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ग़ज़लें : ख्वाजा मीर दर्द देहलवी
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1.
मुझको तुझसे जो कुछ मोहब्बत है
ये मोहब्बत नहीं है आफ़त ह

लोग कहते हैं आशिक़ी जिसको
मैं जो देखा बड़ी मुसीबत ह

बन्दे एहकामे अक़्ल में रहन
ये भी इक नौ की ही हिमाक़त ह

एक ईमान है बिसात अपन
न इबादत न कुछ रियाज़त ह

आ बुतों के फ़ुसूँ के दाम में यू
दर्द ये भी ख़ुदा की क़ुदरत ह
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