फुटबॉल के मैदान से हटकर अब चर्चा कूटनीति के मैदान की

Author शरद सिंगी| पुनः संशोधित रविवार, 22 जुलाई 2018 (00:50 IST)
दुनिया का सबसे बड़ा और रोमांच से भरपूर फुटबॉल मेला समाप्त हुआ। करोड़ों को रुला लिया, लाखों को हंसा दिया। दुनिया थम गई थी। फुटबॉल का जादू लोगों के सिर चढ़ा हुआ था। कई नामी खिलाड़ी ढेर हो गए और उनके साथ उनके बोझ से उनकी टीमें भी डूब गईं। युवा खिलाड़ियों ने विश्व मंच पर दस्तक दी। संसार का नियम है, पुराने खिलाड़ियों को अलविदा कहना ही पड़ता है। दुनिया के फुटबॉलप्रेमियों की निगाहें अब नए सितारों पर रहेंगी।

विश्व की राजनीति और कूटनीति, जो डेढ़ माह से मैदान के बाहर से तमाशा देख रही थी, विश्व कप प्रतियोगिता समाप्त होते ही पुन: हरकत में आई। इतने दिनों तक उसे शांत बैठने की उसकी आदत जो नहीं है। बहुप्रतीक्षित हुआ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच। ट्रंप और उत्तरी कोरिया के तानाशाह के सिंगापुर में मिलन के पश्चात विश्व के लिए कूटनीति की इस वर्ष की ये दूसरी सबसे बड़ी घटना थी।
ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले अपनी चुनावी सभाओं में रूस से अच्छे संबंधों की वकालत की थी जिसकी उनकी पार्टी के अनेक लोगों सहित विपक्षी उम्मीदवारों ने कड़ी आलोचना की थी। ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के पश्चात रूस के साथ उनके संबंधों के मामले ने तूल पकड़ा। ट्रंप और उनकी टीम पर रूस की सहायता से चुनाव जीतने के आरोप निरंतर लगते जा रहे हैं।

मामला यहीं रुका नहीं। कार्यपालिका के कई विभाग, विशेषकर खुफिया विभाग राष्ट्रपति के चुनावों में रूस की भागीदारी को लेकर सबूत की खोज में जुटे हुए हैं। ट्रंप की चुनावी टीम पर कई प्रकार के सही और गलत आरोप लगते जा रहे हैं किंतु मानना ट्रंप की जीवटता को पड़ेगा कि वे बिना किसी दबाव में आए वे धड़ाधड़ निर्णय ले रहे हैं। कुछ लोग उनके निर्णयों की आलोचना कर रहे हैं, तो कुछ प्रशंसा। किंतु मुख्य बात यह है कि इतनी परेशानियों के बावजूद सरकार और राष्ट्रपति अनिर्णय की स्थिति नहीं हैं।
राष्ट्रपति पुतिन के साथ शिखर वार्ता के पश्चात ट्रंप की आलोचना और कड़ी हो गई है। अमेरिकी मीडिया और आलोचकों के अनुसार ट्रंप ने पुतिन के सामने अपने हथियार डाल दिए हैं, अमेरिका को बेच दिया है और उसे शर्मनाक स्थिति में ला दिया है इत्यादि। दूसरी ओर ट्रंप, मीडिया सहित अपने सभी विरोधियों का अकेले सामना कर रहे हैं।

अमेरिका के यूरोपीय मित्र देश भी अब ट्रंप की आलोचना में शामिल हो गए हैं, क्योंकि 'नाटो' संस्था जिस पर अपने सदस्य देशों विशेषकर यूरोपीय देशों की रूस से रक्षा की जवाबदारी है, उसमें ट्रंप सभी देशों की उनकी क्षमता के अनुसार भागीदारी चाहते हैं और नहीं चाहते कि इस संस्था को चलाने का सारा बोझ अमेरिका पर आए। अमेरिका के कई पूर्व राष्ट्रपति अपनी वाहवाही के लिए नाटो के लिए अरबों डॉलर का खर्च वहन करते थे, जो अब शुद्ध रूप से धन के लाभ-हानि की राजनीति करने वाले ट्रंप को किसी प्रकार की उदारता का बोझ पसंद नहीं।
दुनिया के कुछ देशों को यदि सीधा करना है तो ट्रंप और पुतिन को साथ आना पड़ेगा। उत्तरी कोरिया का मामला हो, सीरिया का मसला हो या का। युद्ध के मैदान में जब तक ये दोनों देश विरोध में एक-दूसरे के आमने सामने खड़े हैं, तब तक विश्व की शांति में हमेशा विघ्न बना रहेगा। दूसरा खतरा और बड़ा है यदि रूस, के साथ मिलकर कोई युति बनाता है तो। ऐसे में विश्व में फिर से शक्ति संतुलन की समस्या हो जाएगी और के लिए भी यह एक खतरे की घंटी होगी। चीन सामरिक शक्ति बढ़ाने के साथ आर्थिक रूप से भी समृद्ध हो रहा है और अमेरिका को चुनौती दे रहा है।
रूस के पास कम से कम आर्थिक ताकत तो नहीं है। अत: अमेरिका के हित में होगा रूस को साधना जिससे वे लोग इत्तेफाक नहीं रखते, जो सिद्धांतों को लेकर यूरोप के समर्थक हैं। इन लोगों को समझना होगा कि अमेरिका को यूरोप का साथ मिलने का पश्चात भी न तो वह इराक से पार पा सका और न ही अफगानिस्तान में सफल हो सका। ऊपर से अब तो सामने चीन है जिसकी महत्वाकांक्षाएं दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही हैं। क्रीमिया को हड़पने को लेकर यूरोप का रूस के साथ विवाद है किंतु एक बड़े लक्ष्य के लिए अमेरिका को इस छोटी बात को अनदेखा करना पड़ेगा, क्योंकि क्रीमिया को लेकर यूरोप के ऊपर भी कम आरोप नहीं हैं।
जाहिर है, ट्रंप का रूस के साथ मित्रता बढ़ाना यूरोप और अमेरिका के विरोधियों को पसंद नहीं है। किंतु जहां तक भारत का प्रश्न है, यदि ये साथ आते हैं तो यह दोस्ती भारत के हित में होगी। आज का यह आलेख संसार के परिदृश्य की समीक्षा के बाद भारत के संदर्भ में हमें इसी निष्कर्ष पर पहुंचाता है।

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