#अधूरीआजादी : क्या हम अभी भी 1947 में ही खड़े हैं?

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
सन् में भारतवर्ष आजाद होकर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में विभाजित हो गया। हिंदुस्तान ने धर्मनिरपेक्षता का रास्ता अपनाया। क्या होती है धर्मनिरपेक्षता? गुटनिरपेक्ष बनना, तुष्टिकरण करना, अपने ही देश में सीमाओं पर मारे जा रहे लोगों पर ध्यान नहीं देना, देश के गंभीर मुद्दों के प्रति शुतुमुर्ग बन जाना या कि उस सोच को बढ़ाते जाने जो 'भारत तेरे टूकड़े होंगे' के नारे लगा सके। दूसरी ओर पाकिस्तान ने कट्टरपंथ का रास्ता अपनाया और वह मुल्क किसी की भी परवाह ना किए बगैर अपने मकसद में कामयाब रहा। पंजाब में उसने करके दिखा दिया और कश्मीर में उसने जो करना था कर दिया। उसके पास अफगानिस्तान का अच्‍छा खासा अनुभव है और वह आगे भी यह करता रहेगा। जहां तक सवाल है चीन से दोस्ती का तो उसने 1962 में बता ही दिया।
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हम तो पाकिस्तान से तीन बार युद्ध जीतकर भी टेबल पर हार गए। हम ऐसी सोच के लोग हैं जो अपने डर को छुपाने के लिए अब कहते हैं कि 'अध्यक्ष महोदय जी! युग बदल गया है अब देश सामरिक ताकत से नहीं आर्थिक ताकत से चलता है।'.....आप कुछ भी सोचते रहिए जो काम हथियार का है वह तो हथियार ही करेगा। यदि अर्थ ही सबकुछ है तो हटा दीजिए सेना।...कोई माने या न माने लेकिन हम धीरे-धीरे अपनी आजादी खोते जा रहे हैं। अभी ही वक्त है चेतने का अन्यथा हम खुद को एक ऐसे संघर्ष में घिरा पाएंगे जहां आम जनता के सबसे नजदीक होंगे दुश्मन देश के सैनिक जिनका साथ देंगे देश के गद्दार। आप जानते ही हैं कि कैसे सीमावर्ती राज्यों में ये हालात हो गए हैं। मूल निवासी तो बेदखल हो ही रहा है और के चलते मूल धर्म भी अब लुप्त होने लगा है।
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मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष का आधार धन को मानते हैं जबकि जर्मन के प्रसिद्ध दार्शनिक राल्फ डेरेनडाफ वर्ग संघर्ष का आधार ताकत को मानते थे। हालांक कुछ लोगों का मानना है कि दोनों तत्वों का इसमें योगदान रहता है। संघर्ष या फसाद पैदा करने वाली विचारधाराएं धर्म में भी होती है और समाज में भी। प्रकृति भी कई दफे संघर्ष का कारण बन जाती है। हालांकि जो व्यक्ति संघर्ष करने की प्रवृत्ति के बीच संघर्ष से बचने की बात करता है वह लुप्त हो जाएगा यह तय है।

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भारत में 1757 से 1857 तक कंपनी का राज था। 1857 से शुरू हुआ ताज का राज जो 1947 में खतम हो गया, लेकिन अंग्रेजों ने इन दो सौ सालों में ऐसे बीज बोए जो आज हमारे लिए कांटे बनकर चुभ रहे हैं। अंग्रेजों ने जाते-जाते भारत के दो टुकड़े कर जनता के बीच सांप्रदायिक, प्रांतीय, भाषाई और जातिवादी सोच की चिंगारी भड़का कर चले गए। वर्तमान में माओवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, अलगाववाद, धार्मिक कट्टरता, अवैध घुसपैठ, धर्मान्तरण, वामपंथी राजनीति, जातिवाद और सांप्रदायिकता की राजनीति, भ्रष्टाचार, देशद्रोह और आदि सभी 70 वर्ष पहले बोए गए बीज के वृक्ष हैं।
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जिनके हाथ में दी आजादी:
आजादी के आंदोलन के दौरान देश के लोगों में धर्म, भाषा या प्रांत को लेकर किसी भी प्रकार का अलगाववादी भाव नहीं था। लेकिन जैसे ही आजादी की सुगबुगाहट हुई तो सभी तरह की अलगाववादी और विभाजनकारी सोच सामने आ गई। जिन्हें हमने अपना आदर्श माना उनकी गलतियां हमारे लिए आज भी कांटे-सी चूभती है। आपको कुछ उदाहरण से समझ में आएगा कि आजादी किन लोगों के हाथ में चली गई थी।
स्वतंत्रता के बाद पहले जयप्रकाश नारायण के जनआंदोलन के कारण इमरजेंसी ने आजादी पर ग्रहण लगाया, फिर मंडल आयोग ने देश के सामाजिक ताने-बाने में सेंध लगाई। बाबरी ढांचे के विध्वंस का तमाशा सबने देखा। फिर मुंबई बम कांड और फिर गोधरा कांड के कारण गुजरात दंगों के दंश को झेला। आरक्षण के नाम पर छात्र आंदोलन की आग बुझी ही नहीं थी कि गुर्जर और मीणाओं की तनातनी भी देखी। फिर अंत में आ गए अन्ना हजारे जिनके आंदोलन को अरविन्द केजरीवाल ने भस्म कर कर दिल्ली के सिंहासन को अपने कब्जे में कर लिया।
हर आंदोलन ने देश में असंतोष की आग तो लगाई साथ ही नए राजनेता पैदा कर दिए जिसमें आश्चर्यजनक रूप से वे लोग हमेशा से ही हाशिये पर धकेल दिए गए जिन्होंने आंदोलन की शुरुआत की या तो आंदोलन के सेतु थे। मेन स्ट्रीम में आ गए वे नकली लोग जो सत्ता के भूखे और चालक लोग थे। आजादी के आंदोलन के साथ भी यहीं हुआ। असली लोग फांसी पर चढ़ गए और उनके परिवार के लोग हाशिए पर धकेल दिए गए। नकली लोगों ने सत्ता का सुख भोगा और देश में ढेर सारी समस्याओं को जन्म देकर वे भी अंग्रेजों की तरह मजे लुटकर चिता पर जल गए और उनकी समाधियों पर देश-विदेश के नेता आकर आज फूल चढ़ाते हैं।
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आजादी के 70 वर्ष बाद आज तक हम उन्हीं सभी समस्याओं से लड़ रहे हैं जो अंग्रेज हमें देकर गए थे। हमने कभी उन समस्याओं को हल करने की दिशा में कार्य नहीं किया बल्कि हमारे राजनीतिज्ञों ने भी वहीं किया जो अंग्रेज 200 वर्षों से करते आए थे। उन्होंने दो संप्रदायों के बीच फूट डालकर राज किया हमारे राजनीतिज्ञों ने भी यही किया। उन्होंने जातियों को बढ़ावा दिया और अगले और पिछड़े की भावना को विकसित किया, हमारे राजनीतिज्ञों ने भी उन्हीं का अनुसार किया। इस सब के चलते आजाद के आंदोलन, आजादी ने और आजादी के बाद के राजनीतिज्ञों की नीति ने ऐसे हजारों सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब ढूंढा जाना चाहिए...ऐसे ही कुछ सवाल जो अपके मन में ही होंगे...
* आज भी क्यों जारी है अंग्रेजों के सिस्टम?
* कब होगा सीमाओं का निपटना?
* कब तक जारी रहेगी जातिवाद और सांप्रदायिकता की राजनीति?
* नक्सलवाद और आतंकवाद पर लगाम क्यों नहीं?
* कब तक जारी रहेगा महिलाओं के साथ बलात्कार?
* क्यों नहीं कोई चाहता भ्रष्टाचार मिटाना?
* शिक्षा के केंद्रीयकरण करने में डर किस बात का?
* इतिहास को फिर से लिखे जाने में विवाद क्यों?
* बिजली, पानी, रोटी, सब्जी, कपड़ा और मकान कब होंगे सस्ते?
* कब पीओके को हम वापस हासिल कर पाएंगे?
* चीन से हम कब ले पाएंगे अपनी भूमी?
* सत्ता, राजनीति, मीडिया, शिक्षण संस्थान और सिनेमा जगत में बैठे देश के गद्दारों से कब निपटा जाएगा?
* धर्मान्तरण और नक्सलवाद के लिए विदेशों से मिल रही आर्थिक मदद और हथियारों की सप्लाई कब बंद होगी?
* गुंडा, नशा और दुर्घटना मुक्त भारत कब बनेगा?

*** और भी सवाल जोड़े जा सकते हैं।
हम आजादी का पर्व क्यों मनाते हैं? क्या इस दिन भारत विभाजित नहीं हुआ था? किन लोगों के कारण भारत विभाजित हुआ था? क्यों भारत विभाजित हुआ था? अंग्रेजों ने हमें गुलाम क्यों बना लिया था? 200 साल में अंग्रेजों ने हमारे साथ क्या-क्या किया? और अंत में यह सवाल भी कि कितने भारतीय युवा जानते हैं कि अंग्रेजों ने हमारे साथ क्या-क्या किया और हमें आजादी किन-किन लोगों ने दिलवाई और भारत को विभाजित किन लोगों ने मिलकर किया था?

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इतिहास के प्रति उपेक्षा : गुलाम बनने के मुख्‍य कारणों में से एक यह है कि लोग अपने इतिहास और भूगोल के प्रति सजग नहीं रहते हैं। राजनीति और समाज की समझ का आधार इतिहास होता है। ज्यादातर ऐसे राजनीतिज्ञ हैं जिन्हें भारत के इति‍हास और भूगोल की कोई खास जानकारी नहीं है। कहते हैं कि जिस देश के लोगों को अपने इतिहास की जानकारी नहीं होती, वह देश धीरे-धीरे स्वयं की संस्कृति, धर्म, देश की सीमा और देशीपन को खो देता है।
इस देश के ज्यादातर लोगों को सिर्फ इतना-भर मालूम है कि हम कभी गुलाम थे इसीलिए आज आजादी का पर्व मनाया जाता है। हमें गुलामी से मुक्त कराने वाले कुछ खास नाम वे हैं जिनके पोस्टर हम शहरों या अखबारों में छपे हुए देख लेते हैं किंतु यह कतई नहीं मालूम कि यह आजादी किस तरह हासिल की गई और क्या था अंग्रेजों का काल और किस तरह हमें अंग्रेजों ने लूट खाया। यह नहीं मालूम तभी तो आज भी ज्यादातर भारतीय अंग्रेजों और अंग्रेजी के भक्त हैं। धन्य है मेरा देश जो इतिहास नहीं जानता।
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इन 70 वर्षों में देश के राजनीतिज्ञों ने देश का सत्यानाश कर दिया है। आज सरहद असुरक्षित है। रोज एक जवान शहीद हो रहा है। कई बच्चे अनाथ हो रहे हैं और शहीदों की लिस्ट बढ़ती ही जा रही है। किसे चिंता है इसकी? संसद में बैठे नेता चिल्ला रहे हैं किसलिए? आजादी के आंदोलन में शहीद हुए शहीदों के बलिदान को व्यर्थ सिद्ध कर करने के लिए या सत्ता भोग के लिए। आज दुख होता है जब भगतसिंह के घर को तोड़ा जाता है। मंगल पांडे की समाधी पर दीपक जलाने के लिए देश का कोई बड़ा नेता नहीं जाता है।
इन 70 वर्षों में देश के लगभग हर हिस्से में मनमानी तंत्र ही नजर आया। इस मनमानी के चलते देश में अलगाववादी, आतंकवादी, प्रांतवादी, सांप्रदायिक, भाषावादी और भ्रष्टाचारवादी प्रवृत्तियां पनपती रहीं और देश को विखंडित किए जाने का दुष्चक्र चलता रहा जो आज अपने चरम पर है। देश के देना इसके प्रति आंखें मुंदे बैठे रहे। क्या आजादी का यही मतलब है कि हम नए तरीके से गुलाम होने या विभाजित होने के रास्ते खोजें? कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और खंभात से लेकर सिक्किम तक भारतवासी भय, भुखमरी और असुरक्षा की भावना में जी रहे हैं। हमने तरक्की के नाम पर युवाओं के हाथों में मोबाइल, इंटरनेट, शराब की बोतल, धर्म और राजनीति के झंडा दे दिए हैं, लेकिन अपना सुख-चैन, आपसी प्रेम और विश्वास खो दिया।


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