आत्महत्या करने से पहले मेरे बच्चे एक बार सोचना...

एक मां का खत बच्चों के नाम

डॉ. गरिमा संजय दुबे


प्रिय.........

हां ........ तुम्हारा नाम भी लिख सकती थी , लेकिन फिर सोचा नाम लिख कर किसी एक से इसे क्यों जोडूं । माँ हूँ ना हर बच्चे में अपने बच्चे की शक्ल ही नज़र आती है। जब किसी बच्चे को जीवन की शरुआत के पहले ही जीवन हारते देखती हूँ तो काँप जाती हूँ। बस्ते के बोझ से दर्द से कसमसाते कंधे, नींद से बोझिल आँखे मुझे हर उस बच्चे की याद दिलाती है जो अपने कंधों पर बस्ते से भी हजार गुना भारी महत्वाकांक्षाओं का बोझ ढोते ढोते हार रही हैं । आँखों में सपने नहीं हैं तनाव है, चेहरे पर खिलखिलाहट नहीं फीकी हंसी है । और इसका कारण तुम नहीं हम है।

मै कहना चाहती हूँ तुमसे कि मै तुम्हे समय दूंगी सिर्फ सुविधाएँ नहीं, ताकि तुम सुविधा भोगी न बनो। हर चीज़ जब मांगोगे तो तुरंत लाकर नहीं दूंगी ताकि तुम इंतज़ार कर सको, धैर्य रख सको । शायद समझा सकूँ तुम्हे कि जीवन इंस्टेंट कॉफी नहीं है। तुम्हें मूल्य ,नीति और संस्कार सिखाने के पहले उन्हें अपने जीवन में उतारूंगी,सीख तो तुम अपने आप जाओगे। कोशिश करुँगी बताने की कि अमीर होना ही सफल होना नहीं है, बल्कि अपने मनचाहे काम को शिद्दत से करना और उसे जीना ही सफलता है। नहीं उलझने दूंगी तुम्हें बड़ी गाड़ी , ब्रांडेड कपड़े, फॉरेन ट्रिप की अंधी दौड़ में। कभी नहीं कहूँगी कि केवल विदेश में पढ़ना और वहाँ जॉब करना ही सफल होना है।
तुम्हारी छोटी गाड़ी पर भी मैं गर्व से भर जाऊंगी,इतराऊंगी क्योंकि तुम्हारा खुश चेहरा मेरे लिए सबसे बड़ा धन है। धन और सफलता की दौड़ में अपनी ख़ुशी,शान्ति और आनंद कहीं खो न जाए इसका ध्यान तुम रखना। दिखावे और स्टेटस की दौड़ में तुम कहीं हमारी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का साधन न बन जाओ इसका ध्यान हम रखेंगें।तुम कभी मत सोचना कि तुम्हारे कम नंबर मुझे निराश करेंगे।


नहीं तुम्हारी सीखने की ललक ही सबसे बड़े अंक है मेरे लिए। मैं कभी एक साथ तुम पर सचिन तेंदुलकर और सुन्दर पिचाई बनने का दबाव नहीं डालूंगी। माँ हूँ ,क्या तुम्हारी आँखों के सपने नहीं पढ़ सकती? उन सपनो को पूरा करने में मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। परिश्रम और पुरुषार्थ के पसीने की महक मैं तुम्हें बताऊँगी।
हां मै जानती हूँ तुम भी तो अपने माता पिता के लिए ही सपने देखते हो, उनको पूरा करने में जुटे हो, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।

बस एक बात याद रखना मेरे बच्चे, सचिन तेंदुलकर भी ज़ीरो पर आऊट होता है, सेटेलाइट पूरी तैयारी के बाद भी सफल नहीं हो पाते, तो क्या खिलाड़ी खेलना छोड़ देते हैं? क्या वैज्ञानिक प्रयास करना छोड़ देते है?नहीं ना, तो तुम कैसे मैदान छोड़ सकते हो। जब एक सफलता के बाद हम नहीं रुकते अगली सफलता की तैयारी करते हैं,तो फिर क्यों एक असफलता को आखिरी असफलता मान लेते हैं।

जीवन हर क्षण कल से आज को बेहतर करने नाम है। हाँ परिश्रम का कोई विकल्प नहीं, न ही एक दिन में कोई सफल हो सकता है। यह सतत प्रक्रिया है। सफल लोगों की चमक के पीछे के उनके संघर्ष, कड़ी मेहनत को देख प्रेरणा लो। अमिताभ बच्चन ,धीरूभाई अंबानी , सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी कोई भी बिना प्रयास के सफल नहीं हुए। उनके जीवन में असफलता नहीं आई ऐसा भी नहीं है, किंतु असफलता को भी सफलता की तरह जीवन का एक आवश्यक अंग मान उससे उबरने की भावना ने उन्हें सफल बनाया है। कुछ भी स्थाई नहीं होता तो असफलता स्थाई कैसे हो सकती है,अपनी मेहनत ,परिश्रम के बल पर हर असफलता को टक्कर दी जा सकती है।

बस परिश्रम को मजबूरी में अनमने ढंग से ढोने के स्थान पर उसका आनंद लेना सीख जाओ तो आसमान तुम्हारा है। और हाँ हर व्यक्ति की सफलता की परिभाषा अलग होती है। किसी के लिए महल भी खुशी नहीं देते, तो कोई अपने छोटे से घरौंदों में खुश है,तृप्त है ,इसलिए एक की सफलता दूसरे के लिए भी सफलता ही हो जरूरी नहीं। तुम अपनी सफलता की परिभाषा खुद तय करना,बिना किसी के कहे की परवाह किये, बिना तनाव लिए,इसमें हम तुम्हारी मदद करेंगे।
जीवन कई अवसर देता है लेकिन तुम अपने जीवन को अवसर देने में मत चूकना।सफलता ख़ुशी देती है लेकिन केवल सफलता से ही खुश रह सको इतने कमज़ोर कभी मत बनना।

तुम्हारे सर पर हाथ फेर, तुम्हारी पीठ सहला, तुम्हारा हाथ थाम मैं यह कहना चाहती हूँ कि तुम मेरे लिए किसी भी उपलब्धि से महत्वपूर्ण हो और तुम जानते हो ना कि मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूँ।


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