इत्तेफाक : फिल्म समीक्षा

अभय चोपड़ा ने निर्देशन के मैदान में उतरने के लिए अपने दादा बीआर चोपड़ा की 48 वर्ष पुरानी फिल्म 'इत्तेफाक' से प्रेरणा लेकर फिल्म बनाई है। 48 वर्ष पुरानी इस को एक क्लासिक फिल्म माना जाता है और इसको कुछ नए टर्न और ट्विस्ट के साथ अभय ने दोहराया है। यह एक मर्डर मिस्ट्री फिल्म है जिसमें दो हत्याएं हुई हैं। दो लोगों पर शक है और उनकी दो कहानियां हैं। एक पुलिस इंस्पेक्टर का कहना है कि इन दोनों के बीच में से हमें सच को खोजना है।

विक्रम सेठी ‍(सिद्धार्थ मल्होत्रा) और माया (सोनाक्षी सिन्हा) शक के दायरे में हैं। विक्रम पर अपनी पत्नी और माया के पति के खून का आरोप है और विक्रम का कहना है कि ये दोनों हत्याएं उसने नहीं की है। पुलिस ऑफिसर देव (अक्षय खन्ना) को इस पहेली सुलझाने के लिए केवल तीन दिन का समय मिलता है।

देव थोड़ी बात विक्रम की सुनता है और थोड़ी माया की। दोनों की कहानी को उनके वर्जन के अनुसार दिखाया गया है। जो दिक्कत देव के सामने आती हैं उसका सामना दर्शक भी करता है। देव अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाता है और दर्शक अपने। शक की सुई कभी विक्रम की तरफ झुकती है और कभी माया की तरफ। कभी-कभी ये भी लगता है कि कातिल कोई तीसरा तो नहीं है।

इत्तेफाक में लेखन की कमी समय-समय पर उभरती रहती है। एक थ्रिलर फिल्म में जो कसावट होना चाहिए कि दर्शक सीट पर चिपक कर बैठे वो बात पूरी फिल्म में नजर नहीं आती। कभी यह फिल्म सरपट दौड़ती है, थ्रिल पैदा करती है तो कभी आर्ट मूवी की तरह स्लो हो जाती है। खासतौर पर पहला हाफ बहुत धीमा है।

पुलिस ऑफिसर देव को बेहद स्मार्ट बताया गया है, लेकिन माया और विक्रम से पूछताछ के दौरान उसके प्रश्नों में किसी तरह की स्मार्टनेस नहीं झलकती। उसे केस सुलझाने के लिए सिर्फ तीन दिन मिलते हैं, लेकिन वह इस तरह से काम करता है मानो उसके पास खूब समय हो।

हत्याओं को लेकर विक्रम और माया के अपने-अपने किस्से हैं। हत्या होने के बाद जिस तरह की हड़बड़ी मचना चाहिए वो नदारद है। सभी किरदार बेहद शांत नजर आते हैं मानो हत्या करना उनका बाएं हाथ का खेल हो।

बीच-बीच में हवलदार को रख कर जो सीन बनाए गए हैं वो फिल्म की गंभीरता को भंग करते हैं क्योंकि इनमें कोई नई बात नहीं है और ऐसा हम कई फिल्मों में देख चुके हैं।

फिल्म इंटरवल के बाद थोड़ स्पीड पकड़ती है और क्लाइमैकस चौंकाता है। यह अंत कुछ लोगों को यह अच्छा लगेगा वहीं कुछ का मानना होगा कि ऐसे नहीं, ऐसे अंत किया जाना था। बावजूद इसके अंत में दर्शकों को चौंकाने वाला स्ट्रोक अच्छा है और कुछ हद तक फिल्म की कमजोरी को ढंक लेता है।

निर्देशक के रूप में अभय चोपड़ा का काम अच्छा है। वे शॉट तो अच्छे ले लेते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट पर थोड़ा ध्यान देते तो फिल्म जबरदस्त होती। उन्होंने फिल्म की अवधि कम रखी है, गाने नहीं रखे हैं और यह प्लस पाइंट्स माने जाएंगे। कहानी कहने के लिए ऐसी मुंबई को चुना है जब गहरे बादल छाए हैं, बारिश भी हो रही है, रोशनी कम है और यही मनोदशा देव की भी है।
अभिनय के मामले में फिल्म के दो प्रमुख कलाकार कमजोर पड़े हैं। सिद्धार्थ मल्होत्रा अपने अभिनय से प्रभावित नहीं कर पाए। सोनाक्षी सिन्हा एक ही एक्सप्रेशन लिए पूरी फिल्म में नजर आईं। अक्षय खन्ना ही पूरा जोर लगाते नजर आए और उन्हें अच्छा फुटेज भी मिला है।



सिनेमाटोग्राफी बढ़िया है और फिल्म का तकनीक पक्ष मजबूत है। ज्यादा उम्मीद लेकर सिनेमाघर में नहीं जाए तो ही 'इत्तेफाक' पसंद आ सकती है।

बैनर : रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट, बीआर फिल्म्स, धर्मा प्रोडक्शन्स
निर्माता : रेणु रवि चोपड़ा, गौरी खान, करण जौहर
निर्देशक : अभय चोपड़ा
संगीत : अमाल मलिक
कलाकार : सिद्धार्थ मल्होत्रा, सोनाक्षी सिन्हा, अक्षय खन्ना
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 1 घंटा 47 मिनट 48 सेकंड
रेटिंग : 2.5/5

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