1. साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गया लेहरों से खेलता हुआ लेहरा के पी गया
बेकैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गया तौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गया
ज़ाहिद ये मेरी शोख़िए रिनदाना देखना रेहमत को बातों-बातों में बेहला के पी गया
सरमस्तिए अज़ल मुझे जब याद आ गई दुनिया ए ऐतबार को ठुकरा के पी गया
आज़ुर्दगी ए ख़ातिरेसाक़ी को देखकर मुझको वो शर्म आई के शरमा के पी गया
ऐ रेहमते तमाम मेरी हर ख़ता मुआफ़ मैं इंतेहाए शौक़ में घबरा के पी गया
पीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मेरी मजाल दरपरदा चश्मे यार की शेह पा के पी गया
इस जाने मयकदा की क़सम बारहा जिगर कल आलमे बसीत पर मैं छा के पी गया
2. कहाँ से बढ़ के पहुँचे हैं कहाँ तक इल्मो फ़न साक़ी मगर आसूदा इनसाँ का न तन साक़ी न मन साक़ी
ये सुनता हूँ के प्यासी है बहुत ख़ाके वतन साक़ी ख़ुदा हाफ़िज़ चला मैं बाँधकर सर से कफ़न साक़ी
सलामत तू तेरा मयख़ाना तेरी अंजुमन साक़ी मुझे करनी है अब कुछ ख़िदमते दारो रसन साक़ी
रगो पै में कभी सेहबा ही सेहबा रक़्स करती थी मगर अब ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी है मोजज़न साक़ी
न ला विसवास दिल में जो हैं तेरे देखने वाले सरे मक़तल भी देखेंगे चमन अन्दर चमन साक़ी
तेरे जोशे रक़ाबत का तक़ाज़ा कुछ भी हो लेकिन मुझे लाज़िम नहीं है तर्के मनसब दफ़अतन साक़ी
अभी नाक़िस है मयआरे जुनु तनज़ीमे मयख़ाना अभी नामोतबर है तेरे मसतों का चलन साक़ी
वही इनसाँ जिसे सरताजे मख़लूक़ात होना था वही अब सी रहा है अपनी अज़मत का कफ़न साक़ी
लिबासे हुर्रियत के उड़ रहे हैं हर तरफ़ पुरज़े लिबासे आदमीयत है शिकन अन्दर शिकन साक़ी
मुझे डर है के इस नापाकतर दौरे सियासत में बिगड़ जाए न ख़ुद मेरा मज़ाक़े शेर ओ फ़न साक़ी
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