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देवशयनी एकादशी से चार महीनों के लिए शयन करेंगे श्रीहरि विष्णु


 


* देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का प्रारंभ, पढ़ें विशेष जानकारी 
 
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहते हैं। उस दिन से चातुर्मास के व्रत का प्रारंभ होता है और देवदिवाली या कार्तिक एकादशी को उसकी पूर्णाहुति होती है। इस दिन से चार महीनों के लिए प्रभु सो जाते हैं। 'यथा देहे तथा देवे' यह कथन भाववान भक्तों की भावना का प्रतीक है। 
 
'मुझे जो अच्छा लगता है वह मेरे प्रभु के लिए भी अच्छा है' इस भावना से ही भक्त प्रभु को फूल, इत्र, प्रसाद आदि अर्पण करता है। भक्त को स्नान अच्छा लगता है इसलिए वह प्रभु को भी स्नान कराता है। भक्त को अच्छे वस्त्र पहनना भाता है इसलिए वह प्रभु को भी सुंदर जरी के वस्त्र पहनाता है। काम करते-करते थक जाने पर वह आराम करता है और सो जाता है।
 
उसी तरह 'मेरे प्रभु को भी विश्व का व्यवहार चलाने में थकान लगी होगी इसलिए उन्हें भी आराम चाहिए, उन्हें भी चातुर्मास में सो जाना चाहिए' ऐसा भक्तिपूर्ण आग्रह भी भक्त ने रखा होगा। यह भक्तिशील हठ ही प्रभुशयन की इस कल्पना में सौंदर्य और माधुर्य लाता है।
 
मानव जैसे थककर सो जाता है वैसे कभी-कभी ऊबकर भी सो जाता है। जिद्दी लड़के से ऊबकर 'तेरे दिल में आए सो कर' ऐसा कहकर कई बार मां या बाप सो जाते हैं। ऐसा ही भगवान का भी मानव के बारे में तो न हुआ होगा? इस दृष्टि से विचार करने पर भगवान का सो जाना मानव के लिए आत्मनिरीक्षण का विषय बन जाता है।
 
वर्तमान विषय में रस न होने पर भी मनुष्य सो जाता है। गंभीर व्याख्यानों में या नीरस चलचित्रों में बहुत से श्रोता और प्रेक्षकों को हम सोते हुए देखते हैं। विषय में नवीनता या मौलिकता का अभाव भी कई बार नींद का कारण बनता है।
 
एक ही विषय या दृश्य की बार-बार पुनरावृत्ति उस विषय या दृश्य के लिए अरुचि निर्माण करती है। वर्षों तक किसी विशिष्ट कार्य का उसमें प्रबंध नहीं होता है। ऐसे यांत्रिक जीवन की नीरसता भगवान को सो जाने के लिए प्रेरित करती हो, यह बहुत ही स्वाभाविक है।
 
कई बार दूसरों की परेशानी से बचने के लिए भी मनुष्य सो जाता है। भिखारी या चंदा इकट्ठा करने वाले लोग आते हैं तब कई बार आदमी उनसे बचने के लिए जानबूझकर सो जाता है। शिव कैलास में और विष्णु क्षीरसागर में कदाचित्‌ ऐसे लोगों से बचने के लिए तो नहीं गए होंगे?
 
भवसागर के मंदिर में छोटे-बड़े लोगों की जो भीड़ होती है वह सभी मांगने वालों की भीड़ है। भगवान से मांगना गलत बात नहीं है, मांगने वालों को भगवान देते भी हैं, परंतु भगवान को आनंद तब होगा जब कोई निरपेक्ष होकर उन्हें मिलने आए अथवा अपने कर्म के फल भगवान के चरणों पर समर्पित करने आए।
 
इन सभी कल्पनाओं में श्रेष्ठ कल्पना यह है कि कर्मयोगी को मार्गदर्शन करने के लिए भगवान सो जाते हैं। प्रभु जो चार महीने सो जाते हैं उसे हमारे देश में वर्षा ऋतु कहते हैं। 
 
सामान्य अवस्था में भी यदि भगवान सो जाएं तो सृष्टि का व्यवहार नहीं चलेगा, तो वर्षाऋतु जैसे महत्वपूर्ण काल में जब समस्त सृष्टि की जल और अन्न की व्यवस्था करनी होती है तब भगवान सो जाएं तो कैसे काम बनेगा? इसलिए कई लोगों को भगवान के सो जाने की कल्पना पुराण की एक कपोलकल्पित कथा लगती है।
 
वर्षा ऋतु में सृष्टि का सौंदर्य पूर्ण रूप से निखर उठता है, मानव को नवजीवन मिलता है, किसान को भरपूर फसल मिलती है और सर्वत्र आनंद का वातावरण बना रहता है। भगवान की इस कृपा से सिंचित हुआ कृतज्ञ बुद्धि का मानव देवमंदिरों में जाकर प्रभु के गुणगान गाता है- 'मेरा वैभव तुम्हारी कृपा का फल है।' 
 
जब मानव प्रभु को ऐसा कहता है तब प्रभु उसे मानों समझाते हैं- 'मुझे मालूम नहीं है, मैं तो चार महीने सोया हुआ था। यह सारा वैभव और समृद्धि तेरे पसीने, परिश्रम और पुरुषार्थ का परिणाम है।'
 
काम करते समय सतत जागते रहना और फल आए तब अंजान होकर सो जाना इससे बढ़कर हृदय की विशालता और क्या हो सकती है? सच्चे कर्मयोगी को इससे श्रेष्ठ मार्गदर्शन कौन सा हो सकता है? जितनी भावना की दृष्टि से यह कल्पना भावपूर्ण है उतनी ही विचार की दृष्टि से यह माधुर्यपूर्ण लगती है।
 
इससे यह भी सीख मिलती है कि कर्म करो परंतु अभिमान न करो। कर्म करते समय 'मैं' की समाधि लगने दो, अहं को दबा दो, सुला दो, प्रभु सो गए यानी अहंकार रखे बिना वे कर्म तथा जगत व्यवहार करते रहे।
 
कर्ता जिसमें खो जाता है, लुप्त हो जाता है, समाधिस्थ हो जाता है, वही कृति श्रेष्ठ बनती है। सृष्टि सुंदर लगती है क्योंकि उसका सर्जक उसमें एकरूप हो गया है। आज हमें कीर्ति और स्तुति कितनी अच्छी लगती है! कोई स्तुति करे तब सो जाने की बात तो दूर रही किंतु यदि कोई सोया हुआ भी हो तो उसके पास जाकर उसे जगाकर हम स्वमुख से अपनी स्तुति करने लगते हैं।
 
हम ऐसा कौन सा विशिष्ट कर्म करते हैं जिससे हमें अहंकार हो? अहंकार से किया हुआ कर्म काल की गोद में लुप्त हो जाता है, 'कालः विपति तद् रसम्‌।'। काल उसका रस पी जाता है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने वेदों पर अपने नाम नहीं लिखे हैं क्योंकि उन्हें नाम की अभिलाषा या कीर्ति की कामना नहीं थी। 
 
हमारे शिल्पियों ने भी शिल्पकृतियों पर अपने नाम नहीं लिखे हैं। इसीलिए वेद अमर हैं और शिल्पकृतियां चिरंजीवी हैं। उन्होंने अहं की समाधि लगाकर कर्म किया था इसलिए आज भी वे मानव मात्र को मार्गदर्शन करने में समर्थ हैं।
 
जो स्वयं खो जाता है, वही कुछ प्राप्त करता है और जो कुछ प्राप्त करता है वही जगत को कुछ दे जाता है। कार्य की दृष्टि से देखने पर उसी कार्य को श्रेष्ठ गिना जाएगा जहां महान कार्य दिखाई देता हो, परंतु कार्यकर्ताओं को ढूंढना पड़े। कार्य किसने किया वह जानने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। सच्चे कार्यकर्ता चमकने के बजाय कार्य मंदिर की नींव में दब जाने में धन्यता का अनुभव करते हैं।
इस पर्व की ओर देखने की दूसरी भी एक दृष्टि हो सकती है और वह है विश्वास की। अविश्वास से भय होता है और भय से नींद भाग जाती है। विश्वास से शांति मिलती है और शांति में नींद आती है। सुयोग्य संतान के विश्वास पर पिता शांति से सो सकता है। उसी तरह मानव के विश्वास से निश्चिंत होकर भगवान यदि सोते होंगे तो यह मानव का परम सौभाग्य है।
 
संक्षेप में भगवान की नींद हमारे प्रति उनके विश्वास के कारण होगी तो वह अतिउत्तम बात है। हमें मार्गदर्शन करने के लिए भगवान सो गए होंगे तो उसमें भी सुगंध है। परंतु आज के दिन इतना दृढ़ संकल्प तो करना ही चाहिए कि भगवान की नींद थकान, परिश्रम, ऊब, त्रास, नीरसता या एकाकीपन के कारण नहीं है।
 
इसलिए मेरा जीवन व्रतनिष्ठ होना चाहिए। इसलिए कदाचित वर्षा ऋतु में सबसे ज्यादा व्रत आते हैं। व्रतनिष्ठ जीवन जीकर जीवन को सुंदर आकार देते-देते मैं सतत जागरूक रहूं और सृष्टि का सौंदर्य और सुगंध बढ़ाता रहूं तो भगवान मेरे भरोसे आराम से सो सकेंगे। भगवान की ऐसी स्वस्थ नींद के लिए उनको निश्चिंत बनाने की शक्ति और वृत्ति हमें प्राप्त हो ऐसी ही आज के दिन अभिलाषा रखेंगे तो वह सार्थक होगी।

-पूज्य पांडुरंग शास्त्री आठवले


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