1. है जुस्तुजू के ख़ूब से है ख़ूबतर कहाँ अब देखिए ठहरती है जाकर नज़र कहाँ
यारब इस इख़तेलात का अंजाम हो ब्ख़ैर था उसको हमसे रब्त मगर इस क़दर कहाँ
इक उम्र चाहिए के गवारा हो नीशे इश्क़ रक्खी है आज लज़्ज़्ते ज़ख़्मे जिगर कहाँ
बस हो चुका बयाँ कसल ओ रंजे राह का ख़त का मेरे जवाब है ऐ नामाबर कहाँ
कौनो मकाँ से है दिले वेहशी किनारागीर इस ख़ानुमा ख़राब ने ढूँढा है घर कहाँ
होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्के इश्क़ की दिल चाहता न हो तो दुआ में असर कहाँ
हाली निशाते नग़मा ओ मै ढूँढते हो अब आए हो वक़्ते सुबहा रहे रातभर कहाँ |