3. दुनिया जिसे कहते हैं फ़सूँ साज़ नहीं क्या करती है दग़ा मिल के दग़ाबाज़ नहीं क्या
साँसें उलझ रही हैं, रगें फूल रही हैं जीने में मेरे मरने का अन्दाज़ नहीं क्या
आवाज़ जो कानों में मेरे गूँज रही है बतलाइए वो आपकी आवाज़ नहीं क्या
मुमताज़ की अज़मत से हुई ताज की अज़मत तारीख में वो आज भी मुमताज़ नहीं क्या
माहिर मैं समझ कर ही तो पर तोल रहा हूँ अब इतना भी अन्दाज़ा ए परवाज़ नहीं क्या
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