न्यूटन : फिल्म समीक्षा


प्रजातंत्र के लिए नेता चुनने की जो प्रक्रिया चुनी गई क्या वो सही है? क्या इससे जनता का भला हो रहा है? क्या चुनाव के द्वारा सही व्यक्ति चुने जाते हैं? क्या भारत के भीतरी इलाकों में रहने वाले गरीब व्यक्तियों को इससे फायदा हो रहा है? इस तरह के सवाल फिल्म खड़े करती है।

भारत में लोकतंत्र, व्यवस्था और कानून इसलिए ही बनाए गए ताकि लाइन में बैठे आखिरी व्यक्ति तक इसका फायदा पहुंचे, लेकिन इनके बीच की पतली गलियों का सहारा लेकर कुछ लोगों ने इन बातों को मखौल बना दिया है। शहरों में ही चकाचौंध और विकास दिखता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के लोग तो मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरसते हैं, ऐसे में क्या हमारे लोकतंत्र पर हमें गर्व करना चाहिए? निर्देशक अमित मसूरकर और लेखक मयंक तिवारी ने अपनी फिल्म के जरिये इस पर कड़ा प्रहार किया है।

फिल्म का नाम न्यूटन क्यों है? नूतन कुमार (राजकुमार राव) को यह नाम पसंद नहीं है इसलिए वह नू को न्यू और तन को टन बना कर न्यूटन कुमार बन जाता है। सरकारी नौकरी लगती है और उसे छत्तीसगढ़ में नक्सली प्रभावित सुदूर एक गांव में चुनाव अधिकारी बना कर भेजा जाता है। न्यूटन बेहद ईमानदार और आदर्शवादी है। चुनाव की प्रक्रिया पर उसका पूरा विश्वास है और वह निष्पक्ष चुनाव करवाना चाहता है।

हेलिकॉप्टर के जरिये उसे जंगल में पहुंचाया जाता है, जहां से वह सैनिकों और अपने साथियों लोकनाथ (रघुवीर यादव) और माल्को (अंजलि पाटिल) के साथ आठ किलोमीटर पैदल चलकर एक खस्ताहाल स्कूल पहुंचता है जहां पर वोट डाले जाने हैं। 76 आदिवासियों के लिए यह मतदान केन्द्र बनाया गया है जहां कदम-कदम पर खतरा है।

मिलिट्री ऑफिसर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) का कहना है कि मतदान केन्द्र तक जाया ही नहीं जाए क्योंकि नक्सलियों ने चुनाव के बहिष्कार के लिए कहा है और कोई भी वोट डालने नहीं आएगा, लेकिन न्यूटन कुमार की जिद के आगे उसे झुकना पड़ता है।

मतदान केन्द्र बनाया जाता है और लंबे समय तक वोट डालने कोई नहीं आता। आखिरकार आत्मा सिंह गांव वालों को डरा धमका कर मतदान केन्द्र तक लाता है। उन्हें मशीन के जरिये वोट डालना ही नहीं आता। उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है, वे हिंदी नहीं समझते और माल्को उन्हें उनकी भाषा में समझाती है।

वोट देने के लिए आत्मा सिंह लोगों को इसलिए इकट्ठा करता है क्योंकि विदेशी मीडिया वहां आने वाला है और लोकतंत्र की सही छवि उनके आगे दिखानी है। धीरे-धीरे न्यूटन को हकीकत समझ आने लगती है और उसके आदर्श चकनाचूर होने लगते हैं। जब वह आदिवासियों की हालत देखता है तो उसका दिल पसीज उठता है। इन आदिवासियों का महज वोट के लिए उपयोग किया जा रहा है और चुनाव के बाद उन्हें भूला दिया जाएगा।

न्यूटन कुमार एक आदिवासी को बोलता है कि आप वोट दीजिए ताकि आपकी हालत बदल जाएगी। सड़क, बिजली, अस्पताल आपको मिलेंगे, लेकिन हर बार वह आदिवासी जवाब देता है कि कुछ नहीं बदलेगा।

फिल्म में आदिवासियों के जो दबे, कुचले, निराश, शोषित चेहरे दिखाए हैं वो आपको दहला देते हैं। सोचने पर ये मजबूर करते हैं कि भारत की बड़ी आबादी को अभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है और आजादी के वर्षों बाद भी यह हालत है। फिल्म सवाल करती है, लेकिन न्यूटन कुमार जैसे लोगों के जरिये आशा का साथ भी नहीं छोड़ती। न्यूटन कुमार ईमानदारी और मुस्तैदी से अपने काम में जुटा हुआ है और उसे विश्वास है कि एक दिन सब कुछ बदलेगा।

फिल्म की ताकत इसके रियल लोकेशन हैं। शहरी चकाचौंध से दूर यह ऐसे भारत में ले जाती है जिसकी कई लोगों ने कल्पना भी नहीं की होगी। मकान, हॉल, जंगल, स्कूल सभी फिल्म में अपनी तीखी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

ने फिल्म को हल्का-फुल्का रखा है और चुनाव प्रक्रिया के जरिये कई अनकही बातों को कहा है। न्यूटन कुमार और आत्मा सिंह की नोकझोंक दिलचस्प है और आपको हंसने का मौका देती है। आत्मा सिंह नियम-कायदे पर चलने वाला आदमी है। उसका मानना है कि सारी प्रक्रिया ठीक से हो, नियम से हो और नियमों के फेर में पड़ कर वह कई बार लाइन के पार भी चला जाता है। इसको लेकर न्यूटन कुमार से उसके मतभेद होते रहते हैं।

फिल्म की गति कुछ जगह दिक्कत देती है, खासतौर पर जब चुनाव करवाने के लिए जंगल में सभी किरदार पैदल जाते हैं। ये यात्रा बहुत लंबी हो जाती है। तकनीकी रूप से भी फिल्म थोड़ी कमजोर है। सिनेमाटोग्राफी का स्तर बहुत ऊंचा नहीं है। 'ईमानदारी के अवॉर्ड में सबसे ज्यादा बेईमानी होती है' और 'वर्दी में विनम्रता भी धमकी लगती है' जैसे उम्दा संवाद सुनने को मिलते हैं।

लगातार अपने अभिनय से चौंकाते रहे हैं और एक बार फिर उनका अभिनय बेहतरीन रहा है। न्यूटन कुमार की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा उनके अभिनय से झलकती है। रघुवीर यादव मंजे हुए कलाकार हैं और लंबे समय बाद फिल्म में नजर आए हैं। पंकज त्रिपाठी का अभिनय शानदार हैं। आत्मा सिंह के रूप में रौबीले ऑफिसर में वे खूब जमे हैं। उम्दा कलाकारों के बीच अंजलि पाटिल अपनी छाप छोड़ती हैं।

न्यूटन को वक्त दिया जाना चाहिए।

बैनर : दृश्यम फिल्म्स
निर्माता : मनीष मूंदड़ा
निर्देशक : अमित मसूरकर
संगीत : नरेन चंदावरकर, बैनेडिक्ट टेलर
कलाकार : राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, अंजलि पाटिल, रघुवीर यादव
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 1 घंटा 46 मिनट 27 सेकंड
रेटिंग : 4/5

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