फिल्मों में देखिए कि स्कूल खत्म हो रहे हैं। श्याम बेनेगल ने अंकुर-मंथन से शुरूआत की थी। फिर उन्होंने जुबैदा और वेलकम टू सज्जनपुर बनाई। अनुराग कश्यप, अपर्णा सेन और मधुर भंडारकर जैसे फिल्मकारों ने कला और व्यावसायिक फिल्मों के बीच की विभाजन रेखा को खत्म कर दिया है।
अभिनय के क्षेत्र से उदाहरण लेना चाहें तो युवा अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा कितना अच्छा अभिनय करती हैं। उनमें कितनी सहजता है, स्पांटेनिटी है। वे आजा नच ले जैसी फिल्मों में भी अच्छा अभिनय करती हैं और पेज थ्री में। लाइफ इन मेट्रो में भी और लागा चुनरी में दाग में भी।
चित्रकारी में भी यह देखा जा सकता है। तो अब सारी हदबंदिया टूट रही हैं। यह एक तरह से कलाओं का लोकतांत्रिकरण है। यह ज्यादा खुला और उदास समय है। ये सब अभिव्यक्ति के अलग अलग माध्यम हैं लेकिन इनके पीछे जो असल कलाकारी है वह तो एक ही है ना। यानी अपने को बेहतर से बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करना।
पहले के उस्ताद कहते हैं कि हमारे जमाने का संगीत कितना उम्दा था। हर समय के उस्ताद यह कहते हैं कि हमारे जमाने का संगीत कितना अच्छा था। यह भी एक चलन है।
पुणे यूनिवर्सिटी से वोकल म्यूजिक में एमए कर चुके और देश के तमाम संगीत सम्मेलनों में प्रस्तुतियाँ दे चुके पुष्कर कहते हैं समय के साथ संगीत बदलता है, उसके सुनने वाले बदलते हैं। जो दमदार होगा वह टिकेगा। हिमेश रेशमिया आए, आए और छा गए। आज उनका कोई नामलेवा नहीं।
दौर आते रहते हैं, संगीत बदलता रहता है, प्रयोग होते रहते हैं। और उसे पसंद -नापसंद किया जाता रहा है। फिल्म संगीत ही कितना बदल गया है। आज राहत फतेह अली खाँ और कैलाश खेर कितना अच्छा गा रहे हैं। प्रसून जोशी जैसे गीतकारों की बदौलत गीतों में कविता आ गई है। उसे पसंद भी किया जा रहा है।
गायन के लिए रामानुजम अवार्ड, फिरोदिया अवार्ड, सुधासिंधु अवार्ड, सुर मणि अवार्ड और सनातन संगीत पुरस्कार से से सम्मानित इस युवा गायक का मानना है कि अब तो रिएलिटी शोज के जरिये रातों-रात बच्चों से लेकर युवा तक शिखर पर पहुँच जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि वहाँ पहुँचकर कौन, कितनी देर टिकता है।
संगीत की दुनिया बहुत बड़ी दुनिया है। रिएलिटी शोज उसका एक बहुत ही छोटा सा हिस्सा हैं लेकिन इसके जरिये बहुत बड़ी संख्या में टैलेंट सामने आ रहा है। पहले तो कई प्रतिभाशाली कलाकार गुमनामी के अंधेरे में ही मर जाया करते थे। |