'होली' विशेष पर वृंदावन की मार्मिक कहानी : 'तर्पण'

-उषा यादव

एक तो फागुन का महीना, उस पर हर्ष और उमंग का त्योहार 'होली'। और सबसे बढ़कर कन्हैया की रंगस्थली वृंदावन। भला ऐसे फगुआए मौसम में कोई मरने की सोचता है? पर 'आमारबाड़ी' आश्रम की सप्तदल को क्या कहा जाए, जिसने ऐन होली के दिन मौत को गले लगा लिया।

चलो मर गई तो मर गई, कौन बैठा था उसके नाम पर रोने वाला? जो रिश्तेदार 10 साल की विधवा को मोक्ष दिलाने की सदाशयता से भरकर छोड़ गया था, उसका तो चेहरा भी उसे याद नहीं था। इसके बाद तो पूरी उम्र निकल गई, आश्रमों में कीर्तन करते। आज भी अच्‍छा-भला दोपहर का खाना खाया, कुछ देर आराम करने के लिए अपनी कोठरी में गई और वहां मौजूद आनंददासी से जी घबराने की शिकायत की और बस एक हिचकी और खेल खत्म!
वक्त भी ऐसा चुना, जब आश्रम का चौकीदार ब्रज के रिवाज के अनुसार त्योहार मनाने के लिए अपनी ससुराल गया हुआ था। 'आमारबाड़ी' में 60 से लेकर 105 साल तक की 65 विधवाओं के बीच एक भी मर्द मानुस मौजूद नहीं था। 'सप्तदल' नहीं रही की जलती खबर ने मिनटों में पूरे आश्रम को अपनी लपटों में ले लिया।

अविश्वास से भरी विभिन्न उम्र की बूढ़ियां लड़खड़ाते कदमों से उसकी कोठरी की तरफ भागीं। 80 साल की मां आनंददासी अपने पोपले मुंह से जो जल्दी-जल्दी बोली उसका सार यही था कि सप्तदल ने इस उम्र में भी मजाक करने की आदत नहीं छोड़ी है। क्या मजे से आंखें मूंदकर लंबी होकर मरने का ढोंग कर रही है। इसके पैरों के तलुओं में जरा गुदगुदाओ, अभी हंसते हुए आंखें खोल देगी और उठकर बैठ जाएगी।

'यह मजाक नहीं सच है, 105 साल की बूढ़ी लखीदासी ने जिस गुरु-गंभीर आवाज में मृत्यु की पुष्टि की, उससे आनंददासी स्तंभित-सी खड़ी रह गईं। तभी 2-4 बूढ़ियां सिसकने लगीं तो आनंददासी और अधिक हतप्रभ हो उठी। उसने व्याकुलता से अपना सिर दाएं-बाएं घुमाया, माथा ठोंका और बुदबुदाई- 'तू मुझे छोड़कर नहीं जा सकती सप्तदल। कहीं कोई लोई-कंबल बंटे या भंडारा हो, हमेशा दौड़कर मुझे बताती थी। अब कौन मेरा ध्यान रखेगा री?'

एक और बूढ़ी बिसूरी बोली- 'मुझे तो आंख से कुछ नहीं सूझता। तेरे सहारे ही मैं मंदिरों में कीर्तन करने पहुंच जाती थी। तुझ बिन मेरा कौन सहारा बनेगा, बहना?' नाक-थूक-आंसुओं का मिला-जुला गीलापन। कुछ पोपले मुंह खुले के खुले रह गए। कुछ झुर्रीभरे हाथ सहारे के लिए सीलनभरी दीवार थामते, कुछ जर्जर तन बिलबिलाकर टूटे फर्श पर ढहते। तभी 105 साल की लखीदासी ने सबसे पहले उबरकर घबराई आवाज में कहा- 'रोना-धोना छोड़ो, अभी उस समस्या पर विचार करो, जो हमारे ऊपर आ गई है।' कुछ का रोना रुक गया, कुछ बदस्तूर रोती रहीं। दो-तीन कंठों से अस्फुट आवाज निकली- कैसी समस्या?

आश्रम का एकमात्र मर्द चौकीदार गया है त्योहार मनाने, वह कल लौटेगा नहीं, परसों का भी भरोसा नहीं। तब तक मृत सप्तदल को यहीं रखने से कैसे काम चलेगा। हाल की मरी अपनी सखी के प्रति लखीदासी का यह नजरिया कुछ बूढ़ियों को अटपटा ही नहीं, हृदयहीन भी लगा।

लखीदासी ने इसे महसूस किया। आंसुओं से रुंधे कंठ से बोली- 'सप्तदल मेरी बहुत सगी थी। उसके तुरंत दाह-संस्कार की बात कहते हुए मेरा कलेजा फट रहा है, लेकिन क्या किया जाए। हमें इस समय व्यावहारिक बनना पड़ेगा।' कोई कुछ न बोला। उसने बूढ़ियों को समझाने की कोशिश की- 'देखो मार्च का महीना है। गर्मी पड़ने लगी है। मुहल्ले वालों की मदद से अगर हमने सप्तदल का दाह-संस्कार नहीं किया तो फिर होली के त्योहार पर दो दिनों तक कोई आदमी ढूंढे नहीं मिलेगा।'

सचमुच शाम को होलिका दहन था और कल रंग की होली। ब्रज के उत्सव प्रेमी माहौल में लट्ठमार होली, धुलेंडी, गुलाल की होली और कीचड़ की होली के अनेक रूपों की छवियां उकेरती हैं। उस समय भला कौन अपना सजीला रंगीला त्योहार छोड़कर मुर्दा फूंकने के लिए जुटता।

सप्तदल की ‍निर्जीव देह की निगरानी के लिए चंद अपाहिज-लाचार बूढ़ियों को छोड़कर जल्दी ही सारी संगी-साथिनें आश्रम से निकल पड़ीं। वृंदावन की संकरी गलियों में माला के मनकों की तरह बिखरकर वे द्वार-द्वार की याचिका बन गईं। किसी ने दरवाजा खोला, किसी ने अंदर से ही घुड़क दिया- 'दूसरा घर देखो भाई, त्योहार के दिन सब काम में लगे हैं, भीख तुम्हें कौन आकर दे?' भीख?

छोटे-बड़े मंदिरों में यंत्रवत कीर्तन करके एक रुपया रोजाना पाना उन्हें कभी भीख नहीं, अपना मेहनताना लगा था। गर्व से सिर उठाकर ही उन्होंने इसे स्वीकारा था। पर आज अपनी एक मृत संगिनी के दाह-संस्कार की खातिर वे जैसे सचमुच दर-दर की भिखारिन हो गई थीं। किंतु कांसे के कटोरे में मुट्ठीभर आटा या खुली हथेली पर रुपया-अठन्नी टिका देते नकली दानदाताओं की भीड़ में, उनकी झोली में करुणा के चार कण डालने वाला एक भी कर्ण नहीं है, इसे इन्होंने जल्दी ही समझ लिया था।

पांच-सात घरों से निराश होकर लौटकर और पुरुषों का नितांत संवेदनहीन रवैया देखकर 105 साल की लखीदासी तो इतनी खिन्न हुई कि बिना दरवाजा खटखटाए ही अगले चबूतरे पर पस्त होकर लुढ़क गई। तभी किसी ‍काम से 17-18 साल की एक लड़की ने दरवाजा खोला और बूढ़ी को पड़ा देखकर करुण कंठ से पूछा- 'यहां इस तरह क्यूं पड़ी हो माई? तबीयत तो ठीक है?

अपने सूखे पपड़ियाए होंठों पर जबान फेरते हुए लखीदासी बोली- 'तुम्हारे पिताजी या बड़े भाई इस समय घर में हों तो उन्हें भेज दो बेटी।' 'कोई काम है क्या, मुझे बता तो, लड़की ने सहज भाव से पूछा। इससे पहले किसी दरवाजे पर किसी ने प्रयोजन पूछने की जरूरत नहीं समझी थी, इसीलिए यही सहानुभूति पाकर लखीदासी की आंखें भादो के आसमान-सी भर उठीं- 'आमारबाड़ी की एक बुढ़िया अभी-अभी मरी है। उसके अंतिम संस्कार के लिए कुछ आदमी...'

लड़की बोली- 'ठीक है मैं पापा को भेजती हूं।' ऐसा कहकर वो अंदर चली गई। कुछ पल बाद एक संभ्रांत पुरुष ने बाहर निकलकर, सहृदय कंठ से पूछा- 'कौन बूढ़ी मरी है?' लखीदासी ने आंसू पोंछकर बताया- 'एक विधवा थी बेचारी।' संभ्रांत पुरुष ने पूछा- 'विधवा तो थी, पर किस जाति की थी?' 'ओ बाबा! लखीदासी की आंखें चौड़ी हो गईं। अब भला इस बात को कौन बता सकता है? अभागी सप्तदल को यह सब कहां पता था? 10 साल की उम्र में ससुराल पक्ष का कोई रिश्तेदार उसे यहां पटक गया था। उसके बाद किसी घर-‍परिवार ने कभी कोई खोज-खबर नहीं ली।'

'तब तो दूसरा दरवाजा देखो भाई। यह कुलीन ब्राह्मण का घर है। अगर कोई ब्राह्मणी मरी होती तो मैं उसकी सद्गति के लिए जरूर कुछ करता, पर किसी अज्ञात कुल-गौत्र वृद्धा के लिए...' लखीदासी के आंसू झर-झर बह उठे- 'हम लोग बहुत दुखियारी हैं बाबू। ऊपर वाले ने ही हमारा नसीब ठोकरें खाने का लिखा है। आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि बुढ़िया को किसी तरह श्मशान पहुंचा दें। होली का हुड़दंग हो जाने के बाद कौन पास खड़ा होगा? अभागी की मिट्टी (मृत देह) की दुर्गति हो जाएगी...।'

हिचकियों में रोते हुए लखीदासी का लपककर पैर पकड़ लेना अनर्थ ढा गया। गृहस्वामी ने तिलमिलाकर चीखते हुए कहा- 'पीछे हटो, मेरे पैर छोड़ो। खबरदार जो यहां टसुए बहाकर त्योहार के दिन अपशकुन किया। तुम लोगों को ऐसे ही थोड़े भगवान ने घरों से निर्वासित होने का दंड दिया है। करम ही ऐसे होते हैं तुम्हारे। और कुछ नहीं तो मेरे ही गले पड़ गईं। फौरन यहां से खिसको। समझी...।'


समझने को अब बाकी ही क्या था? लखीदासी ने फटी हुई धोती का आंचल आंखों पर रख लिया। टटोलकर अपनी लाठी उठाई और धूलभरी गली में नंगे पांव आगे बढ़ गई...। उधर गृहस्वामी ने अंदर जाकर बेटी पर आक्रोश उतारा- 'तुम भी बड़ी नासमझ हो गीता। उस बूढ़िया से मरने वाली की जाति तक नहीं पूछी। इतनी-सी बात पूछकर तुम्हीं उसे दरवाजे से टरका देती। कुलीन ब्राह्मण की लड़की होकर मामूली लोक व्यवहार नहीं सीखा।'

लड़की अपने पिता के सामने तो चुप रही़, पर रसोई में पूरियां तल रही मां के पास जाकर कुड़कुड़ाई- 'बड़े अजीब हैं पापा, 'आमारबाड़ी' की एक बूढ़िया के दाह-संस्कार पर जाति-पाति की खुचड़ निकालने लगे।' 'इसमें खुचड़ कैसी?' जाति-पाति तो रोटी-बेटी के संबंध से लेकर कंधा देने तक के मामलों से जुड़ी रहती है, हां, आजकल की लड़कियों ने परंपराओं के नाम पर भी नाक-भौं सिकोड़ने का फैशन जरूर बना लिया है, मां ने उसे झिड़क दिया।

पर गीता हार मानने वाली लड़की नहीं थी। उसने अपने बड़े भाई प्रशांत के पास जाकर कहा- 'आमारबाड़ी की एक बूढ़िया मर गई है, कुछ दोस्तों के साथ जाकर उसका अंतिम संस्कार करा दो।' 'पागल है क्या?' प्रशांत ने तुनककर कहा। इस वक्त मेरे दोस्त होली की मस्ती में डूबे होंगे। क्या मैं उन्हें मुर्दा उठाने को कहूंगा? और यूं भी इस किस्म की समाजसेवा बुजुर्गों के खाते में ही डालनी चाहिए।

गीता ने इसके बाद किसी से एक शब्द नहीं कहा। उसका दम घुटने लगा तो ठंडी हवा खाने के लिए छत पर चली गई। इंटर प्रथम वर्ष की वह छात्रा थी। अगल-बगल में रहने वाली अनसूया और दीपा उसकी सहपाठिनी ही नहीं, अभिन्न सहेलियां थीं। आवाज देकर उन्हें छत पर बुला लिया। मुंह से मुंह सटाकर देर तक बातचीत की। इसके बाद गीता नीचे उतरी और मां से बोली- 'मैं अपनी क्लास टीचर के यहां जा रही हूं।'


मां ने सवाल किया इस वक्त? गीता बोली- 'अनसूया और दीपा भी साथ जा रही हैं। क्लास टीचर ने मुझको अपने यहां बुलवाया है। अंग्रेजी के महत्वपूर्ण प्रश्न बताएंगी जो परीक्षा में आने वाले हैं। यदि हम 500-500 रुपए लेकर उनके घर पहुंच जाएं तो दो ‍दिन बाद अंग्रेजी का जो पेपर होने वाला है, उससे हमारा उद्धार हो जाएगा। हमें 3-4 घंटे का वक्त तो लग जाएगा। देखो दीपा और अनसूया भी मुझको बुलाने आ गईं। अब रुपए दोगी या ‍इंटर में मुझे एक साल और पढ़वाओगी।'

100-100 के पांच नोट अपने पर्स में ठूंसकर गीता फुर्र से घर से निकल गई। सहेलियों के साथ मुख्य सड़क पर आकर उन्होंने एक खाली रिक्क्षा रोका और उसमें बैठते ही बोली- 'जहां मुर्दे के दाह संस्कार का सामान मिलता है, वहीं पर चलना है।' झूठ बोलने की ग्लानि जरूर है पर...माथे का पसीना पोछते गीता गंभीर हो गई। अनसूया ने तिलमिलाकर प्रति प्रश्न किया- 'क्या सच बोलकर हम लड़कियां अपने घरों से निकल पातीं?'

'छोड़ो...यह शुरुआत भर है। साध्य की पवित्रता पर दृष्टि रखकर अभी हमें साधन की अपवित्रता नजरअंदाज करनी पड़ेगी। उन हथभागी बूढ़ियों के लिए कुछ कर सकने में सफल हों जाएं, ईश्वर से यही मनाओ, गीता ने उन्हें समझाया। 'और फिर सिर्फ आमारबाड़ी की बूढ़ियां तीनों के जेहन में समां गईं..।'

वे बूढ़ियां जो आंखों में निराशा का गहरा अंधेरा और दिल में हताशा का उमड़ता सागर लिए एक-एक करके आश्रम में वापस लौट आईं थीं, उनकी गुहार निष्फल रही थी। अज्ञात कुल-गौत्र की विधवा के दाह संस्कार की याचना को सभी वर्णों ने बड़ी निर्ममता से नकार दिया था। वृंदावन की संकरी गलियों में घंटों भटकने और सिर पीटने के बाद भी परिणाम शून्य ही रहा।

शाम का धुंधलका पसरने को था और आसन्न रात्रि का भय उनकी चेतना के प्रकाश को धीरे-धीरे खत्म कर रहा था। चिंता सिर्फ मुर्दे के साथ रात काटने की नहीं थी, गर्मी की वजह से उसके बासीपन की गति देखकर थी। न कोई बर्फ की सिल्लियों का इंतजाम, न किसी धूपबत्ती-अगरबत्ती की सुगंध से मौत की गंध को दबाने की चेष्ठा।

जिन 60 से 105 साल की बूढ़ियों के ‍लिए अपना जांगड़ (शरीर) ढोना भी दूभर था, वे मृत देह को घेरकर नि:शब्द बैठने के सिवाय और क्या कर सकती थीं? शब्दों के साथ उनकी आंखों के आंसू भी सूख गए थे, मुंह जुठारने की कौन कहे। दोपहर बाद तक उनके मुंह में पानी तक नहीं गया था...और कहीं आसपास ढोल-मृदंग की थापों पर युवकों का दल झूम रहा था- 'आज बिरज में होली रे रसिया...'

'आमारबाड़ी' की विधवाओं की आज ऐसी होली थी कि धूल-धक्कड़ के गुलाल और अवसाद की कालिमा ने उनके चेहरों को बदरंग बना दिया था। गहरी चुप्पी तोड़ते हुए अचानक लखीदासी चीत्कार उठी- 'कृष्ण की नगरी से धर्म-कर्म विदा हो गया सप्तदल, आखिर तेरी अर्थी उठ नहीं सकी।'

आनंददासी भी बिलख उठी- 'तेरी काया का बोझ क्या सचमुच इतना ज्यादा था सखी कि समूचे वृंदावन से चार मर्द भी उसे ढोने का बूता नहीं दिखा सके।' आनंददासी ने अपना मुंडित सिर पीट लिया- 'मरे पशु की चमड़ी उधेड़ने के लिए खबर पाकर कसाई दौड़ा चला आता है, तेरी मिट्‍टी (देह) का वह मोल भी नहीं आंका गया बहना।'

बूढ़ियों का यह प्रलाप अभी और चलता, तभी आवाज सुनाई दी- 'मत रोओ माई जी, आपकी मदद के लिए हम लोग आ गई हैं। मदद? मरते हुए प्राणों की यह संजीवनी कौन लाया? बूढ़ियों ने अपनी अंधी-चुनी आंखों से आवाज की दिशा में देखा- 17-18 साल की तीन लड़कियां अपने हाथों में दाह संस्कार का सामान लिए हुए खड़ी थीं। गीता, अनसूया और दीपा।

बूढ़ियों को अपनी ओर देखता पाकर गीता कोमल कंठ से बोली- 'हमें शवयात्रा की तैयारी तुरंत करनी होगी।' लेकिन तुम लोग...दीपा ने उन्हें दिलासा दिया- 'हम लोग आपकी हितैषी हैं, सब कुछ संभाल लेंगीं। आप सब सिर्फ हिम्मत बटोरिये। बिटर-बिटर ताकती बूढ़ियां जैसे इस दैवीय सहायता पर सहसाविश्वास नहीं कर पा रहीं थीं।

'श्मशान घाट काफी दूर है मांजी, देर मत करिये', अब अनसूया ने 105 साल की लखीदासी के कंधे का आत्मीय स्पर्श किया, मानो वो सोते से जाग गई। इसके बाद बगैर कुछ कहे-सुने वे स्त्रियां अपने काम में जुट गईं। तीन किशोरियां और शेष बूढ़ियां। काम भी ऐसा, जिसे करने की उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। कोमलांगी मानकर जिस काम से आज तक उनकी जाति को पुरुषों ने हमेशा दूर रखा था। टिकड़ी तैयार करना, शव को उस पर लिटाना, बांधना और कंधे देकर श्मशान तक ले जाना...

अनाड़ी हाथों को ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। काम में कोर-कसर भी छूटी, लेकिन अटूट हौसला पूरे वक्त कायम रहा। तीनों लड़कियों के साथ-साथ शव को अपना चौथा कंधा दिया 105 साल की लखीदासी ने। 'राम नाम सत्य है' के कोमल किंतु दृढ़ कंठों के उद्‍घोष के साथ आखिरकार सप्तदल चार कंधों पर सवार होकर शान से श्मशान चल दी...

झुकी हुई कमर, निस्तेज नजर वाली ये दीन-दु:खी विधवाएं पीछे चल पड़ीं, जिन्होंने अपनी मृत साथिन को आखिरी विदाई देने की मानवीय संवेदना अपने ह्दय में महसूस की थी। यह सिर्फ शवयात्रा नहीं, अल्ट्रासाउंड के बाद मादा भ्रूण को गर्भ में ही नष्ट करा देने की साजिश से लेकर औरत को चिता पर चंद अंगारे न दे सकने की पुरुष वर्ग की खुदगर्जी और संवेदनहीनता के खिलाफ स्त्रियों का एकजुट जातीय प्रदर्शन था यह। कम से कम उन सभी को उस वक्त ऐसा ही लगा था...

चूंकि श्मशान घाट दूर था और अर्थी को उठाने वाले कंधे नाजुक थे, इसलिए 10 कदम के बाद उन्हें कंधे बदलने पड़े, पर उनका हौसला कभी नहीं टूटा। हताशा एक बार भी हावी नहीं हुई। मंजिल दूर होने पर भी अलक्षित नहीं है, उन्हें मालूम था। श्मशान पहुंचकर लड़कियों ने ही शवदाह के लिए लकड़ियां खरीदीं, सबने मिलकर सप्तदल की चिता सजाई, वेदमंत्र उन्हें याद नहीं थे और शायद उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं थी। लखीदासी ने शव की प्रदक्षिणा की और चिता को मुखाग्नि दी। देखते ही देखते लपटें आसमान चूमने लगीं, कई जोड़ी आंखें एक बार फिर नम हो आईं।

अचानक पाषाण-सी खड़ी लखीदासी में तनिक स्पंदन हुआ। उसने दोनों हाथ जोड़े और जोर से चीख पड़ी- 'तेरी सौगंध सप्तदल, आज से आमारबाड़ी की कोई नारी अपने अंतिम संस्कार के लिए किसी मर्द की मोहताज नहीं होगी। दर-दर गिड़गिड़ाने के बजाय हमीं लोगों के हाथों स्वाभिमान से हमारा भी शवदाह होगा...फूल चुने जाएंगे और पवित्र नदियों में विसर्जित किए जाएंगे...'

पास खड़ी गीता ने भी अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा- 'सप्तदल यह सिर्फ तुम्हारी चिता नहीं है, जलती हुई होली है। तुमने अपने मरने के लिए सचमुच बहुत खास दिन चुना था। पूरे वृदांवन में ऐसी 'होली' आज तक जली नहीं होगी...दीपा बुदबुदाई, अनसूया सिर्फ हाथ जोड़े खड़ी रही। वातावरण में बूढ़ियों की सिर्फ दबी-दबी कुछ सिसकियां थीं...
(प्रस्तुति : सीमान्त सुवीर)

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