भगवान बुद्ध ने ऐसा तो नहीं कहा था...

वर्तमान में नवबौद्धों द्वारा बुद्ध के शांति संदेश के बजाय नफरत को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है। इसमें उनका मकसद है हिन्दू दलितों को बौद्ध बनाना। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ने भी ऐसा ही किया था? क्या उन्हीं से शिक्षा लेकर ये कार्य कर रहे हैं? क्या नवबौद्ध सचमुच ही के सही मार्ग पर हैं? ऐसे कई सवाल उठ सकते हैं। भारत के बौद्ध समाज को छोड़कर दुनिया में कहीं भी ऐसा बौद्ध समाज ढूंढना मुश्किल है जो नफरत का प्रचार करता हो।

भारत में वर्तमान में एक नया तबका पैदा हो गया है जिसको भारतीय धर्म और इतिहास की जरा भी जानकारी नहीं है। जिसमें 20 से 35 साल के युवा, अनपढ़ और गरीब ज्यादा हैं। इतिहास और धर्म की जानकारी से इन अनभिज्ञ लोगों को अंतरराष्ट्रीय संबंधों और षड़यंत्रों के संबंध में क्या जानकारी होगी? जब जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेता बड़ी-बड़ी बातें करते हैं तो इन अनभिज्ञ लोगों को अच्छा लगता है। वे सभी इनके बहकावे में आ जाते हैं। भड़काकर ही धर्मान्तरण या राजनीतिक मकसद को हल किया जा सकता है।

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आखिर क्या है बौद्ध संप्रदाय : भगवान बुद्ध के समय किसी भी प्रकार का कोई पंथ या संप्रदाय नहीं था न ही उन्होंने इस तरह के कोई निर्देश दिए थे। किंतु, बुद्ध के निर्वाण के बाद द्वितीय बौद्ध संगीति में भिक्षुओं में मतभेद के चलते दो भाग हो गए। पहले को महायान और दूसरे को हीनयान कहते हैं। हीनयान को ही थेरवाद भी कहते हैं। महायान के अंतर्गत बौद्ध धर्म की एक तीसरी शाखा थी वज्रयान। झेन, ताओ, शिंतो आदि अनेक बौद्ध संप्रदाय भी उक्त दो संप्रदाय के अंतर्गत ही माने जाते हैं। चीन, जापान, बर्मा, थाइलैंड, कोरिया सहित आदि सभी पूर्व के देश बौद्ध धर्म अंगीकार कर चुके थे।
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नवबौद्ध संप्रदाय की उत्पत्ति भारत की आजादी के बाद हुई। इसे अम्बेडकरवादियों का नवबौद्ध संप्रदाय कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि अम्बेडकर के नेतृत्व में 14 अक्तूबर 1956 को हुई नवबौद्ध क्रांति के बाद इसे उन गैर हिंदू और गैर बौद्धों ने ज्यादा संचालित किया जो हिन्दू धर्म को तोड़ना चाहते थे। हर साल हिंदू मान्यता की 'विजयादशमी' के दिन नवबौद्ध परंपरा के अनुसार 'धम्मचक्र परावर्तन दिवस' मनाया जाता है। तब धर्मान्तरण का कार्य किया जाता है। धर्मान्तरण के समय हिन्दू धर्म के खिलाफ दिए गए कुछ वचनों का पालन करना होता है जिसे प्रतिज्ञा कहते हैं जो कि 22 हैं। इन प्रतिज्ञाओं के अंत में पढ़ें...
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जाति व्यवस्था : हिन्दू धर्मग्रंथों के चुनिन्दा उद्धरण देकर हिन्दुओं में व्याप्त तथाकथित जातीय भेदभाव को प्राचीन एवं शास्त्र सम्मत सिद्ध करने का वामपंथी एवं प्रचारक मजहबों के कथित विद्वानों द्वारा निरंतर प्रयास होता रहा है। कभी एकलव्य के अंगूठे की बात हो अथवा किसी शम्बूक की दंतकथा हो, चुन चुन कर ऐसे संदर्भ निकाले जाते हैं जिनके माध्यम से हिन्दू समाज की एकता एवं समरसता पर प्रहार किया सके और बड़ी चालाकी से उन कथाओं एवं प्रसंगों को नकार दिया जाता है जो कि हिन्दू विभाजक एजेंडे के विरुद्ध होते हैं।

जाति व्यवस्था प्रत्येक धर्म, समाज, देश में विद्यमान है। उसका स्वरूप कुछ भी हो लेकिन हर धर्म में ऊंच नीच एक सच्चाई है। हिन्दुओं में जातिवाद की भावना का विकृत रूप ईस्वी सन् की प्रारंभिक सदियों में ही तब पनपने लगी जब विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण बढ़ने लगे। उस काल में वर्ण जब जाति बन गए तो कुछ उच्च वर्ग के लोगों के समाज बन गए जिन्होंने पिछड़े लोगों का शोषण करना शुरू किया।
सभ्यता के विकासक्रम में दो तरह के लोग रह गए अगड़े और पिछड़े। इस जाति व्यवस्था को मुगल और अंग्रेज काल में बढ़ावा मिला और फिर भारत की आजादी के बाद राजनीतिज्ञों ने इसका भरपूर दोहन किया जिसके चलते हिन्दू समाज में बिखराव और तनाव की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। इसी का परिणाम यह हुआ कि हिन्दू धर्म के प्रति कुछ लोगों ने नफरत को बढ़ावा देकर समाज में विभाजन पैदा कर दिया।

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भगवान बुद्ध ने तो ऐसा नहीं कहा था : उल्लेखनीय है कि भगवान बुद्ध ने कभी भी नफरत का संदेश नहीं दिया था न ही उन्होंने कभी नया धर्म अथवा संप्रदाय खड़ा किया था। हां, उनके अनुयायी जरूर बौद्ध कहलाए। उन्होंने कभी भी ऐसा नहीं कहा था कि जिससे लोगों के मन में उनके प्रति घृणा उत्पन्न हो या किसी का दिल दुखे। उन्होंने कभी भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम और कृष्ण के खिलाफ कुछ नहीं बोला था। बुद्ध ने तो निर्वाण पथ के संबंध में अपने प्रवचन दिए थे जिसके प्रभाव के चलते उनके काल में लोग बौद्ध मार्ग पर चल पड़े थे। बुद्ध ने तो कभी भी कोई 22 प्रतिज्ञाएं नहीं दिलवाई थी।
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अब जरा भगवान बुद्ध के शिष्यों पर एक नजर डाले...
जब भारत में आर्य या कहें कि वैदिक धर्म का पतन हो चला था। तरह-तरह की जातियों में बंटकर लोग मनमानी पूजा, पाठ और कर्मकांड में विश्वास करने लगे थे। लगभग इसी दौर में 563 ईसा पूर्व भगवान बुद्ध का अवतरण हुआ। गौतम बुद्ध एक क्षत्रिय राजकुमार थे। बुद्ध से प्रभावित होकर भारत में भिक्षु होने की होड़ लग गई थी। बुद्ध के उपदेशों का चीन और कुछ अन्‍य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी प्रचार हुआ। बुद्ध पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने धर्म को दुनिया की सबसे बेहतर आध्यात्मिक व्यवस्था दी और संपूर्ण ज्ञान को श्रे‍णीबद्ध किया।

बुद्ध दुनिया के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाकर समाज को धार्मिक आधार पर एक करने का कार्य किया। भगवान बुद्ध ने अपना दर्शन या धर्म नफरत के आधार पर खड़ा नहीं किया था। यदि हम आज के जातिवादी माहौल के संदर्भ में बात करें तो भगवान बुद्ध के शिष्यों में ब्राह्ण, क्षत्रिय और वैश्य और शूद्र समाज के लोग बहुतायत थे। महाकश्यप ने बौद्ध धर्म को दुनियाभर में प्रचारित करने का कार्य किया जो कि जाति के आधार पर एक ब्राह्मण थे।

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* बुद्ध के प्रमुख गुरु थे- गुरु विश्वामित्र, अलारा, कलम, उद्दाका रामापुत्त आदि। यह गुरु कौन थे जरा नवबौद्धों को यह भी जान लेना चाहिए।

* प्रमुख शिष्य थे- आनंद, अनिरुद्ध, महाकश्यप, रानी खेमा (महिला), महाप्रजापति (महिला), भद्रिका, भृगु, किम्बाल, देवदत्त, उपाली आदि।

*प्रमुख प्रचारक- अंगुलिमाल, मिलिंद (यूनानी सम्राट), सम्राट अशोक, ह्वेन त्सांग, फा श्येन, ई जिंग, हे चो, बोधिसत्व आदि।

* गुरु विश्वामित्र : गौतम बुद्ध सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ तो पढ़े ही, राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हांकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता था।

* गुरु अलारा कलम और उद्दाका रामापुत्त : ज्ञान की तलाश में सिद्धार्थ घूमते-घूमते अलारा कलम और उद्दाका रामापुत्त के पास पहुंचे। उनसे उन्होंने योग-साधना सीखी। कई माह तक योग करने के बाद भी जब ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई तो उन्होंने उरुवेला पहुंच कर वहां घोर तपस्या की।

* आनंद : यह बुद्ध और देवदत्त के भाई थे और बुद्ध के दस सर्वश्रेष्ठ शिष्यों में से एक हैं। आनंद को बुद्ध के निर्वाण के पश्चात प्रबोधन प्राप्त हुआ। वह अपनी स्मरण शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे।

* महाकश्यप : महाकश्यप मगध के ब्राह्मण थे, जो तथागत के नजदीकी शिष्य बन गए थे। इन्होंने प्रथम बौद्ध अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

* रानी खेमा : रानी खेमा सिद्ध धर्मसंघिनी थीं। यह बीमबिसारा की रानी थीं और अति सुंदर थीं। आगे चलकर खेमा बौद्ध धर्म की अच्छी शिक्षिका बनीं।

उपरोक्त लिखित सिर्फ थोड़े से ही नाम है, लेकिन ऐसे हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और थे जिन्होंने बौद्ध धर्म को खड़ा किया। उस काल में चारों वर्णों में इतना भेद नहीं था जितना की मध्यकाल, अंग्रेज काल और वर्तमान काल में सुनने, पढ़ने और देखने को मिलता है। यदि नवबौद्ध अच्छे से बौद्ध और हिन्दू इतिहास का अध्ययन करेंगे तो संभवत: उनके दिलों से नफरत निकल जाए।
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अब जरा बौद्ध और हिंदू धर्म के मंदिरों पर रिसर्च कर लें...
यदि बौद्ध धर्म नफरत के आधार पर खड़ा होता या उनकी हिन्दुओं से कोई लड़ाई होती तो निश्चि ही उनके साझा मंदिर नहीं होते। ऐसे कई प्राचीन मंदिर है जहां पर विष्णु और बुद्ध की साथ-साथ मूर्तियां हैं। अजंता और एलोरा को अच्छे से देख लें। बर्मा, थाइलैंड के बौद्ध मंदिरों को भी अच्छे से देख लें।

1. महाबोधि मंदिर : महाबोधि मंदिर बिहार के बोध गया में स्थित है। गया हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ स्थल है जहां पिंडदान और तर्पण किया जाता है। यह वह स्थान है जहां गौतम बुद्ध ने प्राचीन बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर ज्ञान प्राप्त किया था। मंदिर को गौर से देखने पर हिन्दू और बौद्ध धर्मों के मिलन की संयुक्त संस्कृतियों की छवि देखने को मिलती है।

2. महापरिनिर्वाण मंदिर : महापरिनिर्वाण मंदिर कुशीनगर उत्तर प्रदेश में स्थित है। इस मंदिर में बुद्ध की 6 फुट लंबी मूर्ति है, जो हमेशा एक चुनरी से ढंकी रहती है। मूर्ति का सिर्फ चेहरा दिखाई देता है।

3. रामाभर स्तूप : रामाभर स्तूप मंदिर महापरिनिर्वाण मंदिर से 1.5 कि.मी दूरी पर स्थित है। यह वह स्थान है जहां बुद्ध की अंत्येष्टि की गई थी। यहां बनाया गया मंदिर लगभग 49 फुट ऊंचाई का है। मंदिर की बनावट बेहद अनोखी और आकर्षक है।

4. बामियान की बौद्ध गुफाएं : अफगानिस्तान में बामियान नामक स्थान पर हिन्दू और बौद्ध धर्म से जुड़ी सैंकड़ों गुफाएं हैं जिनमें से कुछ में भगवान बुद्ध की विशालकाय मूर्तियां हैं।

5. अजंता ऐलोरा की गुफाएं : अजंता-एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप स्थित‍ हैं। एलोरा की गुफाओं में हिंदू, जैन और बौद्ध तीन धर्मों के प्रति दर्शाई आस्था का त्रिवेणी संगम का प्रभाव देखने को मिलता है।

6. बाघ की गुफाएं : यह गुफाएं भी हिंदू और बौद्ध धर्म की साझा संस्कृति और अध्यात्म को प्रदर्शित करती है।

7. थाईलैंड एक बौद्ध राष्ट्र है लेकिन बौद्ध बहुल देश होने के बावजूद हिंदू धर्म में अटूट आस्था रखता है। इसी तरह बर्मा, कंबोडिया, लागोस, जापान और श्रीलंका के बौद्ध स्तूपों और मंदिरों पर आपको स्पष्ट रूप से हिन्दू प्रतीकों और संस्कृति की स्पष्ट छाप मिल जाएगी।

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ये है वो 22 प्रतिज्ञा....
1- मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
2- मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
3- मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
4- मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूं।
5- मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे। मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूं।
6- मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंडदान दूंगा।
7- मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूंगा।
8- मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूंगा।
9- मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूं।
10- मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूंगा।
11- मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूंगा।
12- मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूंगा।
13- मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूंगा तथा उनकी रक्षा करूंगा।
14- मैं चोरी नहीं करूंगा।
15- मैं झूठ नहीं बोलूंगा।
16- मैं कामुक पापों को नहीं करूंगा।
17- मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूंगा।
18- मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूंगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूंगा।
19- मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूं जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्म के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूं।
20- मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूं की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है।
21- मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूं (इस के द्वारा)।
22- मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूंगा।

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