नाटक नहीं, चुपचाप काम करते हैं रामनाथ

DW| पुनः संशोधित बुधवार, 6 जून 2018 (11:22 IST)
सांकेतिक चित्र
गंगा यमुना की सफाई में भारत की सरकारें अरबों रुपये उड़ा चुकी हैं. लेकिन जमीन पर असली काम तो रामनाथ जैसे लोग करते हैं। लाइम लाइट से दूर रहने वाले ये लोग जैसे दानव से रोज लड़ते हैं।

पिछले 25 साल से रामनाथ की सुबह दिल्ली में बने यमुना नदी पर बंधे पुल के नीचे गुजर रही है। हर सुबह रामनाथ नदी किनारे बनी अपनी झोपड़ी से निकल कर यमुना के काले और गंदे पानी में जाते हैं। कभी उनका मछली पकड़ना होता था लेकिन आज रामनाथ मछली की जगह कचरा बीनते हैं। वह यहां कचरा जमा करते हैं।


40 साल के रामनाथ कहते हैं, "हमारे पास यही एक काम है। हम कचरे के ढेर से प्लास्टिक की बोतलें, बैग और इलेक्ट्रॉनिक्स छांटते हैं।" रामनाथ की ही तरह हजारों कचरा बीनने वाले राजधानी दिल्ली में यमुना के किनारे रहते हैं। ये नदी किनारे इकट्ठा होने वाले कचरे के ढेर से रिसाइकिल होने वाले कचरे को ढूंढते हैं। इससे बमुश्किल इन्हें दिनभर में 150 से 250 रुपये मिल जाते हैं।

रामनाथ खुद को कोई पर्यावरणविद नहीं समझते, बल्कि वह नई दिल्ली में रहने वाले उन चंद लोगों में से एक है जो नदियों को प्लास्टिक के दलदल से बचाने की कोशिश में जुटे हैं। कुछ इसी तरह का काम 9वीं कक्षा में पढ़ने वाला छात्र आदित्य मुखर्जी भी कर रहा है। इस छात्र ने आसपास के महंगे और बड़े रेस्तरां को प्लास्टिक के स्ट्रा का इस्तेमाल न करने के लिए मना लिया है।


सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली और इससे सटे इलाके रोजाना तकरीबन 17 हजार टन कचरा पैदा होता हैं। इसके लिए बड़े डपिंग ग्राउंड की जरूरत है। दिल्ली में कूड़े का ढेर अब करीब 50 मीटर ऊंचे हो चुके हैं। पिछले साल कचरे के इन पहाड़ों के गिरने से दो लोगों की मौत हो गई थी।

कार्यकर्ता चित्रा मुखर्जी कहती हैं, "आज हम जिन वस्तुओं का इस्तेमाल अपने आराम के लिए कर रहे हैं उन्हें गलने में सालों लग जाते हैं।" चित्रा मानती हैं कि प्लास्टिक से निजात पाने के लिए संयुक्त कदम उठाने चाहिए। जिसमें अधिकारी, शोधाकर्ता, पर्यावरणविद सभी शामिल हो सकें।

रामनाथ की ही तरह अमरदीप बर्धन भी प्लास्टिक इस्तेमाल को कम करने में जुटे हैं। अमरदीप को लगता है कि वह कुछ बदलाव ला सकते हैं। इनकी कंपनी प्रकृति, दक्षिण भारत में मिलने वाले ताड़ के पेड़ की पत्तियों से प्लेट और कटोरियां बनाती है। कागज की प्लेटों की तरह लगने वाली यह प्लेट सात से दस दिन में घुल जाती हैं। कंपनी ऐसे किसी ताड़ के पेड़ों की खेती नहीं कर रही है बल्कि पत्तियों के जमीन पर गिरने का इंतजार करती है।

अमरदीप कहते हैं, "इस पूरी प्रक्रिया में हम पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं। बल्कि हम कचरे से कुछ बना रहे हैं जिसे लोग पंसद करते हैं।" अमरदीप ने बताया कि पहले उनका कारोबार अमेरिका और यूरोप के बाजारों में किए जाने वाले निर्यात पर निर्भर था लेकिन अब भारत में ये बाजार बढ़ रहा है। खासकर युवाओं के बीच जो कीमत की बजाय क्वालिटी को तवज्जो देते हैं।


दुनिया का हाल
दुनिया हर साल 80 लाख टन प्लास्टिक कचरा महासागरों में फेंक रही है। इसका मतलब है हर मिनट करीब एक ट्रक प्लास्टिक कचरा समंदर में फेंका जा रहा है। ओशियन कंजर्वेंसी रिपोर्ट के मुताबिक इस कचरे का आधा हिस्सा पांच एशियाई देश, चीन, इंडोनेशिया, फिलिपींस, थाइलैंड और वियतनाम से आता है। ये सभी देश एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। यहां दुनिया का सबसे अधिक तैयार प्लास्टिक, इस्तेमाल के बाद बतौर कूड़ा फेंका जाता है।

इंडोनेशिया में गैरलाभकारी संस्था ग्रीनपीस के साथ काम करने वाले अधिकारी कहते हैं कि दुनिया इस वक्त प्लास्टिक के संकट से गुजर रही है, जहां सब कचरा नदी और महासागरों में डाला जा रहा है। थाइलैंड में एक व्हेल मछली की मौत के लिए उसके पेट में मिले 80 प्लास्टिक बैग को जिम्मेदार माना गया था। प्लास्टिक का ये असर समुद्रों में रहने वाले कछुओं और अन्य जीवों पर भी असर डाल रहे हैं।


बड़ा खतरा
विशेषज्ञ प्लास्टिक प्रदूषण को दुनिया के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। इसमें एक है माइक्रोप्लास्टिक। पांच मिलीमीटर से कम परिधि वाले प्लास्टिक के कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। प्लास्टिक के ये बारीक कण हर जगह मौजूद हैं। जिसे इंसान रोजाना किसी न किसी ढंग से ले रहा है। वैज्ञानिक अब तक माइक्रोप्लास्टिक के पूरे असर को समझ नहीं सके हैं। कंजर्वेंसी रिपोर्ट के मुताबिक अगर कचरा फेंकने में यही तेजी बनी रही तो साल 2025 तक दुनिया के समंदरों में 25 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा जमा हो जाएगा। इसका मतलब है कि साल 2050 तक महासागरों में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक का कचरा होगा।

एए/ओएसजे (एएफपी, एपी)

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