'द ज्वेल ऑफ मदीना' पुस्तक विवाद में
छापते-छापते हाथ खींच लिए प्रकाशक ने
कबीर किताबों का विवादों के घेरे में आना नई बात नहीं, उस पर यदि किताब किसी धार्मिक मसले से जुड़ी हो तो आग में घी का काम। विकसित राष्ट्रों में भी ऐसा होता है। अमेरिकी पत्रकार विल शैरी जोन्स इस बात को नहीं जानती थी, जो जानती तो क्या इस किताब को लिखतीं? क्योंकि फिलहाल छपने से कुछ ही दिन पहले, उन्हें रॉयल्टी का भारी-भरकम अग्रिम चुकाने के बाद (लगभग 50 हजार पाउंड दो किताबों के लिए) अचानक प्रकाशक ने उनकी एक किताब छापने से साफ इंकार कर दिया है। चलिए, इस बारे में विस्तार से जानते हैं।यह उपन्यास जोन्स की पहली कृति है तथा इसका नाम है- 'द ज्वेल ऑफ मदीना' उपन्यास पैगंबर मोहम्मद साहब की बालिका वधु आयशा पर आधारित है। इसमें आयशा की मोहम्मद साहब से सगाई होने से लेकर मोहम्मद साहब की मृत्यु तक का फलसफा है। जोन्स ने कई वर्षों तक अरब इतिहास का अध्ययन करने के बाद इसे लिखा है। उनके अनुसार यह उपन्यास अब तक उनके द्वारा किए गए सारे अध्ययन का निचोड़ है। इस कृति को छापने से इंकार करने वाले प्रकाशक हैं-'रैंडम हाऊस' जिन्होंने पूर्व में न केवल दो कृतियों के लिए जोन्स को पचास हजार पाउंड अग्रिम चुका दिए थे तथा आठ शहरों में उक्त कृति से संबंधित 'पब्लिसिटी टूर्स' की योजना भी बना चुके थे। तो आखिर वो कौन सा कारण था जिसने रैंडम हाऊस को कदम पीछे हटाने को मजबूर किया? |
| यह उपन्यास जोन्स की पहली कृति है तथा इसका नाम है- 'द ज्वेल ऑफ मदीना' उपन्यास पैगंबर मोहम्मद साहब की बालिका वधु आयशा पर आधारित है। इसमें आयशा की मोहम्मद साहब से सगाई होने से लेकर मोहम्मद साहब की मृत्यु तक का फलसफा है...... |
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रैंडम हाऊस द्वारा कहा गया है कि यह कृति विवादित है तथा इसे छापने से हिंसक प्रतिक्रियाओं का भय हो सकता था। आलोचक इस बात से सहमत नहीं हैं। वे प्रकाशक पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से पीछे हटने तथा कट्टरपंथियों के दबाव में आकर ये फैसला करने का आरोप लगा रहे हैं। यह विवाद तब सामने आया जब एक अमेरिकी समाचार पत्र ने मुस्लिम लेखिका 'आसरा नोमानी' का कॉलम छापा, जिसमें कहा गया कि वे रैंडम हाऊस के उक्त फैसले से बहुत दुखी हैं। इसके लिए उन्होंने इस्लामिक इतिहास की एक प्रोफेसर डेनिज स्पेलबर्ग को दोष दिया, जिन्होंने किताब का विरोध करते हुए उसे एक'सॉफ्ट-कोर पोर्नोग्राफी' करार दिया है, जिसके कारण प्रकाशकों ने इसे छापने से हाथ पीछे खींच लिए।
प्रोफेसर स्पेलबर्ग टैक्सास विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं तथा उन्हें प्रकाशकों ने कृति की एक 'एडवांस कॉपी' पूर्व-प्रकाशन समीक्षा हेतु भेजी थी। उनसे जो प्रतिक्रिया मिली, उसकी आशंका प्रकाशकों को नहीं थी। प्रोफेसर ने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा था कि- यह कृति युद्ध घोष है... विस्फोटक सामग्री है... राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। जाहिर है प्रकाशक इसे छापने का साहस नहीं जुटा पाए। उन्हें यह रूश्दी की किताबों तथा पैगंबर के कार्टून्स से भी ज्यादा विवादित मुद्दा लगा। रैंडम हाऊस के प्रवक्ता के अनुसार वे लेखक तथा प्रकाशन संस्थान से जुड़े तमाम लोगों सहित किताब बेचने वालों तक की सुरक्षा के बारे में सोच रहे हैं। बहरहाल... जैसा कि जोन्स खुद अपनी कृति के बारे में कह रही हैं- ''मैं इसे दो संस्कृतियों के बीच सेतु की तरह विकसित करना चाहती थी। मैं आयशा के साथ ही मोहम्मद साहब की सभी बीवियों की आवाज बनना चाहती थी, उन्हें आदर के साथ शब्दों में बाँधना चाहती थी। |
| उन्हें यह रूश्दी की किताबों तथा पैगंबर के कार्टून्स से भी ज्यादा विवादित मुद्दा लगा। रैंडम हाऊस के प्रवक्ता के अनुसार वे लेखक तथा प्रकाशन संस्थान से जुड़े तमाम लोगों सहित किताब बेचने वालों तक की सुरक्षा के बारे में सोच रहे हैं..... |
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वे स्मरणीय महिलाएँ, जिन्होंने इस्लाम को रूप देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें इतिहासकारों ने याद नहीं रखा। मैंने हमेशा इस्लाम धर्म को आदर दिया है। यह कृति भी इस्लाम एवं मोहम्मद साहब को पूरे आदर के साथ ध्यान में रखकर लिखी गई है।'' फिलहाल जोन्स की कृति विवादों में आ चुकी है तथा जोन्स के एजेन्ट किसी अन्य प्रकाशक की तलाश में हैं।