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आपके मुंह से निकला वचन कितना प्रभावकारी होता है, जानिए...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
वेदों की वाणी का प्रभाव जिस पर रहता है वही आर्य अर्थात श्रेष्ठ कहलाता है। वेदों के ज्ञान को पढ़ने और समझने से व्यक्ति के मुख पर ब्रह्मतेज आने लगता है।
बोलने से ही सत्य और असत्य होता है। अच्छे बोलने से अच्छा और बुरे वचन बोलने से बुरा होता है। बोलने से ही हम जाने जाते हैं और बोलने से ही हम विख्यात या कुख्‍यात भी हो सकते हैं। उतना ही बोलना चाहिए जितने से जीवन चल सकता है। व्यर्थ बोलते रहने का कोई मतलब नहीं। या देने से श्रेष्ठ है कि हम बोधपूर्ण जीवन जीकर उचित कार्य करें।
 
मनुष्य को वाक क्षमता मिली है तो वह उसका दुरुपयोग भी करता है, जैसे कि कड़वे वचन कहना, श्राप देना, झूठ बोलना या ऐसी बातें कहना जिससे कि भ्रमपूर्ण स्थिति का निर्माण होकर देश, समाज, परिवार, संस्थान और धर्म की प्रतिष्ठा गिरती हो। आज के युग में संयमपूर्ण कहे गए वचनों का अभाव हो चला है।
 
हमारे मुंह से निकले वचन का हमारे जीवन, परिवार और समाज पर क्या प्रभाव पड़ना है यह जानने योग्य बाते हैं। हम आपको यहां सच और झूठ के बारे में नहीं बताने वाले हैं बल्कि बताएं कि आपके मुंह से निकला वचन कितना प्रभावकारी होता है। वैदिक युग के ऋषियों ने हमारे बोल वचन को (वाणी) को 4 भागों में बांटा है, जानिए अगले पन्ने पर.. 
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