शायद इसीलिए आज तक सफ़ेद रंग ओढ़े हैं गुलज़ार

बात उन दिनों से क़रीब 11 बरस पहले की है, जब हिंदुस्तान को चीरकर दो हिस्सों में तक़्सीम नहीं किया गया था। तब चिनाब, झेलम, सिंधु और रावी का पानी बिना किसी बँटवारे के गुनगुनाता आज़ाद बहता था। तब न कोई हिन्दू था, न कोई मुसलमान। तब लोग सिर्फ़ हिंदुस्तानी हुआ करते थे। तब 'माचिस' की तीलियाँ या तो चराग़ जलाने के लिए सुलगती थीं, या फिर चूल्हे। पहाड़ों और आसमान पर भी तब दूरबीनों के पहरे नहीं थे। बर्फीले पहाड़ों से उतरती बर्फ़ में भी, तब रिश्ते आज की तरह ठंडे नहीं पड़े थे। तेज़ 'आँधियों' के ज़ोर के बावजूद रिश्तों में हरारत रहती थी। तब अज़ान और आरतियों की आवाज़ें भी हर किसी के दिलोदिमाग़ को सुकून की 'ख़ुश्बू' से मुअत्तर कर देती थीं। लोग चाहे किसी भी मज़हब के हों, कानों में आवाज़ पड़ते ही उनके सिर अदब से ख़ुद-ब-ख़ुद झुक जाते थे। उस वक़्त हर 'मौसम' की 'किताब' सिर्फ़ एक ही रिश्ते का 'परिचय' देती थी, जिसके तहत हर किसी को, हर कोई अपना-सा लगता था। यही आबोहवा थी, जब संपूरण सिंह कालरा यानी गुलज़ार का जन्म हुआ। जगह थी हिंदुस्तान का पंजाब सूबा और इस सूबे के झेलम ज़िले के छोटे-से क़स्बे दीना से 3 किमी के फ़ासले पर मौजूद गाँव, कुर्ला। 
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दीना की गलियों में गुज़रा बचपन : संपूरण सिंह कालरा को हालांकि गुलज़ार होने में उम्र के कई बरस सर्फ़ हुए। पिता माखनसिंह ने क़रीब ही दीना के ख़ास बाज़ार में मकान ख़रीद लिया। वहीं कपड़े की दुकान भी खोली और परिवार के साथ यहीं रहने लगे। गुलज़ार का अब तक का बेशतर वक़्त दीना के इसी घर में गुज़रा। हालांकि बाद में गुलज़ार का घर पुराना डाकखाना चौक हुआ और फिर बाद में यहाँ पाकिस्तानी चौक की तख़्ती टांग दी गई। गुलज़ार की शुरुआती तालीम मियाँ मुहल्ले में मौजूद गवर्नमेंट मिडिल स्कूल में हुई। मगर अब मुड़कर देखें, तो जहाँ गुलज़ार की क्लास लगती थी, वो हिस्सा तो नदारद है, लेकिन गुलज़ार को एहतिराम देने की ग़रज़ से वहाँ बने एक नए ब्लॉक का नाम ज़रूर 'गुलज़ार कालरा ब्लॉक' कर दिया गया है। > ज़रा-सी उम्र में मिला हिज्रत का दर्द : बहरहाल, 11 बरस की उम्र पाते-पाते मुल्क के हालात बिगड़े और फिर एक दर्दनाक वाक़िआ पेश आया। हुआ ये कि मुल्क के सीने पर लहू से सरहद खींच दी गई। और इसके साथ ही मुल्क दो हिस्सों में तक़्सीम हो गया। एक हिस्सा हिंदुस्तान और दूसरा पाकिस्तान बना दिया गया। इस हादिसे में गुलज़ार का बचपन पाकिस्तान में ही छूट गया। लेकिन बचपन तबीयत से ही ज़िद्दी होता है, इतनी आसानी से अपनी चीज़ें कहाँ छोड़ता है। लिहाज़ा, ज़रा-सी उम्र में मिला हिज्रत का ये दर्द, किसी जायदाद की तरह अब भी उनके साथ है। एक बार कहीं उन्होंने कहा भी था कि 'विभाजन मेरी लेखनी का बहुत अहम हिस्सा है, क्योंकि बहुत शुरुआती ज़िंदगी में वो दौर देखा और उसका असर आज तक है। आज भी कहीं सांप्रदायिक दंगे देखता हूँ, तो मुझे विभाजन की ही याद आती है और उससे तकलीफ़ होती है।'

कितनी रात अँधेरा खाया होगा, उम्मीदें पी होंगी : विभाजन के बाद गुलज़ार के परिवार ने अमृतसर में पनाह ली। मगर गुलज़ार का ज़ियादातर बचपन दिल्ली में ही गुज़रा। विभाजन से पीड़ित परिवार के पास उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे इसलिए उन्हें पेट्रोल पंप पर नौकरी करना पड़ी। इसी दौरान उनका हाथ, उनके दिलो दिमाग़ के इशारे से काग़ज़ पर शायरी/कविताएं उतारने लगा। और फिर अपना मुस्तक़्बिल शायरी में तलाशने वाले गुलज़ार ने मुंबई का रुख़ किया। इस मायावी शहर ने भी तबीयत से गुलज़ार के इम्तिहान लिए। न जाने कितनी रातें अंधेरा खाकर और उम्मीदें पीकर गुज़ारी होंगी उन्होंने। फिर वर्ली के एक गैराज पर बतौर मैकेनिक काम मिला। इसी वक़्त गुलज़ार 'प्रोग्रेसिव राइटर एसोसिएशन' से भी जुड़ गए थे। यहीं काम करते हुए उनकी मुलाक़ात कई शायरों, नाटककारों और साहित्यकारों से हुई। इनमें से ही किसी ने गुलज़ार के पसंदीदा गीतकार शैलेन्द्र तक उन्हें पहुँचा दिया। इसी तरह उनकी मुलाक़ात संगीतकार एसडी बर्मन से भी हुई।

पहला ही गीत लताजी ने गाया : शैलेन्द्र ने शायद गुलज़ार में छुपे एक प्रतिभाशाली गीतकार, शायर और कवि को देख लिया था। संभवतः इसी हुनर से मुतअस्सिर होकर उन्होंने एसडी बर्मन से गुलज़ार की सिफ़ारिश की होगी। लिहाज़ा गुलज़ार, बर्मन दा की चौखट पर पहुँचे। इस वक़्त बर्मन दा 'बंदिनी' के गीतों को लेकर मस्रूफ़ थे। फिर भी गीतकार शैलेन्द्र की सिफ़ारिश थी, इसलिए उन्होंने गुलज़ार को एक गीत लिखने का मौका दिया। 5 दिन बाद गुलज़ार गीत लेकर बर्मन दा के पास पहुँचे। बर्मन दा को गीत भा गया। फिर यही गीत उन्होंने 'बंदिनी' के निर्देशक बिमल रॉय को गाकर सुनाया। बिमल दा की रज़ामंदी से भरी मुस्कान ने इस गीत को 'बंदिनी' के दीगर गीतों की फ़ेहरिस्त में जोड़ दिया। गीत के बोल थे- 'मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे/ छुप जाऊंगी रात ही में, मोहे पी का संग दई दे'। साल था 1963 का। ख़ास बात यह थी कि गुलज़ार के सबसे पहले गीत को ही स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ मिली।

ऋषिकेश और असित के लिए लिखी फ़िल्में : इससे पहले 1961 में बिमल रॉय के सहायक के रूप में अपने हुनर को धार लगाई। फिर ऋषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार का सान्निध्य भी पाया था। ख़ैर, 'बंदिनी' से मिली कामयाबी के बाद उनकी लेखनी ने रफ़्तार पकड़ ली। उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी के लिए 'आनंद' (1970), 'गुड्डी' (1971), 'बावर्ची' (1972) और 'नमक हराम' (1973) के साथ-साथ असित सेन के लिए 'दो दूनी चार' (1968), 'ख़ामोशी' (1969) और 'सफ़र' (1970) फ़िल्में लिखीं।

संजीव कुमार और पंचम थे दोस्त : फ़िल्म, 'मेरे अपने' (1971) से उन्होंने बतौर फ़िल्म निर्माता भी अपने दिल की बातें पर्दे पर उतारीं। 1972 में उन्होंने एक और भावपूर्ण फ़िल्म बनाई, 'कोशिश'। इस फ़िल्म में संजीव कुमार और जया भादुड़ी ने गूंगे-बहरे (मूक-बधिर) का अभिनय कर दर्शकों की आँखें नम कर दी थीं। गुलज़ार की कलम सीधे दिल पर दस्तख़त करती है। उस पर संजीव कुमार से मिलकर, जैसे गुलज़ार की लेखनी को और सिफ़त हासिल हो गई। फिर दोनों लेखक और अदाकार से दोस्त हो गए। इस जोड़ी ने 1975 में 'आंधी' और 'मौसम' के अलावा 1981 और 1982 में क्रमशः 'अंगूर' और 'नमकीन' बनाई। 1987 में आई 'इजाज़त' भी उनके निर्देशन में बनी दिल छू लेने वाली फ़िल्म थी। उनकी बनाई फिल्मों की फ़ेहरिस्त लम्बी है। आरडी बर्मन (पंचम) भी गुलज़ार के ख़ास दोस्तों में एक थे जिनके साथ उन्होंने क़रीब 21 फ़िल्में बनाईं। सलिल चौधरी और एआर रहमान के साथ भी उनका काम यादगार रहा है। इस वक़्त उनके लफ़्ज़ों को सुरों में ढालने की ज़िम्मेदारी संगीतकार विशाल भारद्वाज निभा रहे हैं।

अपनी शायरी वसीयत में दे गईं मीना कुमारी : 1988 में उन्होंने दूरदर्शन के लिए 'मिर्ज़ा ग़ालिब' धारावाहिक बनाया। गुलज़ार गाहे-ब-गाहे ये भी कहते रहे हैं कि वे मिर्ज़ा ग़ालिब की ही कमाई खा रहे हैं। ग़ालिब के बाद वे अहमद नदीम क़ासमी से मुतअस्सिर थे, 2012 में अपने पाकिस्तान सफ़र के दौरान, जिनकी क़ब्र पर वो फूल रखकर आए थे। बचपन में दीना की गलियां छोड़ आने के बाद ये उनका पहला पाकिस्तान दौरा था। 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के बाद उन्होंने 'तहरीर मुंशी प्रेमचंद की' धारावाहिक भी बनाया। उनकी ग़ज़लों के एल्बम भी ख़ूब सराहे गए। जाने से पहले ट्रेजेडी क्वीन मीना कुमारी वसीयत में अपनी सारी शायरी गुलज़ार के नाम कर गईं। गुलज़ार ने भी बाकायदा अपना फ़र्ज़ निभाते हुए उन्हें 'मीना कुमारी की शायरी' नाम से एक किताब की शक्ल दी। इस किताब का संपादन ख़ुद गुलज़ार ने ही किया है।

मीरा की रचनाओं-सी आती है ख़ुशबू : फ़िल्म/धारावाहिक की कहानी-गीत-संवाद सुनकर, सहज ही बताया जा सकता है कि इस लेखन में ज़रूर गुलज़ार की ही कलम का जादू है। उनके लिक्खे से 'मीरा' की भक्ति रचनाओं की तरह भीनी-भीनी-सी 'ख़ुशबू' आती है। जीवन नदिया का चाहे ये 'किनारा' हो या वो 'किनारा', दोनों की हदें टूट जाती हैं और जज़्बात का दरिया बे-सम्त बह निकलता है। ऐसा नहीं है कि मौसमों की तरह उनका एक दौर आया और गुज़र गया। उन्होंने हर दौर में अपनी कलम का लोहा मनवाया। आज भी उनकी कलम हमअस्र है।

बेहिसाब सम्मानों से नवाज़े गए : गुलज़ार ने 'चौरस रात' (लघु कथाएँ, 1962), 'जानम' (कविता संग्रह, 1963), 'एक बूँद चाँद' (कविताएँ, 1972), 'रावी पार' (कथा संग्रह, 1997), 'रात, चाँद और मैं' (2002), 'रात पश्मीने की' और 'खराशें' (2003) नाम से किताबें भी लिक्खी हैं। 2002 में उर्दू भाषा में लघु कहानी संग्रह 'धुआँ' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्मभूषण, 2009 में 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के गीत 'जय हो' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीत की श्रेणी में 'ऑस्कर' और ग्रैमी सम्मान मिल चुके हैं। 2013 में उन्हें दादा साहेब फाल्के सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे 45वें व्यक्ति हैं। इसके अलावा उन्हें 1977, 1979, 1980, 1983, 1988, 1991,1998, 2002, 2005 आदि में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार भी मिल चुका है।


नहीं कर सके पिता के आख़िरी दर्शन :  अभी गुलज़ार उम्मीदों के शहर मुंबई में अपने क़दम जमाने की कोशिश ही कर रहे थे। हालाँकि, अच्छा यह था कि 1961 से बिमल रॉय के मार्गदर्शन में काम सीखने और करने का सौभाग्य मिल रहा था। इसी बीच एक दिन दिल्ली में उनके पिताजी माखन सिंह ने आँखें मूँद लीं। चूँकि गुलज़ार को अभी नया-नया काम मिला ही था, इसलिए उन्हें परेशान न करने की ग़रज़ से किसी ने उन्हें इस बात की ख़बर नहीं की। मुंबई में ही रह रहे बड़े भाई को ख़बर मिली, और वो उड़ कर दिल्ली पहुँच गए। पहुँच कर अंत्येष्टि क्रिया संबंधी दायित्व भी पूरे कर दिए। कुछ दिनों बाद दिल्ली में ही रहने वाले गुलज़ार के एक पड़ोसी से जब उन्हें यह ख़बर मिली, गुलज़ार फ्रंटियर मेल से अपने घर, दिल्ली के लिए रवाना हो गए। उन दिनों यही वो रेल थी, जो सबसे कम समय में मुंबई से दिल्ली पहुँचाती थी। लिहाज़ा, गुलज़ार 24 घंटे में घर पहुँचे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सारी रस्में निभाई जा चुकी थीं। गुलज़ार, बोझिल मन से मुंबई लौट आए।
 
5 साल बाद किया पिता का तर्पण :  अपने माज़ी का बोझ उनके लेखन में भी साफ़ नज़र आता था। ज़िंदगी सरकते-सरकते और 5 बरस आगे बढ़ चुकी थी, कि बिमल रॉय ने भी बिस्तर पकड़ लिया। पितृ तुल्य बिमल दा को रफ़्ता-रफ़्ता कैंसर के शिकंजे में कसते हुए देख रहे थे गुलज़ार। ये तड़प बर्दाश्त के बाहर थी। अपने पिता के अंतिम दर्शन न कर पाने वाले गुलज़ार ने बिमल दा के बीमार होने पर पूरी तरह से बेटे का फ़र्ज़ निभाया। रात-रात भर उनके पास बैठे बिमल दा की पसंदीदा किताब 'अमृत कुंभ' पढ़ कर उन्हें सुनाते। आख़िर एक रोज़ कैंसर ने बिमल दा के खोखले हो चुके शरीर पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया और साँसों की डोर काट दी। ये तारीख़ थी, 08 जनवरी 1966. इसी रोज़ एक तरफ़ गुलज़ार ने बिमल दा की अंत्येष्टि संबंधी क्रियाएं पूरी कीं, वहीं दूसरी तरफ़ अपने पिता का भी तर्पण कर कुछ हद तक दिल का बोझ हल्का किया।


ख़ामोशी को पहनाया लफ़्ज़ों का पैरहन : मई 15, 1973 को अभिनेत्री राखी-गुलज़ार ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, लेकिन 3 साल में ही कसमों की ये डोर टूट गई और दोनों अलग हो गए। इस बीच एक बेटी 'मेघना' उनकी ज़िन्दगी में आई। प्यार से गुलज़ार ने उसे 'बोस्की' नाम दिया। बरसों से अलग-अलग रह रहे पति-पत्नी, राखी-गुलज़ार के बीच फ़िलवक़्त बोस्की ही एक कड़ी है। गुलज़ार अपने एकाकीपन को 'ख़ामोशी' से जीने के साथ-साथ इस एहसास को लफ़्ज़ों का पैरहन ओढ़ाकर नए-नए शाहकार रच रहे हैं।

मातम का सफ़ेद रंग ओढ़े हैं आज तक : उन्हें बोलते हुए सुनना कभी न भूल पाने वाला एहसास है। यूँ लगता है, जैसे वो हाथों के इशारे से अपने चारों तरफ़ हवा के कैनवास पर कोई चित्र बना रहे हैं। और यही चित्र लफ़्ज़ शायरी, नज़्म या नग़मे की शक़्ल में हमारे दिलों पर उभर जाते हैं।

बरसों से सफ़ेद कुर्ते-पायजामे को अपना लिबास किए हुए, लगता है गुलज़ार कभी अपने माज़ी के गाँव दीना की गलियों से बाहर आए ही नहीं। या फिर लगता है, उनके बचपन पर लगे हिज्रत के घावों ने उनके दिल में हर रंग के लिए नफ़रत भर दी हो, शायद आज तक गुलज़ार उसी के मातम में सफ़ेद रंग ओढ़े हुए हैं। 

 

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