वैदिक धर्म क्या कहता है

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आत्मा की एकता
में आत्मा की एकता पर सबसे अधिक जोर दिया गया है। जो आदमी इस तत्व को समझ लेगा, वह किससे प्रेम नहीं करेगा? जो आदमी यह समझ जाएगा कि 'घट-घट में तोरा साँई रमत है!' वह किस पर नाराज होगा? किसे मारेगा? किसे पीटेगा? किसे सताएगा? किसे गाली देगा? किसके साथ बुरा व्यवहार करेगा?
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥
 
जो आदमी सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए किसका मोह, किसका शोक?
वैदिक धर्म का मूल तत्व यही है। इस सारे जगत में ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है। उसी को पाने के लिए, उसी को समझने के लिए हमें मनुष्य का यह जीवन मिला है। उसे पाने का जो रास्ता है, उसका नाम है धर्म।
 
धर्म के चार लक्षण
मनु महाराज ने धर्म के चार लक्षण बताए हैं:
 
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विघं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम्‌॥
 
धर्म की कसौटी चार हैं :
1) वेद, 2) स्मृति, 3) सदाचार 4) आत्मा को रुचने वाला आचरण
 
: वेद चार हैं। हर वेद के चार विभाग हैं : संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्।
 
स्मृति: शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष- ये छः वेदांग, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण और नीति के सभी ग्रंथ स्मृति में आते हैं। यों मुख्य स्मृतियाँ हैं : मनु स्मृति (मानव धर्मशास्त्र), याज्ञवल्क्य स्मृति, अत्रि स्मृति, विष्णु स्मृति, आपस्तम्ब स्मृति, पाराशर स्मृति, व्यास स्मृति और वशिष्ठ स्मृति।
 
दीक्षा और तप : सत्य की साधना के लिए दीक्षा भी चाहिए और तपस्या भी।
 
यजुर्वेद में कहा है :-
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाऽप्नोति दक्षिणाम्‌।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥
 
व्रत से दीक्षा मिलती है, दीक्षा से दक्षिणा, दक्षिणा से श्रद्धा और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।
 
तप का अर्थ : इंद्रियों का संयम। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए तप करना ही पड़ता है। धर्म को पाने के लिए भी तप करना जरूरी है। ब्रह्मचर्य-जीवन में जिस तरह तपस्या करनी पड़ती है, उसी तरह आगे भी।
 
ब्रह्म और यज्ञ : ब्रह्म का अर्थ है प्रार्थना। वैदिक मंत्रों का विधिवत पाठ करना, मंत्रों का जप करना, परमात्मा की स्तुति और प्रार्थना करना धर्म का आवश्यक अंग माना गया है। उसी तरह यज्ञ करना भी। प्रार्थना और यज्ञ करने वाला सदाचारी होना चाहिए। नहीं तो उसकी पूजा-प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। सदाचारी लोग ही तरते हैं, दुराचारी नहीं।


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