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ग़ज़लें : ख्वाजा अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़लें
1.
ND

है जुस्तुजू के ख़ूब से है ख़ूबतर कहा
अब देखिए ठहरती है जाकर नज़र कहाँ

यारब इस इख़तेलात का अंजाम हो ब्ख़ैर
था उसको हमसे रब्त मगर इस क़दर कहा

इक उम्र चाहिए के गवारा हो नीशे इश्
रक्खी है आज लज़्ज़्ते ज़ख़्मे जिगर कहा

बस हो चुका बयाँ कसल ओ रंजे राह क
ख़त का मेरे जवाब है ऐ नामाबर कहा

कौनो मकाँ से है दिले वेहशी किनारागीर
इस ख़ानुमा ख़राब ने ढूँढा है घर कहा

होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्के इश्क़ की
दिल चाहता न हो तो दुआ में असर कहा

हाली निशाते नग़मा ओ मै ढूँढते हो अब
आए हो वक़्ते सुबहा रहे रातभर कहाँ
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