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नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए
नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए,
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है----------------- मीर
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क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल,
जला के देख लिया
किसी का साथ हमें रास ही नहीं
तेरा हमसफर कहाँ है
आखिर वो खफ़ा है किसलिए
अपना घर भी अपना घर नहीं लगता