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कोई फीस नहीं फिर भी सिर्फ आठ विद्यार्थी

कोई फीस नहीं फिर भी सिर्फ आठ विद्यार्थी - No fee yet only eight students
इंदौर नगर में क्रिश्चियन मिशनरी का आगमन 1880 के पूर्व हो चुका था। उन्हें एक महाविद्यालय व चिकित्सालय चलाने के लिए होलकर राज्य की ओर से लगभग 20 एकड़ भूमि दान के रूप में 1888 ई. में प्रदान की गई थी। उसी वर्ष केनेडियन मिशन महाविद्यालय (वर्तमान क्रिश्चियन कॉलेज) की स्थापना की गई। राज्य में स्थापित होने वाला यह पहला महाविद्यालय था। प्रारंभ में इस महाविद्यालय का संचालन व नियंत्रण यूनाइटेड चर्च ऑफ इंडिया की शाखा सेंट्रल इंडिया मिशन के द्वारा होता था।
 
1893 ई. तक इस महाविद्यालय में केवल इंटरमीडिएट कक्षा तक ही शिक्षा देने की व्यवस्था थी। उसी वर्ष से यहां स्नातक कक्षाओं का अध्यापन प्रारंभ हुआ। स्नातकोत्तर अध्यापन 1910 में प्रारंभ हुआ और पहला विषय था दर्शन शास्त्र जिसमें एम.ए. उपाधि हेतु पढ़ाई प्रारंभ हुई। इस महाविद्यालय में केवल कला संकाय के विषयों का ही अध्ययन होता था। इस महाविद्यालय में खेल का मैदान, दो छात्रावास तथा वाचनालय आदि भी संलग्न थे। इस कॉलेज से 'द बुलेटिन ऑफ क्रिश्चियन कॉलेज' नामक पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता था।
 
महाराजा शिवाजीराव होलकर द्वारा 10 जून 1891 को होलकर महाविद्यालय की स्थापना की गई। प्रारंभ में यह महाविद्यालय 'इंदौर मदरसा' भवन तोपखाने में लगता था। वर्तमान भवन में यह महाविद्यालय मार्च 1894 को स्थानांतरित हुआ। इसमें छात्रावास भी था।
 
प्रारंभ में इस महाविद्यालय की छात्र-संख्या केवल 8 थी। 1891 से 94 तक इस महाविद्यालय के छात्रों से किसी प्रकार का शिक्षण शुल्क नहीं लिया जाता था। नए भवन में स्‍थापित हो जाने के बाद 1895-96 से शिक्षण-शुल्क लागू किया गया। छात्र पहले ही कम थे। शुल्क लेने पर उनकी संख्या और घट गई। इस कारण आगामी 2 वर्षों तक शिक्षण शुल्क न लिए जाने की घोषणा करनी पड़ी। 1898-99 में पुन: शुल्क लेना प्रारंभ किया गया किंतु इस बार एक सावधानी रखी गई कि जो विद्यार्थी निर्धन थे, उन्हें शुल्क-मुक्ति प्रदान कर दी गई।
 
इस महाविद्यालय में कला संकाय व तकनीकी संकाय के अंतर्गत अध्यापन होता था। कला में आंग्ल-साहित्य, इतिहास, राजनीति, प्राकृतिक विज्ञान, गणित, तर्क, नैतिक दर्शन, संस्कृत तथा फारसी का अध्यापन होता था। तकनीकी क्षेत्र में ड्राइंग, सर्वे, सुतारी कार्य, धातु उत्कीर्ण तथा मुद्रण कला आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था।
 
1904 तक यह महाविद्यालय कलकत्ता महाविद्यालय से संबंधित रहा। उसी वर्ष भारत सरकार के विश्वविद्यालय अधिनियम के कारण यह महाविद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध हो गया। 1906 में यहां विज्ञान की स्नातक कक्षाओं को प्रारंभ किया गया। 1912 में यहां रोजगार पाने वाले विद्यार्थियों का पंजीयन प्रारंभ हुआ। इस तरह यह कॉलेज रोजगार कार्यालय का भी कार्य करने लगा।
 
इंदौर विश्वविद्यालय 1942 में स्थापित हो जाता
 
इंदौर नगर में होलकर महाविद्यालय की स्थापना और बढ़ती हुई विद्यालयों की संख्या ने विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु नगर में अच्‍छा वातावरण निर्मित कर दिया था। वैसे भी होलकर महाविद्यालय को बंबंई, कलकत्ता, इलाहाबाद व आगरा विश्वविद्यालयों से संबद्ध होते समय अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।
 
इंदौर नगर के भावी विकास की संभावनाओं तथा स्वरूप पर अध्ययन करने के लिए नगर नियोजन के विशेषज्ञ पेट्रिक गिडीस को राज्य द्वारा नियुक्त किया गया था। गिडीस ने बहुत सूक्ष्म अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट 2 जिल्दों में 1918 में महाराजा को प्रस्तुत की। गिडीस ने इंदौर में विश्वविद्यालय की स्थापना के परामर्श के साथ ही विश्वविद्यालय के भवन का स्थान भी निर्धारित कर दिया था।
 
1924 ई. में होलकर महाविद्यालय के प्राचार्य एफ.जी. पीयर्स ने महाविद्यालय के संबद्धीकरण के मार्ग में आने वाली बाधाओं व कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए इंदौर में विश्वविद्यालय की स्थापना की अनुशंसा की थी। उन्होंने लिखा- 'मैं इंदौर में स्‍थानीय विश्वविद्यालय की स्थापना का समर्थन करता हूं जिससे विद्यार्थियों को भी संबंधित रखा जाएगा, जैसा कि एस्क्युथ कमीशन ने लंदन विश्वविद्यालय के आधार पर तथा सेडलर कमीशन ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के आधार पर अनुमोदित किया है तथा जिसका पालन भारत में इलाहाबाद, वाराणसी, बंबई, लखनऊ, मद्रास, रंगून तथा अलीगढ़ विश्वविद्यालयों के द्वारा किया जा रहा है। अत: मैं सरकार से विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में तुरंत गंभीर पग उठाने की अनुशंसा करता हूं।' इस अनुशंसा पर तत्काल तो कोई ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन 1942 में होलकर दरबार ने विश्वविद्यालय की स्थापना का कानून पारित किया। 1948 में इस कानून में कुछ और उपबंध जोड़े गए। इन्हीं के आधार पर 1948 में इंदौर में एक विश्वविद्यालय कार्यालय स्थापित भी कर दिया गया था, किंतु देश व प्रदेश में हुए राजनीतिक परिवर्तनों के कारण तत्काल इंदौर में विश्वविद्यालय की स्थापना न हो सकी।
 
1962-63 की बात है, जब वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति शंकरदयालजी शर्मा इंदौर पधारे थे। आप म.प्र. में उच्च शिक्षा के विस्तार हेतु सदैव प्रयत्नशील रहे और शिक्षामंत्री के रूप में यह प्रदेश उनके योगदान को भी विस्मृत नहीं कर सकता। आपने इंदौर की एक आमसभा को संबोधित करते हुए नगर में शैक्षणिक विस्तार का आह्वान किया। सभा स्थल पर ही कुछ लोगों ने मांग की कि इंदौर में विश्वविद्यालय की स्थापना की जानी चाहिए। शर्माजी ने मंच पर से ही घोषणा की कि निर्धारित व्यय का आधा भाग यदि नगरवासी वहन करने को तैयार हों तो शीघ्र ही विश्वविद्यालय स्थापित करने का मैं वचन देता हूं।
 
उसी दिन नगर पालिका ने कुछ धनराशि देने की घोषणा की। शेष राशि जो लगभग 5 लाख थी, एकत्रित की जानी थी। नगर के प्रभावी लोग व बुद्धिजीवी यशवंतरावजी के पास पहुंचे। महाराजा ने सहर्ष शेष पूरी राशि अपनी ओर से मिलाने की स्वीकृति दे दी।