उर्दू शायरी के बाबा आदमः वली दकनी

आदिल कुरैशी

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वली इस उपमहाद्वीप के शुरुआती क्लासिकल थे। वली को उर्दू शायरी के जन्मदाता के तौर पर भी जाना जाता है। उनकी पैदाइश 1667 में मौजूदा महाराष्ट्र सूबे के औरंगाबाद शहर में हुई। यही कारण है कि उन्हें वली दकनी (दक्षिणी) और वली औरंगाबादी भी कहा जाता है। हालाँकि वो अहमदाबाद में भी रहे और वहीं उनका इंतक़ाल भी हुआ। इस वजह से उन्हें वली गुजराती के नाम से भी पहचाना जाता है।


कहा जाता है कि वली दकनी से पहले हिंदुस्तानी शायरी फ़ारसी में हुआ करती थी। उनकी शायरी के ख़याल और अंदाज़ पर सादी, जमी और ख़ाक़ानी जैसे फारसी के उस्तादों की छाप नज़र आती थी। वली ने ही पहली बार शायरी के लिए ख़ालिस हिंदुस्तानी ज़बान उर्दू की बेशुमार गुंजाइशों और दिलकश ख़ूबसूरती का पता दिया। वली ही थे, जिन्होंने न सिर्फ़ उर्दू में ग़ज़लें लिखने की शुरुआत की बल्कि इसी शीरीं ज़बान में अपना दीवान भी रचा। वली ने न सिर्फ़ शायरी के लिए भारतीय ज़बान और रस्मुल ख़त (लिपि) "रेख़्ता" (उर्दू का पुराना नाम) को चुना, बल्कि उन्होंने भारतीय मुहावरे, भारतीय ख़याल (कल्पना) और इसी मुल्क की थीम को भी अपने कलाम की बुनियाद बनाया। इस तरह मुक़ामी अवाम उर्दू शायरी से जुड़ गई।वली को सफ़र करना बेहद पसंद था और वो इसे सीखने का एक ज़रिया मानते थे। 1700 में अपनी ग़ज़लों के दीवान के साथ जब वो दिल्ली पहुंचे, तो शुमाली (उत्तरी) भारत के अदबी हल्क़ों में एक हलचल पैदा हो गई। ज़ौक, सौदा और मीर तक़ी मीर जैसे महान उर्दू शायर वली की रवायत की ही देन हैं। उस दौर में सबको समझ आने वाली उर्दू ज़बान में उनकी आसान और बामानी शायरी ने सबका दिल जीत लिया। दरअसल, वली का दिल्ली पहुंचना उर्दू ग़ज़ल की पहचान, तरक्की और फैलाव की शुरुआत थी।एक ओर वली ने जहां शायराना इज़हार के ज़रिए भारतीय ज़बान की मिठास और मालदारी से वाक़िफ़ कराया, वहीं फ़ारसी के जोश और मज़बूती को भी कायम रखा, जिसका उन्होंने अपनी नज़्मों में बख़ूबी इस्तेमाल भी किया। वली को शायरी की उस जदीद (आधुनिक) ज़बान का मेमार (शिल्पी) कहा जाना कोई बड़बोलापन नहीं होगा, जो हिंदी और फ़ारसी अल्फ़ाज़ों का बेहतरीन मिश्रण है।
1707 में वली मोहम्मद वली का अहमदाबाद में इंतकाल हुआ और वहीं उन्हें दफ़्ना दिया गया। 2002 के मनहूस क़ौमी दंगों के दौरान दंगाइयों ने वली दकनी के मज़ार को तहस-नहस कर दिया, जो शहर के पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के बाहर मौजूद थी। मगर अब वहां वली दकनी की मज़ार का कोई नामोनिशान नहीं है।इस मामले में भी पहलेवली दकनी उर्दू के पहले शायर तो थे ही, जिन्होंने शायरी के हर रूप में अपने कमाल का मुज़ाहिरा किया। इसके अलावा मसनवी, क़सीदा, मुख़म्मा और रुबाई में भी उन्होंने हाथ आज़माया, मगर ग़ज़ल उनकी ख़ासियत थी। वली की पसंदीदा थीम इश्क़ और मोहब्बत थी। इसमें सूफ़ियाना और दुनियावी, दोनों ही तरह का इश्क़ शुमार था। मगर उनकी शायरी में हमें ज़्यादानज़र ख़ुशनुमा इक़रार और मंज़ूरी आती है। इसके बरअक्स उदासी, मायूसी और शिकायत कुछ कम ही महसूस होती है। वली इस मामले में भी पहले उर्दू शायर थे, जिसने उस दौर के चलन के ख़िलाफ़ जाकर आदमी के नज़रिए से प्यार का इज़हार करने की शुरुआत की।वली दकनी की एक ग़ज़ल
किया मुझ इश्क ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता-आहिस्ता,
कि आतिश गुल कूँ करती है गुलाआहिस्ता-आहिस्ता

वफ़ादारी ने दिलबर की बुझाया आतिश-ए-ग़म कूँ,
कि गर्मी दफ़्अ करता है, गुलाआहिस्ता-आहिस्ता
अजब कुछ लुत्फ़ रखता है शब-ए-ख़िल्वत में गुलरू सूँ,
खिताआहिस्ता-आहिस्ता, जवाआहिस्ता-आहिस्ता

मेरे दिल कूँ किया बेख़ुद तेरी अंखियों ने आख़िर कूँ,
कि ज्यूँ बेहोश करती है शराआहिस्ता-आहिस्ता
हुआ तुझ इश्क़ सूँ ऐ आतिशीं रू दिल मिरा पानी,
कि ज्यूँ गलता हआतिश सूगुलाआहिस्ता-आहिस्ता

अदा-ओ-नाज़ सूँ आता है वो रौशन जबीं घर सूँ,
कि ज्यूँ मश्रिक़ सूँ निकले आफ़ताआहिस्ता-आहिस्ता
‘वली’ मुझ दिल में आता है ख़याल-ए-यार-ए- बेपरवाह,
कि ज्यूँ अंखियां में आता है ख्व़ाआहिस्ता-आहिस्ता

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