अनस्पर्शित सुकोमल फूल जैसी मधुबाला

क्या अब भी यह प्रश्न शेष है कि सबसे सुंदर कौन?

स्मृति आदित्य|
मधुबाला! भारतीय रजतपट की वीनस! वीनस यानी शुक्र। आकाश का सबसे अद्वितीय सितारा। ज्योतिष शास्त्र कहता है कि शुक्र कलात्मक गतिविधियों, सौंदर्य और भौतिक सुख-समृद्धि का प्रतीक है। रूप की यह अनुपम रोशनी इतनी प्रखर और पवित्र बनकर चमकी कि उसे भारतीय सिनेमा का शुक्र-तारा कहा गया। मधुबाला की शहदीया सौंदर्य, कच्चे दूध जैसी शुभ्र धवल मुस्कान, बिना काजल की कोरी आँखें और नर्म मधुर चेहरे ने सुंदरता का अपूर्व प्रतिमान गढ़ा है। एक ऐसा परिपूर्ण सौंदर्य, जो परिभाषाओं से परे हैं, मिसालों से जुदा। आज वह नहीं है। कहीं नहीं है, किंतु फिर भी है, असंख्‍य धड़कनों में से एक मीठा अहसास और कई जोड़ी आँखों का सबसे प्रिय सपना। सौंदर्य के समस्त मानदंड जिसकी सुंदरता और सादगी से ही आरंभ होते हैं, उस अभिराम अप्रतिम अमर तारिका को समर्पित।
रुपहले परदे पर रूपवती अभिनेत्रियों की कमी कभी नहीं रही‍ किंतु संगमरमर पर तराशे शफ्फाफ ताजमहल सी मधुबाला की बराबरी कोई नहीं कर सकी।

संगमरमर का तराशा शफ्फा़फ बदन
देखने वाले तुझे ताजमहल कहते हैं।

मधुबाला के गुजरने के सालों बाद भी उनका सौंदर्य निर्विवाद रूप से अतुलनीय माना गया है। बीच के वर्षों में जब कोई भी अभिनेत्री अपने रंग-रूप से दर्शकों पर छाई तब उसकी तुलना मधुबाला के सौंदर्य को मानकर रखकर की गई।
संपूर्णता में इस देश के सिनेमा को दूसरी मधुबाला कभी नहीं मिल सकती इसलिए कभी किसी अभिनेत्री का रंग-रूप उससे मिलाया गया, कभी आँखें, कभी मुस्कान और कभी सुघड़ नाक। मधुबाला के समकालीन कलाकारों, निर्देशकों ने हमेशा कहा है कि वास्तव में जितनी थीं, कैमरा उसका दो प्रतिशत ही पकड़ सका है। एक अनस्पर्शित सुकोमल फूल जैसी मधुबाला के चाहने वालों में निरंतर वृद्धि हुई है, जबकि समय बीतने के साथ फिल्म कलाकारों के प्रति क्रेज घटता है। मधुबाला इस संबंध में अपवाद कही जा सकती हैं।

मधुबाला से पूर्व भी कई रूपसियाँ आईं और उसके बाद भी, लेकिन अनिंद्य सुंदरी मधुबाला की खिली ताजगी, चपल थरथराते नेत्र, सुगठित रेशमी स्निग्ध देह और कोमल पाँखुरी से लरजते होंठ की स्मृति मात्र से दर्शक आज भी सुगंध से भर उठते हैं।

संदल से महकती हुई पुरकैफ हवा का/झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो। नरगिस, सुरैया, नूरजहाँ से लेकर हेमा, रेखा, श्रीदेवी, माधुरी और ऐश्वर्या तक सबकी तुलना मधुबाला से की गई, लेकिन संपूर्ण सौंदर्य और कुशल अभिनय के संयोजन के साथ एक बेहद पवित्र सादगी का जो मिश्रण मधुबाला में था, वह इनमें कहीं दिखाई नहीं दिया।
दरअसल, संपूर्ण सौंदर्य जन्म नहीं लेता, अवतरित होता है, घटित होता है। मधुबाला एक महकती अव्यक्त कविता है जिसके विषय में लिखना हो, तो खुद एक कविता बनना पड़ता है। मधुबाला भारतीय मानस के अत्यंत निकट आई लेकिन हम उनके कितने निकट जा सके यह प्रश्न जटिल है। अलौकिक सौंदर्या ने जिन त्रासदियों को झेलकर स्वार्थी दुनिया को विदा कहा, उससे जाहिर है कि रिमझिम फुहारों जैसी तिर्यक मुस्कान वाली मधुबाला को कोई नहीं समझ सका।
जब शाख कोई हाथ लगाते ही चमन में
शर्माए, लचक जाए, तो लगता है कि तुम हो
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदी कोई बल खाए, तो लगता है कि तुम हो।

किसी शोख श्वेत वनहंसिनी-सी मधुबाला के दैदीप्य व्यक्तित्व का ही जादू था कि पर्दे पर उनकी पहली झलक के साथ थियेटर केसर की महक से सराबोर हो जाता था। मधुबाला का मुस्कुराना गुलाल होता था और शर्माना गुलाब।

अभिनेत्रियों के सुकुमार पुष्पों में चंपा, केतकी, कचनार, पलाश और चमेली तो आसानी से मिल जाए,गे लेकिन नहीं मिलेगा वह फूल जो अलभ्य है, दुर्लभ है। वह ब्रह्मकमल है। उसकी स्मृति मात्र मानस में सैकड़ों मयूरपंख लहलहा उठे, वह मधुबाला ही ब्रह्मकमल है। क्या अब भी यह प्रश्न शेष है कि कौन?

गोरी इस संसार में मुझको
ऐसा तेरा रूप लगे,
जैसे कोई दीप जला हो,
घोर अँधेरे जंगल में।


और भी पढ़ें :