सिमरन : फिल्म समीक्षा

शाहिद और अलीगढ़ जैसी गंभीर फिल्म बनाने वाले हंसल मेहता ने इस बार हल्की-फुल्की फिल्म 'सिमरन' में हाथ आजमाया है। इस फिल्म में कहानी नहीं बल्कि किरदार महत्वपूर्ण है। हंसल को जब जैसी एक्ट्रेस मिल गई तो वे निश्चिंत हो गए। ऐसा लगा कि कैमरे को उन्होंने कंगना के पीछे लगा दिया और 'सिमरन' के रूप में उसकी सारी गतिविधियों को कैंद कर लिया। इस फिल्म ने कंगना को अभिनय करने का भरपूर अवसर दिया है और कंगना ने इसका पूरा फायदा भी उठाया है। यदि कहानी का साथ उन्हें मिल जाता तो यह फिल्म यादगार बन सकती थी।

कंगना का किरदार प्रफुल पटेल उर्फ एक पहाड़ी नदी की तरह है जो जहां राह मिलती है वहां बहती चली जाती है। वह कब क्या और क्यों कर बैठे उसे भी नहीं पता। उसका अप्रत्याशित स्वभाव ही फिल्म में रूचि बनाए रखता है। वह किसी बंधन को नहीं मानती और हवा की तरह बहती है। फिल्म में एक संवाद भी है जिसमें सिमरन
एक प्राकृतिक स्थान पर जाकर हवा को महसूस करती है और कहती है कि यहां आना उसे इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि यहां कोई इमारत हवा को रोक नहीं पाती और कोई रास्ता हवा को बांध नहीं पाता। इन शब्दों से ही उसका किरदार बयां हो जाता है।

सिमरन 30 की हो गई है, तलाकशुदा है, यूएस में रहती है और मां-बाप उसकी दूसरी शादी करना चाहते हैं। होटल में हाउसकीपिंग का काम करने वाली अपने मां-बाप से तंग आकर एक अलग घर खरीदने के लिए पैसे जमा कर रही है। एक बार वह लास वेगास स्थित केसिनो पहुंच जाती है और जुए में सारी रकम हार जाती है। एक गुंडे से पैसे लेकर फिर दांव लगाती है, लेकिन किस्मत साथ नहीं देती। गुंडा अपने पैसों के लिए उसके पीछे पड़ जाता है। हार कर सिमरन बैंक लूट कर पैसे जमा करती है।

फिल्म की कहानी संदीप कौर नामक लड़की से प्रेरित है जिसे 'बॉम्बशेल बैंडिट' के नाम से जाना जाता है। संदीप कौर ने अकेले ही यूएस में कुछ बैंक लूट लिए थे क्योंकि वह भी लास वेगास के केसिनो में भारी रकम हार गई थी और उसे कर्ज चुकाना था।

फिल्म में बैंक लूटने वाले दृश्यों को बहुत ही हल्के से लिया गया है। बड़ी आसानी से सिमरन बैंक लूटती है। हालांकि इन दृश्यों के जरिये अमेरिकन्स के मजे लिए गए हैं कि वे कितने डरपोक और बेवकूफ होते हैं और बातों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं, लेकिन कहीं न कहीं ये दृश्य अखरते हैं।

सिमरन फिल्म के साथ दिक्कत यह है कि यदि आपको यह किरदार पसंद नहीं आता तो आप इस फिल्म से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। वैसे भी इंटरवल तक फिल्म में ज्यादा कुछ घटता नहीं है और रफ्तार भी सुस्त है। इंटरवल के बाद ही फिल्म में थोड़ा मजा आता है।

फिल्म में कुछ सीन मजेदार हैं तो कुछ बेमतलब से लगते हैं। कंगना और उसके पिता के नोकझोक वाले सीन कुछ ज्यादा ही लंबे हो गए हैं। फिल्म की शुरुआत में दिखाया गया है कि कंगना की ड्राइविंग कमजोर है और वह कार से अपने घर की क्यारी में लगे फूल कुचल देती है, लेकिन फिल्म के अंत में वह पुलिस को की ड्राइविंग स्किल से जिस तरह छकाती है वो आश्चर्यजनक है। फिल्म के कुछ वन लाइनर बेहतरीन हैं।

कंगना रनौट हर फ्रेम में नजर आई हैं और निर्देशक ने उन्हें खुला मैदान दिया है। 'एडिशनल स्टोरी और डायलॉग्स' भी उन्होंने लिखे हैं और जिस तरह से उन्होंने अभिनय किया है ऐसा लगता है मानो सिमरन के किरदार की कल्पना उन्होंने ही की हो। वे इतनी जल्दी अपने चेहरे के भाव बदल लेती हैं कि हैरत होती है। बीमार बनने का नाटक करने वाला सीन, पेट्रोल पंप पर पैसे खत्म होने पर ड्रामा करने वाला सीन जैसे कई दृश्यों में उनका अभिनय देखने लायक है। एक बार फिर उन्होंने दर्शाया है कि वे बेहद उम्दा एक्ट्रेस हैं। अन्य कलाकारों में सिर्फ सोहम शाह ही ठीक-ठाक रहे हैं, अन्य कलाकारों का अभिनय औसत से भी कम है।

कुल मिलाकर सिमरन
में सिर्फ कंगना का ही कमाल है।

निर्माता : भूषण कुमार, शैलेष आर. सिंह, कृष्ण कुमार, अमित अग्रवाल
निर्देशक : हंसल मेहता
संगीत : सचिन-जिगर
कलाकार : कंगना रनौट, सोहम शाह
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 5 मिनट
रेटिंग : 2.5/5

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