहट दिखाई दी, वह हैरान करने वाली रही। इससे भी ज्यादा हास्यास्पद और हैरान करने वाला वह मुदित और आनंदित भाव रहा, जो अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद सत्तापक्ष के महारथियों और रथियों के चेहरे पर तैरता दिखा।

दरअसल, अविश्वास प्रस्ताव पर बहस और मतदान का दिन नियत होते ही सरकार और सत्तारुढ़ दल के प्रचार तंत्र ने कॉर्पोरेट नियंत्रित मीडिया की मदद से पूरे देश में यह माहौल बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव के जरिए नरेन्द्र मोदी की 'लोकप्रिय' और 'विकासवादी' सरकार को गिराकर देश में अस्थिरता पैदा करना चाहता है। लेकिन इस कोशिश में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली, क्योंकि संसदीय लोकतंत्र की जितनी समझ सत्तारूढ़ दल के वाचाल प्रवक्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक को है, उतनी ही या उससे थोड़ी कम या ज्यादा समझ राजनीति की औसत समझ रखने वाले आम लोगों को भी है।

सबको मालूम था कि यह कोई पहला मौका नहीं है कि जब सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जा रहा है। पिछले 67 सालों में किसी भी सरकार के खिलाफ यह 27वां अविश्वास प्रस्ताव था। सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में पेश हुए। लालबहादुर शास्त्री ने भी अपने छोटे से कार्यकाल में 3 बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया। लेकिन अविश्वास प्रस्ताव के जरिये न तो इंदिरा गांधी की सरकार गिरी और न ही लालबहादुर शास्त्री की।

संसदीय लोकतंत्र में हर अविश्वास प्रस्ताव का मकसद सरकार को गिराना नहीं होता। इसका मुख्य उद्देश्य होता है देशहित के विभिन्न मसलों पर सरकार की जवाबदेही रेखांकित करना और सरकार के चाल-चलन पर सवाल उठाना। इसी मकसद से संसद में विपक्षी दल अक्सर 'काम रोको' प्रस्ताव भी लाते हैं जिसका मकसद कोई काम रोकना नहीं होता, बल्कि तात्कालिक महत्व के किसी मसले पर सरकार को घेरना ही होता है। मोदी सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव का मकसद भी सरकार को सवालों के कठघरे में खड़े करने तक ही सीमित था।

लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में विपक्ष के इस 'लोकतांत्रिक हथियार' का जिस तरह मखौल उड़ाया, उससे यही जाहिर हुआ कि वे न सिर्फ अपने को किसी भी तरह के सवालों से परे मानते हैं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र को भी महज चुनावी हार-जीत से ज्यादा कुछ नहीं समझते। चूंकि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे हैं और प्रधानमंत्री के रूप में भी वे 4 साल पूरे कर चुके हैं, लिहाजा यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे सामान्य संसदीय परंपराओं से अनजान होंगे या उन्हें अविश्वास प्रस्ताव का मतलब नहीं मालूम होगा। फिर भी उन्होंने अपने भाषण के दौरान अविश्वास प्रस्ताव की शाब्दिक व्याख्या ही की और यह जताने की हास्यास्पद कोशिश की कि यह प्रस्ताव उनकी सरकार को गिराने तथा देश को अस्थिर करने के मकसद से लाया गया है।

प्रधानमंत्री ने अपनी दलील को पुख्ता करने और कांग्रेस पर निशाना साधने की गरज से कुछ पुराने उदाहरण पेश किए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने चौधरी चरणसिंह, चन्द्रशेखर, एचडी देवेगौड़ा और इन्द्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी की सरकारों को भी अविश्वास प्रस्ताव के जरिये गिराने का पाप किया था। हालांकि यहां भी मोदी हमेशा की तरह अपनी आदत के मुताबिक गलतबयानी कर गए।


हकीकत यह है कि चरणसिंह और चन्द्रशेखर ने अपनी सरकार के अल्पमत में आने पर अविश्वास प्रस्ताव का सामना किए बगैर ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। मोदी को ये सारे गलत-सलत उदाहरण तो याद रहे लेकिन उन्हें शायद यह मालूम नहीं है कि भारतीय संसद में पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में जवाहरलाल नेहरू की सरकार के खिलाफ आचार्य जेबी कृपलानी ने पेश किया था जिसके पक्ष में महज 62 वोट पड़े थे। उस अविश्वास प्रस्ताव पर उस समय लोकसभा में नए-नए आए डॉ. राममनोहर लोहिया ने अकाट्य तर्कों और तथ्यों के साथ जो भाषण दिया था, उसने नेहरू के दमकते हुए आभामंडल को बुरी तरह निस्तेज कर दिया था। लोहिया का वह ऐतिहासिक भाषण आज 55 साल बाद भी भारत के संसदीय इतिहास का एक अहम दस्तावेज है।

इस समय भी लोकसभा में विपक्ष की स्थिति संख्याबल के लिहाज से देखें तो 1963 के मुकाबले कोई बेहतर नहीं है। गुणवत्ता के लिहाज से तो बेहद दयनीय है ही इसलिए विपक्ष को भी मालूम था कि उसके अविश्वास प्रस्ताव से सरकार का कुछ नहीं बिगड़ना है। इसके बावजूद उसने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया तो महज इसलिए कि इस पर होने वाली बहस के माध्यम से वह देश को सरकार के चाल-चलन को लेकर आगाह कर सके और यह बता सके कि सत्तापक्ष ने जो वादे जनता से किए थे, वे पूरे नहीं हुए हैं। ऐसा करना विपक्ष का अधिकार भी और कर्तव्य भी है इसलिए प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों तथा उनके ही सुर-ताल पर कूल्हे मटकाने वाले मीडिया का यह विलाप बेमतलब है कि विपक्ष सरकार को गिराने के मकसद से अविश्वास प्रस्ताव लाया था।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में सिर्फ अविश्वास प्रस्ताव का ही उपहास नहीं उड़ाया, बल्कि वे उन सारे अहम सवालों का जवाब देने से भी बचते दिखे, जो विपक्ष ने बहस के दौरान उठाए थे। रॉफेल विमान सौदे को लेकर उन्होंने आधी-अधूरी सफाई देते हुए गलतबयानी की। विदेशों में जमा कालेधन और अपने 'मास्टर स्ट्रोक' नोटबंदी के बारे में एक शब्द नहीं बोला। अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की रोजाना हो रही पतली हालत और पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ती कीमतों के मुद्दे को भी उन्होंने अपने भाषण में कोई जगह नहीं दी। देश की बदहाल अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की भयावह स्थिति को भी उन्होंने गलत-सलत आंकड़ों और हास्यास्पद दलीलों के जरिये नकारने की कोशिश की। देश में आए दिन हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं में शामिल रहने वाले अपने पार्टी कॉडर को कोई सख्त संदेश देना तो दूर, ऐसी घटनाओं में हुई मौतों पर अफसोस तक नहीं जताया।

अविश्वास प्रस्ताव पर उन्होंने संसदीय मंच का इस्तेमाल भी चुनावी रैली की तरह ही किया। उनसे सवाल किया गया था कि रॉफेल विमान किस कीमत पर खरीदने का सौदा हुआ है? वे जवाब दे रहे थे कि हमने एलईडी बल्ब सस्ता किया, ग्रामीण महिलाओं को गैस के चूल्हे दिए। उन पर कॉर्पोरेट घरानों से साठगांठ करने और उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप लगे लेकिन वे सर्जिकल स्ट्राइक और सेना के सम्मान की दुहाई देते रहे। सवाल पूछा गया सरकारी बैंकों की बदहाली को लेकर, लेकिन जवाब में कहा गया कि हमने जनधन योजना के तहत गरीबों के बैंक खाते खुलवाए। कुल मिलाकर सारी घिसी-पिटी बातें उनके भाषण में प्रमुखता से रहीं। उनके बगल में बैठे राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज की मुख-मुद्राएं भी मोदी के भाषण को ऊबाऊ और बेजान बताती प्रतीत हो रही थीं।

प्रधानमंत्री अपने भाषण के जरिए अपनी पार्टी के सांसदों की तालियां और मीडिया की सस्ती सुर्खियां बटोरने के मकसद से नाटकीयताभरे भावुक अंदाज में अपनी तथाकथित पिछड़ा और गरीब पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला देना भी नहीं भूले। इस सिलसिले में उन्होंने 'नामदार' बनाम 'कामदार' और 'चौकीदार' बनाम 'भागीदार' जैसे जुमलों के जरिए राहुल तथा नेहरू-गांधी परिवार पर जमकर कटाक्ष किए और अपने सांसदों को मेजें थपथपाने के लिए प्रेरित किया।

इस सिलसिले में प्रधानमंत्री ने सामान्य संसदीय शिष्टाचार का पालन करने से भी पूरी तरह परहेज बरता। राहुल गांधी अपना भाषण खत्म करने के बाद शिष्टाचार और सौहार्द दिखाने के लिए प्रधानमंत्री के पास गए थे, लेकिन उन्होंने राहुल की इस पहलकदमी की न सिर्फ हिकारतभरी उपेक्षा की बल्कि अपने भाषण के दौरान भौंडे तरीके से उसकी खिल्ली भी उड़ाई। इतना ही नहीं, एक पुराने प्रसंग का जिक्र करते हुए उन्होंने सोनिया गांधी के हिन्दी बोलने के इतालवी लहजे की भी नकल उतारकर अपने फूहड़पन का भरपूर परिचय दिया।

सत्तापक्ष के दूसरे वक्ताओं ने भी सरकार का पक्ष रखते हुए ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे कि विपक्ष के उठाए सवालों का जवाब मिलता। सभी ने प्रकारांतर से प्रधानमंत्री का स्तुतिगान ही किया। अलबत्ता गृहमंत्री की हैसियत से राजनाथ सिंह ने जरूर अगर-मगर लगाते हुए मॉब लिंचिंग के मुद्दे को छुआ, लेकिन वे ऐसी घटनाओं में लिप्त लोगों को कोई सख्त संदेश देने से साफ बचते दिखे। उन्होंने मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर चिंता तो जताई लेकिन 1984 की सिख विरोधी हिंसा को याद करते हुए, जिसकी कि कोई जरूरत ही नहीं थी। अगर उन्हें 1984 का जिक्र करना जरूरी लगा था तो फिर इस सिलसिले में 2002 के गुजरात तथा खालिस्तानी आतंकवादियों के हाथों पंजाब के 50,000 से अधिक निर्दोषों के मारे जाने को कैसे भुलाया जा सकता है?

अविश्वास प्रस्ताव के दौरान लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की जो भूमिका रही, वह तो एक अलग ही व्यापक बहस की दरकार रखती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि विपक्ष जिस मकसद से अविश्वास प्रस्ताव लाया था, उसमें वह आंशिक तौर पर ही सफल रहा जबकि सत्तापक्ष दबे हुए और डरे हुए मीडिया के जरिये अपने को विजेता दिखाने में कामयाब रहा। अविश्वास प्रस्ताव से सरकार तो गिरना नहीं थी, सो वह नहीं गिरी लेकिन सरकार में बैठे लोग अपने को गिरा हुआ दिखाने से नहीं बच सके।


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