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ग़ालिब की ग़ज़ल : ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक

शनिवार,दिसंबर 27, 2014
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नई दिल्ली। उर्दू शायरी को दो संस्कृतियों के मिलने का ज़रिया मानने की हामी रही कामना प्रसाद ने अब इस दिशा में एक और क़दम ...
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वली मोहम्मद वली इस उपमहाद्वीप के शुरुआती क्लासिकल उर्दू शायर थे। वली को उर्दू शायरी के जन्मदाता के तौर पर भी जाना जाता ...
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उर्दू शायरी भी होली के रंगों से बच नहीं पाई है। अठारहवीं सदी से आज तक के शायरों ने अपने कलामों में होली का जो रंग ...
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एक अदीब या साहित्‍यकार का अनजाने में ही न जाने किस-किस से रिश्‍ता होता है। कभी किसी की आँख में आँसू देख ले तो उसके ग़म ...
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देख बहारें होली की

शुक्रवार,मार्च 22, 2013
जब फागुन के रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की। और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों ...
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मैं ज़िंदगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत, जो हो सके तो दुआओं को बेअसर कर दे।।
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डूबने वाला था, और साहिल पे चेहरों का हुजूम, पल की मौहलत थी, मैं किसको आँख भरकर देखता।।
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हिज्र की सब का सहारा भी नहीं अब फलक पर कोई तारा भी नहीं। बस तेरी याद ही काफी है मुझे, और कुछ दिल को गवारा भी नहीं ...
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अज़ीज़ अंसारी की ग़ज़ल

शुक्रवार,मई 28, 2010
झूठ का लेकर सहारा जो उबर जाऊँगा, मौत आने से नहीं शर्म से मर जाऊँगा
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बहुत अहम है मेरा काम नामाबर1 कर दे मैं आज देर से घर जाऊँगा ख़बर कर दे
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रहिये अब ऐसी जगह चलकर

सोमवार,अप्रैल 26, 2010
रहिये अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो, हम सुख़न कोई न हो और हम ज़ुबाँ कोई न हो ...
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अपनी गली में, मुझको न कर दफ़्न, बाद-ए-कत्ल , मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यों तेरा घर मिले ...
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इश़्क पे ज़ोर नहीं

मंगलवार,अप्रैल 21, 2009
नुक्ताचीं हैं ग़मे-दिल उसको सुनाये न बने , क्या बने बात, जहाँ बात बनाये न बने
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इश्क़ मुझको नहीं

बुधवार,अप्रैल 1, 2009
इश्क़ मुझको नहीं, वहशत ही सही मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही
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हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी....

सोमवार,मार्च 16, 2009
कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहाँ वाइज़, पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले
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कुछ पता तो चले

सोमवार,मार्च 9, 2009
बेलचे लाओ, खोलो ज़मीं की तहें मैं कहाँ दफ़्न हूँ, कुछ पता तो चले।
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लगता नहीं है जी मेरा

शनिवार,मार्च 7, 2009
उम्रे-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
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हर एक बात पे कहते

शुक्रवार,फ़रवरी 27, 2009
रगों में दौड़ने-फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आंख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है
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ग़ज़ल : मीर तक़ी मीर

बुधवार,दिसंबर 24, 2008
उलटी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारि-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
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