कहानी : मोहभंग



आज दो महीनों बाद कुसुमताई अपने घर इंदौर लौट रही थीं। मुंबई स्टेशन पर का इंतजार करते हुए अपने सामान की देखभाल करते हुए उनकी नजरें चारों ओर घूम रही थीं। कभी ठेले पर बिकते वड़ापाव व उस पर बैठीं मक्खियां देख मन घृणाभाव से भर जाता तो युवा-युवतियों की निकटता व सभ्यता व संस्कृति को लजाता परिधान देख वे स्वयं लज्जित हो उठतीं।
किसी में लटकते लोगों की भीड़ से उन्हें घबराहट होती तो मासूम बच्चों को गोद में लिए भीख मांगतीं स्त्रियों को देख करुणा का भाव उपज रहा था। उनके पति कर्णिक साहब, जो 20 वर्ष पूर्व जिलाधीश के पद से निवृत्त हुए थे, बेंच पर बैठे ऊंघ रहे थे।

बुढ़ापा हर जीवन की सच्चाई है व अपने साथ शारीरिक व्याधियां भी लाता है जिससे कमजोरी से उपजी असहायता का भाव गहराता है। इस कटु सत्य को अपने वैवाहिक जीवन की 55 वर्ष की यात्रा के साथ-साथ चल रहे आध्यात्मिक चिंतन व पठन-पाठन ने अच्छी तरह आत्मसात करना सिखा दिया था अत: वे दोनों अच्छी तरह अपने बहू-बेटे के साथ बड़े सामंजस्य से अपना बुढ़ापा जीते हुए खुशहाल जिंदगी जी रहे थे व हमेशा ही बच्चों से प्यार व मिलते रहने के लिए ईश्वर का शतश: धन्यवाद देते रहते थे।

सामने बेटी सुषमा, पति शिरीष को कई हिदायतें दे रही थी। वह उन्हें पहुंचाने मात्र दो दिनों के लिए इंदौर आ रही थी, पर ऐसा लग रहा था मानो दो-चार बरस के लिए घर छोड़ रही हो। शिरीष भी बड़े ध्यान से उसकी हिदायतों पर सर हिला रहे थे। दोनों की आत्मीयता देख कोई कह ही नहीं सकता कि महीनेभर पहले ही बेटी का ब्याह निपटाया है। सुषमा भी 50 पार हो गई थी, पर मुश्किल से 38-40 की लगती। शादी में भी सभी उसे गरिमा की मां नहीं, बड़ी बहन समझ रहे थे। शिरीष का हंसमुख स्वभाव व जिंदादिली उन्हें सदा प्रभावित करती। अपनी बेटी की सुंदरता व अपने जंवाई का उसके प्रति इस उम्र में भी वही आसक्ति व प्रेम उन्हें गर्व की सुखद अनुभूति से भर देता था।

उन्हें बैठे-बैठे अतीत के 30 वर्ष पुराने दिन याद आए, जब बड़ी धूमधाम से उन्होंने सुषमा का ब्याह किया था। कर्णिक साहब मंदसौर में असि. कलेक्टर के पद पर कर्तव्यरत थे। बड़ा-सा बंगला, ढेरों नौकर-चाकर। हालांकि कर्णिक साहब अत्यंत कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार थे फिर भी पद पर होने की जायज सुविधाएं तो थीं ही। लाख मना करने पर भी सारे अधिकारी व्यवस्था में लगे थे। दोनों बेटे छोटे थे, बहुएं कैसी मिलेंगी, पता नहीं पूछेंगी भी या नहीं? फिर बेटी तो कलेजे का टुकड़ा है, उसे जितना दूं कम है। यही सोच-सोचकर उन्होंने सुषमा को गहनों-कपड़ों में लाद बिदा किया था।

शिरीष की पोस्टिंग मुंबई में थी फिर दहेज देने का महाराष्ट्रीयन परिवार में होने से न रिवाज था, न ही आवश्यकता। फिर भी उन्होंने सुषमा के नाम से रखे 3 लाख रु. की एफडी बनाकर उसे सौंप दी थी यह कहते कि 'जरूरत का हर सामान अपनी पसंद का ले लेना।' सुषमा की शादी की धूमधाम उनकी रिश्तेदारी में बरसों याद की जाती रही जिसका एहसास उन्हें इतने वर्षों बाद भी संतुष्ट व गर्वित कर रहा था।

ट्रेन आने का समय हो गया था। प्लेटफॉर्म पर भगदड़ मची थी। सुषमा व शिरीष ने कुली की मदद से सामान एसी कोच में रखवाया व कर्णिक साहब का हाथ थामे धीरे-धीरे अपना मंगलसूत्र व चूड़ियां संभालते हुए वे डिब्बे में चढ़ गईं। शिरीष ने चादर-तकिया जमाकर कहा- 'दादा आप लेट जाइए' और कर्णिक साहब ने तुरंत आज्ञाकारी बालक की तरह हाथ-पैर पसार दिए।


कुसुमताई ने कहा- 'ऐसी भी क्या जल्दी है? ट्रेन चलने तो देते?' लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। जिंदगीभर उन्होंने कुसुमताई की हिदायतों व नसीहतों को गर्दन हिलाकर सुना भर था लेकिन किया वही जो मन चाहा। कुसुमताई मन ही मन सोचती कि बुढ़ापे में व्यक्ति फिर बच्चा बन जाता है। ट्रेन खिसकने लगी। शिरीष हाथ हिलाकर बिदा कर रहे थे। उनकी आंख से ओझल होते ही सुषमा ने अपना पर्स संभाला व सामान की गिनती लगा आश्वस्त होते ही बोली- 'आई तू भी लेट जा थक गई होगी', फिर किताब पढ़ने लगी।

कुसुमताई अधलेटे हो सामने लेटे कर्णिक साहब को देखते-देखते अतीत में खो गईं। कर्णिक साहब, बच्चों के दादा अब बुढ़ापे व बीमारी से कृशकाय हो गए हैं। 16 साल की उम्र में जब उनके साथ फेरे लिए थे तब वे 20 या 21 के नौजवान थे। बीएएलएलबी दामाद पा उनके पिता गर्व से फूले नहीं समाए थे। ऊंचा कद, गोरा रंग, गठीले बदन के अलावा चेहरे पर शिक्षा के तेज व आत्मविश्वास के प्रकाशपुंज से भरे व्यक्तित्व को पति के रूप में स्वीकारते हुए वे धन्यता महसूस करती रही थीं।


विवाह के बाद उन्होंने पीएससी की परीक्षा में बैठने की इच्छा जताई। कुसुमताई ने पूर्ण समर्पण से उनकी मदद की जिसका एहसान वे ताउम्र मानते रहे थे। वैसे कम बोलने वाले, पर ईमानदार व मेहनती होने के साथ-साथ मानवता का भाव उनमें कूट-कूटकर भरा था। हर किसी की परेशानी से विव्हल हो मदद के लिए परोक्ष रूप से सदा तैयार रहते अत: वे अत्यंत लोकप्रिय प्रशासक रहे।

उनके द्वार हर आम आदमी के लिए सदा खुले रहते। कई जिलों में घूम-घूमकर नौकरी करते, प्रमोशन पाते वे जिलाधीश के पद से निवृत्त हुए तो इंदौर में किसी दोस्त के आग्रह पर लिया 2400 स्क्वे. फीट का प्लाट मात्र ही उनकी जमा-पूंजी था व बड़ा बेटा एमएस होने में था व छोटा इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में। दोनों बेटों की फीस, होस्टल व पुस्तकों का खर्च- इसी में आधी तनख्वाह निकल जाती थी।


सरकारी क्वार्टरों में रहते व सामान्य से सामान के साथ उन्होंने अपनी जिंदगी निकाल दी थी व सबसे कहते- 'बेदाग नौकरी में आत्मसम्मान को कभी बेचना नहीं पड़ा व किसी के दबाव में कोई फैसला लेना नहीं पड़ा। मेरे बेटे अपने पांव पर खड़े होने जा रहे हैं। सरकार ग्रेच्युटी व पीएफ का पैसा देगी व ताउम्र पेंशन! इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता है कि मैं अपनी पत्नी के साथ स्वस्थ रहूं व अपनी बागवानी व समाज से जुड़कर कुछ करने के ख्वाब पूरे कर सकूं। इतनी ही इच्छा बाकी है।'


कुसुमताई की आंखें कर्णिक साहब के मासूम चेहरे को देख भर आईं। सच में दिल पर कोई बोझ न हो, मन में कोई अपराधबोध न हो, तो इंसान के चेहरे पर आजीवन संतुष्टि का भाव बना रहता है, जो उन्होंने सदा ही कर्णिक साहब के चेहरे पर देखा था। आंचल की कौर से अंखियों को पोंछते हुए उन्होंने उठने का उपक्रम किया तो सुषमा ने कहा- 'आई, खाना खा लें क्या? देर से खाने पर दादा को तकलीफ होगी।' सुषमा ने दादा को उठाया। सबने खाना खाया व कुछ गप्पों के बाद सुषमा अपने पिता को सुलाकर सो गई।

कुसुमताई को ट्रेन में नींद नहीं आती थी एसी हो या फर्स्ट क्लास। वे रातभर सामान की चिंता करतीं। लेटे-लेटे ट्रेन की हिचकोलियों के साथ विचारों का समंदर लहरें मार-मार उन्हें अतीत में जबरन ले जा रहा था। सेवानिवृत्ति के बाद ग्रेच्युटी व अन्य पैसों से उन्होंने अपना मकान बनवाया व जीवन की समस्त आकांक्षाए पूरी करने का प्रयत्न किया। कर्णिक साहब ने तो मात्र पूजा घर व अपने लिए अध्ययन कक्ष की इच्छा जाहिर की व पूरा मकान दोनों बेटों की मर्जीनुसार बना।

मकान के उद्घाटन में अमित के कई साथी डॉक्टर आए थे। उसमें से एक थीं डॉक्टर अर्पिता। सुंदर-सी, हंसमुख, सीधी-सादी। सादगी देखकर लगा ही नहीं कि वे स्त्री रोग विशेषज्ञ बनने जा रही हैं। क्या जानती थीं कि बेटा दिल की डॉक्टरी में विशेषज्ञता हासिल करते-करते दिल भी दे बैठा है। अनजाने ही वे थोड़ी आहत हुई थीं। अर्पिता में कमी कुछ नहीं थी, पर सुषमा के विवाह के बाद से ही उन्होंने यह सपना संजोया था कि इतना सुंदर व लायक बेटा है तो दस जगह से रिश्ते आएंगे जिसमें से चुनकर मैं बहू पसंद करूंगी।

कुसुमताई ने जब अपनी वेदना कर्णिक साहब को बताई तो उन्होंने समझाया- 'आखिर बहू तो तुम उसी को बनाती न, जो अर्पित को पसंद आती, फिर दुख कैसा?'

उन्होंने तुरंत खुद को संभाला था व बड़ी धूमधाम से अर्पिता को बहू बनाकर लाई थीं। अर्पिता ने भी इतने सालों में कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था। घर के पास के खाली प्लॉट को खरीदकर नर्सिंग होम बना लिया था। छोटे अर्पण के आगमन के बाद तो उनकी झोली खुशियों से भर गई थी।

ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी थी। रात के अंधेरे में सब ओर निस्तब्धता थी। चढ़ने और उतरने वालों के अतिरिक्त सभी नींद के आगोश में सुध-बुध खोए थे। ट्रेन फिर चल दी। कुसुमताई ने करवट बदली। बुढ़ापे में सफर चाहे एसी में ही क्यों न हो, आनंद न होकर बोझ लगता है। कमर को सीधा कर थोड़ा आराम मिला व उनकी स्मृतियों के तार फिर झंकृत होने लगे।


सुषमा शादी के बाद जब भी मायके आती, वे कर्णिक साहब के पीछे पड़-पड़कर उसके लिए महंगे से महंगे तोहफे लाने की कोशिश करती। कभी सोने के टॉप्स, तो कभी हीरे की अंगूठी। कभी चूड़ी, तो कभी कंगन, साथ ही साड़ी अलग से। शिरीष के लिए भी कुछ न कुछ अवश्य भेजती।
सुषमा के जाने के बाद 2-3 महीने लग जाते घाटे का बजट सही रास्ते लाने में। कर्णिक साहब अपनी व्यस्तता में से कभी समय निकलता तो कुसुमताई को परेशान देख कह भी देते- 'हर बार इतना देने की क्या जरूरत है?' लेकिन कुसुमताई का मन नहीं मानता। उनकी यही इच्छा रहती कि मुंबई के घर में सुषमा को हर चीज अपने मायके की याद दिलाए।

अपने मायके के अभावों के कारण उन्हें मायके से कुछ नहीं मिला था। कर्णिक साहब संत स्वभाव के थे। ससुराल में भी कोई नहीं था, जो उन्हें उलाहना देता। पर पड़ोसी सखी-सहेलियां जब-जब अनायास ही मायके से मिले उपहारों की चर्चा करती, तो उनका मन आहत हो जाता। शुरू से ही वे घर की मालकिन ही रहीं, लेकिन उनके मन का एक कोना दुखी था। अपना यह दुख उन्होंने कर्णिक साहब से भी शेयर नहीं किया था।

लाख संपन्न होने पर भी हर स्त्री व बेटी की यही चाहत होती है कि साल में एक बार एक साड़ी तो उसे उसके मायके से मिले जिसकी गरमाहट वह ठंड में, तो ठंडक गर्मी में महसूस करे, जो उसे स्नेहबंध के साथ सुरक्षा व अपनत्व का एहसास कराए। अपने इस दर्द को मरहम लगाने के लिए ही वे सुषमा को ढेर उपहार देती रहती थीं।

कोई 5 वर्ष पहले उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। घर के डॉक्टर व घर का नर्सिंग होम। अर्पिता ने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद उनकी बहुत सेवा की थी, पर उनका मन सुषमा के लिए व्याकुल था।
एक दिन अकेले में उन्होंने कर्णिक साहब से पूछा- 'सुषमा कैसे नहीं आई? उसे खबर की थी या नहीं? बाद में नाराज होगी।'

उस समय कर्णिक साहब बात टाल गए लेकिन घर आने के बाद जब उन्होंने फिर वही बात दोहराई तो उन्होंने चिढ़कर उत्तर दिया- 'तुम्हारी लाड़ली को उसी वक्त फोन कर दिया था। उसने अर्पिता से चर्चा करके तसल्ली कर ली। पूछ रही थी- 'अभी आना जरूरी है क्या? अभी बच्चों की परीक्षाएं हैं। मैं फोन पर हाल पूछती रहूंगी। ऐसा ही कुछ हो तो मैं फ्लाइट से आ जाऊंगी।'
उस समय कुसुमताई सन्न रह गई थी। बाद में सुषमा अपनी सहुलियत से मिलने आई और 8 दिन रहकर वापस चली गई। उसने उन 8 दिनों में कुसुमताई का बहुत ख्याल रखा। उसकी लाड़ व प्यारभरी झिड़कियां भी कुसुमताई को संतुष्टि देतीं। वे उसका उस समय न आ पाना भी भुला बैठीं।

सुषमा के जाने का समय आया तो कुसुमताई ने कर्णिक साहब से कहा- 'सुषमा के लिए साड़ी मंगानी है।'

इस बार कर्णिक साहब थोड़े नाराज हुए थे व कहने लगे- 'बेटी मेरी भी है, पर यह कोई समय है? फिर हर बार महंगे उपहार देने की क्या जरूरत है? फिर अर्पिता भी तो है, वह दिन-रात सेवा करती है। उसे देने का ख्याल तुम्हें कभी नहीं आता?'
लेकिन कुसुमताई जिद पर अड़ी रहीं। उनका तर्क था- 'बेटी मेरे लिए अपनी गृहस्थी छोड़ खर्चा कर आई है, फिर बहू को क्या कमी है? उसे देता तो मेरा बेटा ही है। वह खुद भी कमाती है।' कर्णिक साहब खामोश हो गए थे।

आज अपने ही विचारों पर उन्हें शर्म आ रही थी। दो माह पूर्व जब वे इंदौर से मुंबई सुषमा के यहां आई थी तो उनके मन में अजीब-सा उत्साह था। उनकी नातिन की शादी तय हो गई थी। सगाई व तुरंत डेढ़ माह बाद शादी होनी थी अत: उन्हें सुषमा ने आग्रह से बुलाया था।
कर्णिक साहब इतने पहले से मुंबई जाने को बिलकुल तैयार नहीं थे लेकिन वे अपनी जिद पर अड़ी रहीं। अर्पिता ने भी दबे स्वर में समझाया- 'इतने पहले से जाकर आप क्या करेंगी? फिर दादा का सारा रूटीन डिस्टर्ब होगा और वे बोर हो जाएंगे।'

लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी थी और कर्णिक साहब को लेकर फ्लाइट से मुंबई पहुंची थीं। एयरपोर्ट पर सुषमा व शिरीष लेने आए थे लेकिन सुषमा के चेहरे के कृत्रिम स्वागत की औपचारिकता उन्हें खटक गई थी।
घर पहुंचकर अपने लिए अलग कमरा व सारी व्यवस्था देख वे गदगद हो गई थीं फिर 8 दिन तक रोज नए पकवान, रोज शाम बाहर की सैर वे खुश थीं।

उन्होंने कर्णिक साहब को अकेले में कहा- 'देखा, अपने घर में भी सारी सुख-सुविधाएं हैं, पर किसी को हमारे लिए फुरसत है क्या?'

कर्णिक साहब मुस्कुरा दिए थे। उस मुस्कुराहट का अर्थ आज वे समझ रही थी। 15 दिन बीतते ही सुषमा के व्यवहार में आया परिवर्तन वे महसूस करने लगी थीं, पर खुद को समझाती कि नहीं-नहीं, सुषमा दिल से चाहती थी कि मैं उसके घर आकर रहूं, मदद करूं।' फिर धीरे-धीरे वे अच्छी तरह समझ गईं कि वह मात्र औपचारिकता थी जिसे वे आग्रह समझ बैठी थीं।
शादी की तैयारी की प्लानिंग वह और शिरीष कर चुके थे। उनकी दखलंदाजी पर वह बात-बात में खीज उठती। कुसुमताई सोचने लगीं, बहू 20 वर्षों से साथ रहती है, कभी उन पर न खीजी थी, न उनकी उपेक्षा की थी। हर बात में उन्हीं से राय ली जाती व उनका निर्णय ही अंतिम होता।

आने-जाने वालों को सुषमा यही जताती कि आई-दादा के आने से उसे कितनी मदद मिल रही है लेकिन उसका व्यवहार उन्हें अपेक्षित व आहत करता रहा। अपनी बेटी के व्यवहार की शिकायत करे भी तो किससे? धीरे-धीरे शादी वाला दिन भी आ गया। इंदौर से अमित सपरिवार आ पहुंचा। अमित व अर्पिता ने पूरा इंतजाम अपने हाथों में लेकर सुषमा को मुक्त कर दिया।
शादी बड़े होटल में थी। बड़े उत्साह से वहीं रहने के हिसाब से एक छोटे सूटकेस में उन्होंने अपना व कर्णिक साहब का सामान पैक कर लिया।

पानी पीने के लिए वे किचन की ओर बढ़ ही रही थीं तभी सुषमा के शब्द उनके कानों में पड़े। वह अपनी भाभी से कह रही थी- 'अर्पिता, किसी तरह शादी के बाद आई-दादा को घर भेज देना। नए समधियों के सामने दादा ने कुछ उल्टा-सीधा बचपना कर दिया तो?

अर्पिता ने कहा- 'ताई, आप फिक्र मत कीजिए। मैं और अमित उन्हें संभाल लेंगे।'
कुसुमताई का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। जिस बेटी को उन्होंने सबसे ज्यादा लाड़-प्यार दिया, जिंदगी का हर सुख उपलब्ध कराया, जिसने पिता की कलेक्टरी के ठाठ-बाट सबसे ज्यादा भोगे, जिसे देते वक्त सदा यह एहसास रहा कि वह मेरा ही रूप है, उसने एक क्षण में ही उनकी हैसियत व महत्व को समझा दिया। उसे अपनी अशिक्षित मां व वृद्धावस्था से जीर्ण-शीर्ण हुए पिता नए समधियों के सामने लज्जित करने वाले लग रहे थे।

मेहमानों के सामने तमाशा न हो अत: वे अपमान का कड़वा घूंट पीकर भी चुप रहीं। लेकिन फिर अर्पिता के लाख आग्रह के बावजूद न उन्होंने अच्छी साड़ी पहनी और न ही गहने। पूरी शादी में वे कर्णिक साहब को संभालतीं व उनका हाथ पकड़कर एक स्थान पर बैठी रहीं। वे मन ही मन अर्पिता के शब्द अनायास दोहराने लगीं, जो उसने अपने नर्सिंग होम के उद्घाटन के समय शहर के प्रतिष्ठित डॉक्टर से पहचान कराते समय कहे थे- 'ये हैं मेरे और अमित के आई-दादा, इन्हीं के परिश्रम व त्याग की वजह से आज हम ये दिन देख रहे हैं।' वे शब्द तब मात्र औपचारिकता लगे थे और आज सुषमा के व्यवहार से उनकी सार्थकता सिद्ध हो रही थी।
सुषमा अपनी बर्थ पर सो चुकी थी। कर्णिक साहब दुनिया से बेखबर शांति से हल्के खर्राटे ले रहे थे।

शादी होते ही अमित, अर्पिता व अर्पण कार से लौट गए। कर्णिक साहब को इस उम्र में कार से ले जाना संभव नहीं था फिर सुषमा वादे के मुताबिक 8 दिनों बाद उन्हें छोड़ने वाली थी अत: मजबूरन उन्हें रहना पड़ा था।

उन 8 दिनों में उन्होंने मन ही मन अर्पिता को हजारों बार याद किया था। हर बात में उनकी राय, उन्हें महत्व देना वह भी स्वाभाविकता से। घर में सब्जी क्या बनेगी? से लेकर नर्सिंग होम की डिजाइनिंग तक में उसने उन्हें महत्व दिया था। उन्हें जिन चीजों की समझ नहीं होती, उन्हें भी वह समझाती फिर पूछती- 'अब बताइए क्या करूं?' दादा तो उसके लिए भगवान थे, दोस्त भी थे और संरक्षक भी। कभी नर्सिंग होम का कोई टेंशन होता तो सबसे पहले उन दोनों को बताती।

कर्णिक साहब की बढ़ती उम्र के साथ बढ़तीं शारीरिक व्याधियों व उनसे उपजी मानसिक परेशानियों को उसने डॉक्टर होने के कारण बड़ी सहजता से समझा था। हर बार वह धीरज बंधाती। पर उसके व्यवहार की इन खूबियों को कभी कुसुमताई ने प्रशंसा के काबिल भी नहीं समझा था।

जब कभी-कभी कर्णिक साहब अपना कंट्रोल खोने की वजह से कपड़े गीले व गंदे भी करते तो वह बड़ी सहजता से वार्डबॉय को भेज सफाई करवा देती या स्वयं ही सबकुछ कर देती।
अर्पिता की सारी अच्छाइयों के प्रति कृतज्ञ हो उनके मन में अनायास प्रेमभाव जागृत हो गया व उनकी आंखें नम हो उठीं व कब आंख लगी, पता ही नहीं चला।

इंदौर स्टेशन आने को था। गाड़ी धीमी होते हुए रुकने लगी। उनकी नजरें प्लेटफॉर्म पर थीं। अर्पिता, अर्पण को लेकर लेने आई थी। गाड़ी के रुकते ही उनका मन हुआ कि अर्पिता को खींचकर गले लगा लूं, पर अर्पिता इस सबसे बेखबर दादा को संभालने व सबके पांव छूने में व्यस्त थी।

घर जाकर चाय पीते समय सुषमा कह रही थी, 'मैं और शिरीष तो आई-दादा को 6 महीने नहीं आने देते, पर किसी ने कुछ नहीं कहा।'
कुसुमताई की इच्छा हुई कि वे सुषमा के चेहरे से झूठ का यह आवरण हटा दे, लेकिन वे चुप ही रहीं यह सोचकर कि उनका आज हुआ है। शायद सबका पहले ही हो चुका हो।

शाम को कर्णिक साहब ने पूछा- 'कितने पैसे दूं? कल सुषमा को बिदा करना है न?'

कुसुमताई ने कहा- 'कोई जरूरत नहीं है। अभी तो शादी में दिया है फिर मेरी एक बेटी और भी तो है।'

इस बार कर्णिक साहब फिर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

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