ऑल इंडिया मुशायरा-2013 : कुछ नम भी रही अदब की कामयाब महफ़िल

दिनेश 'दर्द'

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उज्जैन। हर बरस की तरह इस दफ़ा भी सहने-ने अपनी गोद में अदब की महफ़िल आरास्ता करने की पूरी तैयारी कर ली थी। मुक़द्दस क्षिप्रा की मौजों ने भी तरन्नुम में पिरोए नग़मों और ग़ज़लों के नशेबो-फ़राज़ पर बेतहाशा झूमने के लिए अपने कनारों से इजाज़त ले ली थी। मौसम भी कई रोज़ पहले से ख़ुशगवार रहने का अहद कर चुका था। लिहाज़ा, चांद की सरपरस्ती में सितारे भी लुत्फ़ अंदोज़ होने को बेक़रार थे।
सर्द रात की नमी से नम मिट्टी भी अपनी तहों में दिलकश ख़ुशबू का समंदर दबाए बैठी थी। मगर...मगर सारी तैयारियों को जैसे ऐन रोज़ गहन लग गया। इसी रोज़ अदब की इमारत का एक मज़बूत सुतून मेराज फैज़ाबादी की शक्ल में मुनहदिम हो गया था। अपने कुनबे के इस मुहतरम और मुश्तहर साथी के चले जाने से अदबी हल्क़ा ख़ासे सदमे में था।

हालांकि प्रोग्राम मुक़र्रर था, सो हुआ और हर तरह से कामयाब भी रहा। क्षिप्रा की मौजें झूमीं, मौसम साज़गार भी रहा। चांद-सितारों ने भी पलकें झपक-झपक कर मुशायरे का लुत्फ़ उठाया। पता नहीं इन्होंने शौअरा इकराम का भरम रक्खा या सचमुच प्रोग्राम की सताईश की लेकिन प्रोग्राम के इख्तिताम तक आते-आते शब से रहा न गया और वो अश्क बार हो गई। लोगों ने शायद अश्कों को ओस का क़तरा समझा हो, लेकिन शिकस्ता दिल ख़ूब समझता है फ़र्क़, ओस और अश्क में।
ये तमाम मंज़रकशी है उज्जैन के कार्तिक मेला मैदान में नगर निगम की जानिब से मुन्अक़िद ऑल इंडिया मुशायरे की। इंतिज़ामात का ज़िम्मा सम्हाल रहे शायर अहमद रईस निज़ामी की गुज़ारिश पर मक्बूल शायर डॉ. नवाज़ देवबंदी ने सदारत का सेहरा क़ुबूल किया। वहीं निज़ामत के फ़राइज़ की डोर कुंवर जावेद के हाथ दी गई। रस्मन आगाज़ नात शरीफ़ से हुआ, जिसे पढ़ने का शरफ़ डॉ. देवबंदी को हासिल हुआ। उन्होंने पढ़ा कि-
'अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम अस्सलाम शाहे ज़ीशान को, शाने कुरआन को, रूहे ईमान को, रब के मेहमान को अस्सलाम...'

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