इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है!

बात 1978 की है। केंद्र सहित कई राज्यों में जनता पार्टी की सरकारें थीं। विपक्ष में थी। उसकी शीर्ष नेता इंदिरा गांधी 1977 का चुनाव हार चुकने के बाद कर्नाटक के चिकमंगलूर से उपचुनाव जीतकर लोकसभा में आ चुकी थीं। उनकी लोकसभा में वापसी जनता पार्टी के कई नेताओं को नहीं सुहा रही थी। तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह के साथ ही राजनारायण, जार्ज फर्नांडीस और जनता पार्टी में जनसंघ घटक के नेता इंदिरा गांधी को आपातकाल की ज्यादतियों के लिए 'सबक’ सिखाने की गरज से उन्हें लोकसभा से निष्कासित करने पर आमादा थे। हालांकि उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई, जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, मधु दंडवते समेत कई नेता नहीं चाहते थे इंदिरा गांधी के खिलाफ इस तरह का कदम उठाया जाए। उनका मानना था कि ऐसा करना न सिर्फ अलोकतांत्रिक होगा, बल्कि इससे लोगों में इंदिरा गांधी के प्रति सहानुभूति पैदा होगी और जनता पार्टी को राजनीतिक नुकसान होगा। लेकिन विवेक के मुकाबले बदला लेने की जिद भारी रही और लोकसभा ने बहुमत से प्रस्ताव पारित कर इंदिरा गांधी को सदन से निष्कासित कर दिया। इतना ही नहीं, उन्हें गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया। अंतत: विवेक सही साबित हुआ। अन्यान्य कारणों के चलते जनता पार्टी टूट गई। देश की जनता ने इंदिरा गांधी को आपातकाल के लिए माफ कर दिया और वे फिर भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौट आईं।

लगता है इतिहास अपने को दोहरा रहा है, कुछ अलग तरीके से ही सही। जनता पार्टी की सरकार ने जैसा इंदिरा गांधी के साथ किया था, वैसा ही मौजूदा भाजपा सरकार के दबाव में समाजवादी नेता और संसद के वरिष्ठतम सदस्य शरद यादव के साथ किया है। इंदिरा गांधी को बहुमत के दम पर संसद से बाहर किया था तो शरद यादव को बाहर करने के लिए दलबदल विरोधी कानून का नाजायज सहारा लिया गया।

शरद यादव अब संसद के सदस्य नहीं रहे। राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने दलबदल निरोधक कानून की मनमानी और हास्यास्पद व्याख्या करते हुए संसद के इस वरिष्ठतम सदस्य को राज्यसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य करार दे दिया। शरद यादव के साथ ही उनके एक अन्य सहयोगी अली अनवर की भी राज्यसभा की सदस्यता समाप्त कर दी गई। यह सही है कि दलबदल करने या सदन में किसी मसले पर पार्टी द्वारा व्हिप का उल्लंघन करने पर किसी भी सांसद या विधायक को कानून के तहत अयोग्य ठहराने का अधिकार संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति को होता है।

पहले भी लोकसभा, राज्यसभा और कई राज्यों में विधानसभा सदस्यों की सदस्यता दलबदल विरोधी कानून के तहत समाप्त हुई है, लेकिन उन मामलों में संबंधित सदनों के अध्यक्ष या सभापति ने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए ऐसा किया है, लेकिन शरद यादव और अली अनवर के बारे में सभापति ने दोनों का पक्ष सुने बगैर ही उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया। जबकि दोनों सदस्यों ने मौखिक या लिखित तौर पर न तो अपनी पार्टी से इस्तीफा देने का ऐलान किया था और न ही सदन के भीतर किसी मसले पर अपनी पार्टी द्वारा जारी व्हिप का उल्लंघन किया था।

दरअसल यह पूरा विवाद जनता दल यू के विभाजन से जुडा हुआ है और मामला फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। इसी विवाद के चलते नीतीश कुमार की अगुवाई वाले धड़े ने राज्यसभा के सभापति के समक्ष एक याचिका पेश करते हुए उनसे मांग की थी कि शरद यादव और अली अनवर अब उनकी पार्टी में नहीं हैं, लिहाजा उनकी राज्यसभा की सदस्यता समाप्त की जाए। सभापति ने इसी याचिका के आधार पर शरद यादव और अली अनवार को सदन की सदस्यता के अयोग्य करार दे दिया। यह फैसला देने में राज्यसभा के सभापति ने जिस तरह की फुर्ती दिखाई, वह हैरान करने वाली है।

शरद यादव और अली अनवर के अलावा कुछ अन्य सांसदों के ऐसे ही मामले लंबे समय से राज्यसभा की आचार समिति के समक्ष विचारधीन हैं। विजय माल्या जैसे आर्थिक अपराधी का मामला तो ऐसा था कि बिना किसी विलंब के उसकी सदस्यता समाप्त हो जानी चाहिए थी लेकिन उसका मामला भी सदन की आचार समिति के पास गया और आचार समिति की सिफारिश पर सभापति ने उसकी सदस्यता समाप्त करने का फैसला किया। धोखाधड़ी और भ्रष्टाचरण के आरोपी कुछ अन्य सांसदों के मामलों में भी इतनी जल्दी फैसला नहीं सुनाया गया जितनी जल्दबाजी शरद यादव और अली अनवर के मामले में दिखाई गई।

दरअसल, नियम और परंपरा के मुताबिक जब भी ऐसा कोई मामला सभापति के समक्ष आता है तो वे उसे सदन की आचार समिति को विचारार्थ भेजते हैं। आचार समिति उस पर विचार कर अपनी रिपोर्ट सभापति को देती है, जिसके आधार पर सभापति अपना फैसला सुनाते हैं, लेकिन यादव और अनवर के मामले में ऐसा नहीं हो सका। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में विभिन्न विपक्षी दलों के लगभग डेढ़ दर्जन सदस्यों ने इस बारे में सभापति से मुलाकात कर शरद यादव और अली अनवर से जुडे मामले को सदन की आचार समिति के पास भेजने का अनुरोध भी किया था लेकिन सभापति ने उस अनुरोध की अनदेखी करते हुए मामले को आचार समिति को न भेजते हुए उस पर खुद ही फैसला ले लिया।

सभापति ने यह फैसला लेते हुए इस बात पर भी गौर करना मुनासिब नहीं समझा कि शरद यादव इस समय देश के सबसे वरिष्ठ सांसद हैं। देश के संसदीय इतिहास में वे एकमात्र ऐसे सांसद हैं जिन्होंने कुल ग्यारह बार (सात बार लोकसभा और चार बार राज्यसभा) संसद सदस्य के नाते शपथ ली है। दो बार उन्होंने अपनी अंतर्रात्मा की आवाज पर नैतिकता के तकाजे का सम्मान करते हुए लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया है। वे सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से भी नवाजे जा चुके हैं। सदन में किसी भी मसले पर जब वे बोलते हैं तो पूरा सदन और देश उनकी बात को गंभीरता से सुनता है। सभापति ने इन सब बातों पर तो गौर ही नहीं किया, उन्होंने प्राकृतिक न्याय के तकाजे की रोशनी में शरद यादव और अली अनवर का पक्ष भी नहीं सुना और नीतीश समर्थक एक जद यू सांसद की याचिका पर अपना फैसला सुना दिया।

आमतौर पर न्यायपालिका संसद या विधानमंडलों से जुड़े ऐसे मामलों में सदन के मुखिया यानी स्पीकर या सभापति के फैसले में कोई दखल नहीं देती है, लेकिन शरद यादव को राज्यसभा की सदस्यता के अयोग्य करार दिए जाने के वेंकैया नायडू के फैसले पर न्यायपालिका ने गौर करना मुनासिब समझा है। शरद यादव ने सभापति के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्यसभा के सभापति और जद यू सांसद आरसीपी सिंह को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है।

आरसीपी सिंह वही हैं जिनकी याचिका पर राज्यसभा के सभापति ने शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता खत्म करने का फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने यद्यपि शरद यादव को संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने की अनुमति नहीं दी है लेकिन अपने अगले आदेश तक शरद यादव को सांसद होने के नाते मिल रही आवास सुविधा तथा वेतन-भत्ते जारी रखने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट का यह आदेश अंतरिम है लेकिन तात्कालिक तौर पर राज्यसभा के सभापति के फैसले पर एक प्रतिकूल टिप्पणी और जद यू के नीतीश खेमे के लिए स्पष्ट तौर पर झटका तो है ही।

राज्यसभा की अपनी सदस्यता पर सभापति के फैसले पर शरद यादव का कहना है कि उनकी लड़ाई लोकतंत्र और संविधान बचाने के लिए है। इस लड़ाई में राज्यसभा की सदस्यता तो क्या, इससे भी बड़ी कुर्बानी देनी पड़ सकती है। उन्होंने पहले भी दो बार लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया है (एक बार लोकतंत्र की रक्षा की खातिर और दूसरी बार सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के प्रतिमान बनाए रखने के लिए अपनी आत्मा की आवाज पर)। उनका कहना है- 'मैं लगभग चार दशक से संसद का सदस्य हूं और मैंने हमेशा ही सदन की अध्यक्षीय आसंदी का सम्मान किया है। राज्यसभा के मौजूदा सभापति का भी मैं व्यक्तिगत तौर पर सम्मान करता हूं। लेकिन मेरे मामले में उनका फैसला नैसर्गिक न्याय के अनुरूप नहीं है, लिहाजा मुझे बेहद अफसोस के साथ उनके फैसले को अदालत में चुनौती देनी पड़ी।

शरद यादव के साथ ही राज्यसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य करार दिए गए अली अनवर ने भी सभापति के फैसले को अदालत में चुनौती दी है, जिस पर अभी सुनवाई होना है। अली अनवर का कहना है कि हमारी सदस्यता दलबदल विरोधी कानून के तहत समाप्त की गई है, लेकिन हमने तो कोई दलबदल किया ही नहीं है। हम तो पहले भी जद यू में थे आज भी वहीं हैं। दलबदल तो उन लोगों ने किया है, जो बिहार की जनता के फैसले का मखौल उड़ाकर भाजपा के हमसफर बन गए हैं। बिहार की जनता ने राजद और कांग्रेस के साथ हमारे महागठबंधन को भाजपा के खिलाफ तीन चौथाई के लगभग बहुमत से जीता कर पांच साल के लिए सत्ता सौंपी थी।

हमारे कुछ सहयोगी महज डेढ़ साल में ही उस ऐतिहासिक जनादेश को ठेंगा दिखाकर भाजपा के साथ जा खड़े हुए, लेकिन हम तो अभी भी जनादेश का सम्मान करते हुए शरद यादव के नेतृत्व में वहीं खड़े हैं, जहां खड़े रहने का जनादेश हमें मिला था। इस बारे में जद यू (शरद खेमा) के महासचिव जावेद रजा का दावा है कि बिहार, झारखंड, जम्मू-कश्मीर की राज्य पार्टी इकाइयों के अलावा बाकी लगभग सभी राज्यों की पार्टी इकाइयां तथा राष्ट्रीय कार्यकारिणी तथा राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों का दो तिहाई से ज्यादा बहुमत हमारे साथ है। इसलिए दलबदल कानून के तहत कार्रवाई तो उन लोगों पर होनी चाहिए, जो लोग बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं।

अपनी और शरद यादव की राज्यसभा की सदस्यता समाप्त किए जाने के बारे में अली अनवर का कहना है कि मामला अभी अदालत के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए वे इस फैसले पर कोई अतिरिक्त टिप्पणी नहीं करेंगे, लेकिन यह तय मानिए कि मौका आने पर बिहार का शोषित-पीड़ित-वंचित तबका मौका आने पर उन लोगों को जरुर जोरदार सबक सिखाएगा जिन्होंने बिहार की जनता के जनादेश का अपमान किया है। इसका बड़ा खामियाजा तो भाजपा को भुगतना पड़ेगा, क्योंकि बिहार में जनादेश के साथ खिलवाड़ किए जाने को बिहार के बाहर भी लोकतंत्र और भाईचारे में यकीन रखने वाले लोगों ने पसंद नहीं किया है।

राज्यसभा की सदस्यता के सवाल पर शरद यादव और अली अनवर की याचिका पर अदालत का अंतिम फैसला चाहे जो आए, बहरहाल इस प्रकरण ने सत्ता में बैठे लोगों द्वारा दलबदल कानून के दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति और इस कानून की विसंगतियों को एक बार फिर शिद्दत से रेखांकित किया है। इस कानून को लेकर वे सारी शंकाएं अब अपने साकार रूप में लगातार सामने आ रही हैं, जो इस कानून के बनते वक्त मधु लिमये जैसे चिंतक राजनेताओं और विधिवेत्ताओं ने जताई थीं।

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