हिन्दू धर्म की अन्य धर्मों से तुलना करना व्यर्थ

अनिरुद्ध जोशी|
दुनिया में दो तरह के धर्म हैं। एक कर्म प्रधान और दूसरा विश्वास प्रधान। एक स्वदेशी और दूसरा विदेशी। एक स्वदेशी संस्कृति और परंपरा में रचा-बसा और दूसरा विदेशी परंपरा से लदा हुआ। अब यह समझने या समझाने की बात नहीं कि मूलत: हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म तीनों का ही एक ही मूल से जन्म है। ये एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं, उसी तरह जिस तरह कि यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं।
एक ओर हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख हैं तो दूसरी ओर यहूदी, ईसाई और इस्लाम हैं। ये दोनों ही दो विपरीत छोर हैं। निश्चित ही सभी धर्मों में एक जैसी बातें होने के लिए इन दो तरह की धाराओं में आप ऐसे श्लोक, आयत या छंद निकाल सकते हैं, जो कि बिलकुल मिलते-जुलते हो। ऐसा आप इसलिए कर सकते हैं, क्योंकि आप धर्मों के बीच एकता चाहते हैं। पिछले 1,500 वर्षों से कई संतों और सूफियों ने यह समझाने का निरर्थक प्रयास किया कि सभी धर्म एक ही हैं, क्योंकि ईश्वर, गॉड या अल्लाह एक ही हैं। भाषाओं की विविधता के कारण नाम अलग-अलग हो गए। खैर...!

यहां यह कहना जरूरी है कि की विदेशी धर्मों से तुलना करना व्यर्थ है। उसमें समानता ढूंढना व्यर्थ है। दरअसल, हिन्दू धर्म का और सिद्धांत विदेशी धर्मों से बिलकुल भिन्न है। तुलना करने का अर्थ है कि आप विचारों में कहीं-न-कहीं समानता ढूंढकर समन्वय या एकता स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन बिलकुल समरूप अथवा बिलकुल विपरीत तत्वों की तुलना नहीं की जा सकती। हिन्दू धर्म के विपरीत जो धर्म हैं, वे भी उतने ही प्यारे और सम्मानीय हैं। दरअसल, ये दो तरह के मार्ग हैं। आप एक मार्ग की दूसरे मार्ग से तुलना नहीं कर सकते हैं। आइए जानें कि हिन्दू और विदेशी धर्म में बुनियादी अंतर क्या है?
1. अहिंसा परमो धर्म

मूलत: इसके सूत्र वेदों में मिलते हैं लेकिन इसको सबसे ज्यादा अंगीकार किया है जैन और बौद्ध धर्म ने। अहिंसा, दया और करुणा भाव हिन्दू धर्म का मूल है। कहते भी हैं कि 'दया ही धर्म है'। लेकिन हिन्दुओं के लिए दया ही दुख का कारण बन गई। जहां दया है वहां धर्म है।

हिन्दू ऐसे किसी धर्म की कल्पना नहीं कर सकता जिसमें हिंसा को धर्म का आधार बनाया गया हो। हिन्दू जीवमात्र के लिए दया और कल्याण की भावना रखता है। वेद और पुराण सह-अस्तित्व की भावना को बल देते हैं। इसका मतलब है कि आपको दूसरे को भी उसकी स्वतंत्रता के साथ जीने देना है तथा अपने विचार या अपना धर्म उस पर थोपना नहीं है। यही बात जैन धर्म में 'जियो और जीने दो' के रूप में विद्यमान है। यदि आपकी रुचि धर्मांतरण या दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म में करने की है तो निश्चित ही आप धर्म के मार्ग पर नहीं हो सकते। यदि आप यह समझते हैं कि आपके संदेशवाहक ही असल में सही हैं तो आप सांप्रदायिक हैं।
2. आत्मा की अमरता

हिन्दू धर्मानुसार आत्मा का शरीर बदलता रहता है लेकिन आत्मा अजर-अमर है। आत्मा मनुष्य की आकृति में भी है और पशु की आकृति में भी। प्रत्येक प्राणी में आत्मा है। आत्मा अर्थात वह स्वयं जिसने शरीर धारण कर रखा है। आत्मा का कोई आकार या प्रकार नहीं होता। सभी में एक जैसी ही आत्मा रहती है। इस तरह करोड़ों-अरबों आत्माएं सशरीर और अशरीर रहकर इस ब्रह्मांड में विचरण कर रही हैं।
आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म मिलता है। उसे कोई ईश्वर न तो पैदा करता है और न ही नष्ट करता है। ईश्वर उसे न तो उसके पाप का दंड देता है और न ही पुरस्कार जबकि दूसरे धर्मों में ऐसा नहीं है। वहां मरने के बाद पुनर्जन्म का सिद्धांत नहीं है। मरने के बाद सभी को उनके धर्मग्रंथों के अनुसार ईश्वर के समक्ष खड़े होना होगा जबकि हिन्दू धर्म में जन्म, जीवन और मृत्यु का चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक कि व्यक्ति मोक्ष प्राप्त न कर ले।
3. ईश्वर मात्र उपस्थिति

हिन्दुओं के अनुसार ईश्वर कर्ता-धर्ता नहीं है। उसके होने से ही सबकुछ है, जैसे सूर्य एक जगह ही उपस्थित है। ऐसा नहीं है कि वह पुण्यात्माओं को प्रकाश देता है और पापियों को नहीं। ऐसा भी नहीं है कि वह देवी या देवताओं के माध्यम से इस ब्रह्मांड को संचालित करता है। ईश्वर को किसी की भी आवश्यकता नहीं।

जैसे सूर्य के प्रकाश से यह जगत प्रकाशित और जीवित है उसी तरह संपूर्ण ब्रह्मांड उस विराट की उपस्थिति से जीवित और चलायमान है। जैसे संपूर्ण नदियां अंत में समुद्र में विलीन हो जाती हैं उसी तरह महाप्रलय काल में यह संपूर्ण ब्रह्मांड उसी में लीन होकर पुन: प्रकट होता है। जो लोग ईश्वर को मानते हैं वे उसी तरह हैं जिस तरह कि किसी पौधे को अज्ञात स्रोत से जल मिलने लगा हो या जिनके ऊपर से बादल हट गए हों और सूर्य के प्रकाश से वे प्रकाशित हो गए हों। जो लोग ईश्वर को नहीं मानते हैं, वे रेगिस्तान या किसी गुफा में उगे उस पौधों की तरह हैं जिसमें फूल या फल खिलने की संभावना कम ही होती है।
4. नियम तो हैं लेकिन प्रतिबंध नहीं

हिन्दू धर्म में जीवन की हर हरकत को नियम में बांधा गया है लेकिन उन नियमों को मानने की बाध्यता नहीं है। बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनकर मंदिर में जाने का नियम है लेकिन इसके लिए कोई बाध्यता नहीं। प्रत्येक व्यक्ति में भगवान होने (ईश्वर नहीं) की संभावना छुपी हुई है इसलिए उसे धर्म संबंधी अपने दर्शन को अभिव्यक्त करने की छूट है। इसीलिए हिन्दू धर्म में हजारों दार्शनिक हैं, उस धर्म से कई अन्य धर्मों की उत्पत्ति होती गई और हजारों संप्रदाय बनते गए। सभी वेद पर कायम हैं। जो वेदसम्मत नहीं हैं, वे हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं।
इसीलिए हिन्दू धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत मात्र न होकर अनेकानेक व्यक्तियों के दर्शन और अंतरज्ञान का सामुहिक प्रतिफल है, जो हजारों सालों में परिमार्जित हुआ है। वेद किसी एक ऋषि की देन नहीं है। लगभग 400 से अधिक ऋषियों का ज्ञान उसमें संग्रहीत है। निश्चित ही भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में उसका सार तत्व कह दिया है।

यदि आप गीता को पढ़ेंगे तो उसमें आपको किसी भी प्रकार का नियम, कानून या परंपरा के पालन करने को बाध्य नहीं किया जा रहा है। वहां तो विशुद्ध ज्ञान है, जो कि आपको सत्य से परिचित कराता है और आपको आपके जीवन का महत्व बताता है। धार्मिक किताबों में कानून नहीं, ड्रेस कोड नहीं है। हिन्दू धर्म के अनुसार व्यक्ति का आत्मिक विकास महत्वपूर्ण होता है इसीलिए व्यक्ति स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।
उन लोगों के लिए खानपान पर प्रतिबंध है, जो कि परिव्राजक, संन्यासी या मुमुक्षु हैं। सांसारिक लोग कैसे कपड़े पहनते हैं, कैसा भोजन करते हैं और पीते हैं या नहीं? इस पर कोई कड़े प्रतिबंध नहीं है। सिर्फ एक संदेश है कि क्या खाने या पीने से क्या नुकसान हो सकते हैं या कैसे कपड़े पहनना चाहिए जिससे कि अच्छे भावों का विकास हो सकता है। हिन्दू धर्म मूलत: आपके निजी जीवन में दखल नहीं देता।

4. सत्य निरपेक्ष है, सापेक्ष नहीं
हिन्दू धर्म में सत्य को निरपेक्ष माना गया है अर्थात सत्य इसलिए सत्य नहीं कि वह किसी आप्त पुरुष (संदेशवाहक) या ईश्वर द्वारा कथित है अपितु वह अपने आप में सत्य है इसलिए आप्त पुरुष ने सत्य को कथित किया है। यदि कोई आप्त पुरुष सत्य को असत्य करार दे दे तो भी सत्य, सत्य ही रहेगा न कि वह असत्य हो जाएगा। इसके विपरीत अन्य गैर हिन्दू धर्म में सत्य को सापेक्ष माना गया है। इन धर्मावलंबियों के अनुसार सत्य इसलिए सत्य है, क्योंकि उक्त कथन उनके संदेशवाहकों या उनके आप्त पुरुष द्वारा कथित है न कि सत्य अपने आप में सत्य है।
5. न्याय का साथ देना जरूरी

धर्म और अधर्म की लड़ाई में धर्म का साथ देना ही न्याय के साथ खड़े होना है। राजा युधिष्ठिर से पोरस तक, पोरस से पृथ्‍वीराज चौहान तक सभी ने न्याय के साथ ही लड़ाई लड़ी। हालांकि यह भी सही है कि उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। लेकिन हम यहां युद्ध में न्याय की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि राज्य में प्रत्येक व्यक्ति के साथ न्याय हो यह तय होना चाहिए। न्याय में देरी का मतलब अन्याय का साथ देना होता है।
हिन्दू धर्मानुसार हर हाल में न्याय कायम रहना चाहिए। न्याय की रक्षा के लिए ही कालांतर में महान आत्माओं का जन्म होता आया है। सभी को न्याय मिले, यह सुनिश्चत किया जाना जरूरी है। न्याय ही धर्म है। हिन्दू धर्मग्रंथों में यह अच्छे से समझाया गया है कि न्याय क्या है? राजा हरीशचन्द्र, भगवान राम, राजा विक्रमादित्य आदि सैकड़ों राजाओं ने न्याय का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है।

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