मुख पृष्ठ > विविध > उर्दू साहित्‍य > आज का शेर > क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल,
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजिएयह पेज प्रिंट करें
 
क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल,
क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल,
सारे आलम को मैं दिखा लाया----मीर तक़ी 'मीर'

क़द्र------क़ीमत, मूल्य
मता-ए-दिल-----दिल की पूँजी, दिल जैसी चीज़,
आलम-----जगत, दुनिया, संसार
संबंधित जानकारी खोजें
और भी
जला के देख लिया
किसी का साथ हमें रास ही नहीं
तेरा हमसफर कहाँ है
आखिर वो खफ़ा है किसलिए
अपना घर भी अपना घर नहीं लगता
इश्क़ की कौन इंतिहा लाया