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निदा फ़ाज़ली : एक मुलाक़ात
- अज़ीज़ अंसारी

Aziz AnsariWD
हर दौर में और हर ज़ुबान में कुछ मायानाज़ फ़नकार हुए हैं। लेकिन ऐसे फ़नकार बहुत कम हुए हैं जिनकी इज़्ज़त उनकी अपनी मादरी ज़ुबान के अलावा दीगर ज़ुबानों के अदब में भी वैसी ही हो जैसी उनकी अपनी ज़ुबान में। निदा फ़ाज़ली एक ऐसे ही उर्दू के फ़नकार हैं। वो उर्दू के ज़ुरूर हैं लेकिन अब वो हिन्दी, गुजराती और मराठी ज़ुबानों में भी अपना मक़ाम बना चुके हैं। मुल्क के कोने-कोने में उनके चाहने वाले मौजूद हैं। मुशायरे हों, कवि-सम्मेलन हों या कोई अदबी बहस ओ मुबाहेसा, हर तक़रीब में मदऊ किए जाते हैं और ख़ूब सराहे जाते हैं।

हाल ही में जब उनका आना इन्दौर हुआ तो हमें चन्द घंटे उनके साथ गुज़ारने का मौक़ा मिला। बातों-बातों में जब हमने उनकी पैदाइश और बचपन का ज़िक्र छेड़ा तो वो किसी सोच में डूब गए। कहने लगे अब ऐसा कोई नहीं है जिससे मैं पूछूँ कि मैं कब और कहाँ पैदा हुआ था। सुना है कि मेरी पैदाइश दिल्ली की है। बचपन ग्वालियर में भी गुज़रा है। मैंने किसी शहर को नहीं छोड़ा, शहर ने मुझे छोड़ दिया है। गुज़िशता तीस-पैंतीस साल से मुम्बई में हूँ, इसलिए मुम्बई ही अब मेरा शहर है।

जब मैंने स्कूल और कॉलेज की तालीम के बारे में पूछना चाहा तो कबीर का फ़लसफ़ा बयान करने लगे। उलटे मुझसे ही पूछ लिया, कबीर कौन से स्कूल और कॉलेज में पढ़ने गए थे। जहाँ कबीर ने तालीम पाई थी बस मैंने भी वहीं अपनी पढ़ाई की है। उनका मतलब था कि डिग्रियाँ कोई एहमियत नहीं रखतीं, इनसे सिर्फ़ नौकरी हासिल की जा सकती है। सच्ची पढ़ाई तो वहाँ होती है जहाँ लोगों का दु:ख-दर्द महसूस होता है। ऐसा स्कूल है, कबीर का स्कूल। जब मैंने ज़्यादा ज़ोर दिया तो कहने लगे मैं अपने वालदैन की तीसरी अनवानटेड औलाद हूँ। उनकी बातों से ज़ाहिर हुआ कि घर के हालात अच्छे नहीं थे। दो बच्चों की परवरिश में भी मुश्क़िलों का सामना करना पड़ रहा था।
  निदा फ़ाज़ली एक ऐसे ही उर्दू के फ़नकार हैं। वो उर्दू के ज़ुरूर हैं लेकिन अब वो हिन्दी, गुजराती और मराठी ज़ुबानों में भी अपना मक़ाम बना चुके हैं। मुल्क के कोने-कोने में उनके चाहने वाले मौजूद हैं।      


माँ चाहती थी कि मैं दुनिया में न आऊँ। उसने तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ खाईं ताकि मैं पैदा न हो सकूँ। लेकिन होता वही है जो ख़ु़दा को मंज़ूर होता है। उनकी बातों से ये ज़रूर ज़ाहिर हो गया कि उन्होंने क़ॉलेज में काफ़ी दिन गुज़ारे हैं। अपने कॉलेज का एक वाक़िआ सुनाते हुए कहने लगे, क्लास में एक लड़की मुझसे काफ़ी दूर बैठा करती थी। मेरी सीट से उसके बदन का सिर्फ़ वो हिस्सा दिखाई देता था जो ब्लाउज़ और साड़ी के बीच होता है। उन दिनों ब्लाउज़ इतने छोटे भी नहीं होते थे जितने आजकल हो गए हैं।

बस इसी हिस्से को मैं सबकी नज़रें बचाकर कभी-कभी देख लिया करता था। एक दिन मैंने उसे कॉलेज के बग़ीचे में टहलते हुए देख लिया। फिर मेरी नज़रें उसे वहाँ भी ढूँढने लगीं। कुछ रोज़ बाद मालूम हुआ कि उसका एक एक्सीडेंट में इंतिक़ाल हो गया है। बस- ये एक हल्का सा झटका था जो इतनी ज़ोर से लगा कि उसकी कसक मुझे आज भी महसूस होती है।

जब शायरी की इबतिदा की बात चली तो कहने लगे, मेरे वालिद अपने ज़माने के अच्छे शायर थे। नाम था 'दुआ डबाइवी'। उनके अशआर मुझे ज़ुबानी याद थे। यही अशआर सुना-सुनाकर मैं क़ॉलेज में अपने दोस्तों से चाय पिया करता था। कभी-कभी तो नाश्ते का इंतिज़ाम भी हो जाया करता था। उनके अशआर सुनाते-सुनाते ख़ुद भी शे'र कहने लगा।

हर इंसान की ज़िन्दगी में उतार-चढाव आते हैं। मेरी ज़िन्दगी को बचपन से ही तूफ़ानों का सामना करना पड़ा। मुम्बई आने पर भी तूफ़ान थमे नहीं। इसे आप मेरी हिम्मत या हौसला ही कहिए कि आज मुम्बई में मैं ख़ुशहाल ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ। सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में नग़्मा निगारी कर चुका हूँ। कई मशहूर गुलुकारों ने मेरी ग़ज़लें गाई हैं। जगजीत सिंह साहब ने ख़ासतौर से मेरी ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी है। निदा साहब, जगजीत सिंह साहब की बात कर रहे थे और मेरे कानों में उनकी गज़ल का ये मतला जगजीत सिंह की सुरीली आवाज़ में गूँज रहा था।
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