सियाचिन पर खून जमा देने वाली ठंड से मिलेगी राहत, जवानों के लिए देश में ही बनेगी स्पेशल किट

नई दिल्ली| Last Updated: रविवार, 12 अगस्त 2018 (20:41 IST)
नई दिल्ली। सेना ने एक बड़ा कदम उठाते हुए और डोकलाम में तैनात जवानों के लिए देश में बनाए जाने की योजना को अंतिम रूप दे दिया है। यहां खून जमा देने वाली ठंड पड़ती है। पहले यह किट विदेश से मंगाई जाती थी और इस पर सेना को लगभग 800 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते थे।
एक आर्मी अफसर ने कहा कि दुनिया के सबसे मुश्किल युद्ध क्षेत्र में तैनात जवानों के कपड़े, सोने की किट और खास उपकरणों का उत्पादन देश में ही किया जाएगा।

मौजूदा समय में जवानों की एक्स्ट्रीम कोल्ड वेदर क्लोदिंग सिस्टम (ईसीडब्ल्यूसीएस) अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और स्विटजरलैंड से आयात किया जाता है। भारत सरकार को इस लगभग 300 करोड़ रुपए की बचत का अनुमान है।

दुनिया का सबसे खर्चीला युद्ध मैदान : तेरह अप्रैल यानी आज पूरे 34 साल हो गए दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन हिमखंड पर भारत व पाक को बेमायने जंग को लड़ते हुए। यह विश्व का सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित युद्धस्थल ही नहीं बल्कि सबसे खर्चीला युद्ध मैदान भी है, जहां होने वाली जंग बेमायने है क्योंकि लड़ने वाले दोनों पक्ष जानते हैं कि इस युद्ध का विजेता कोई नहीं हो सकता। इस बिना अर्थों की लड़ाई के लिए पाकिस्तान ही जिम्मेदार है जिसने अपने मानचित्रों में पाक अधिकृत कश्मीर की सीमा को एलओसी के अंतिम छोर एनजे-9842 से सीधी रेखा खींचकर कराकोरम दर्रे तक दिखाना आरंभ किया था।
सियाचिन पर पिछले 10 सालों में 163 जवानों की मौत : रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में बताया कि दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर में सेना पिछले दस साल में अपने 163 जवानों को खो चुकी है। करीब 20 हजार फुट ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर पर सुरक्षा की जिम्मेदारी अदा करते हुए जान गंवाने वालों में छह अधिकारी थे।

21 हजार फुट की ऊंचाई पर हुई है केवल एक लड़ाई : चिंतित भारत सरकार ने तब 13 अप्रैल 1984 को ऑपरेशन मेघदूत आरंभ कर उस पाक सेना को इस हिमखंड से पीछे धकेलने का अभियान आरंभ किया, जिसके इरादे इस हिमखंड पर कब्जा कर नुब्रा घाटी के साथ ही लद्दाख पर कब्जा करना था। जानकारी के लिए दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन हिमखंड पर 34 सालों के कब्जे के दौरान 21 हजार फुट की ऊंचाई पर आज तक सिर्फ एक ही लड़ाई हुई है। यह लड़ाई दुनिया की अभी तक की पहली और आखिरी लड़ाई थी जिसमें एक बंकर में बनी पोस्ट पर कब्जा जमाने के लिए जम्मू के हानरेरी कैप्टन बाना सिंह को परमवीर चक्र दिया गया था और उस पोस्ट का नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है।

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