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हि‍न्दी कहानी : प्रतिफल



डॉ. साधना सुनील विवरेकर 
आज सुबह प्रतिदिन के अनुसार जब मार्निंग वॅाक से लौटी तो याद आया आज "आती" का जन्मदिन है। अजब संयोग है कि 6 भाई-बहनों में आती व पापा का जन्मदिन एक ही दिन आता है। मां को गुजरे 10 वर्ष बीत गए, पर सुमन आती ने कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी। हर तीज त्योहार बच्चों की शादी व हर सुख दुख में साया बन, वे हमारे साथ रही हैं। उनके बेटे आशीष को मैं बचपन से राखी बांधती आई हूं। उसने भी सगी बड़ी बहन का सम्मान देकर रिश्तों की डोर को मजबूत बनाए रखा है। पापा की फोटो को शो केस से बाहर निकाला, नहा धोकर हार चढ़ाया, भोग लगाया व पापा की यादों से मन भर आया नेत्र सजल हो गए। माता पिता का साथ स्नेह संरक्षण व ममता एक अनमोल धरोहर होती है व यादें खजाना, उनके बाद भी हम जीते हैं। पर उनकी कमी में एक बड़ी रिक्तता का एहसास बनाए रखता है जिसे कोई पूर्ण नहीं कर सकता।
 
पापा से जुड़ी हर घटना में "आती" थी क्योंकि हर बरस दोनों का जन्मदिन साथ आता, साथ मनता रहा। आती पास रही या दूर, उनकी याद सदा आती। सारे काम यंत्रवत होते रहे और मन "आती" की यादों में गहराता गया। पापा घर के सबसे बड़े, आती सबसे छोटी। बीच में दो भाई-दो बहनें, सबमें अगाध प्रेम व स्नेह, कोई अपेक्षा नहीं। तीज त्यौहार व मायके आने पर 5-10 रू. व सूती साड़ी पर बिदाई। वे भी हम भतीजे-भतीजियों को छोटे-छोटे खिलौने या 2-2 रू. और भाभियों को ब्लाउज पीस तो कभी चूडियों से नवाजतीं। अत्यंत सादगी का, हमेशा निभ सके ऐसा लेन-देन होने से रिश्तों में मधुरता आज तक कायम है। आत्याओं के वे उपहार, जो स्नेह व प्रेम के कारण अनमोल थे, बचपन की यादों में रच बस गए है। 10वीं बोर्ड में प्रथम श्रेणी में आने पर, किसी डिबेट व निबंध प्रतियोगिता में सफलता पर या किसी भी क्षेत्र में थोड़ी-सी भी विजय हासिल होने पर आत्याओं व काकाओं से मिले उपहार, प्रोत्साहन व प्रशंसा से भरी चिट्ठियां व मिलते ही गले लगा न्योछावर किया प्रेम, उनकी आंखों में उमड़ता गर्व का भाव, निष्पक्ष रूप से निस्वार्थ भावना से दिया गया अपनत्व, उनके प्रति प्रेम श्रध्दा व आदर मन की गहराईयों से महसूस कराता है और आजीवन रिश्तों में मधुरता बनाए रखने को सक्षम है। मायके आने पर सदा मां व काकी से सहेलियों जैसा व्यवहार उनके लिए मायके के द्वार, स्वागत के लिए आतुर होने के लिए जिम्मेदार बना। आत्याओं का आना हम बच्चों के लिए तो हमेशा पर्व से कम नहीं था क्योंकि रोज नए पकवान जो बनते । मां व काकी का उत्साह आजी से किसी माने कम नहीं होता था। काका व आत्याओं को बीच खूब हंसी ठिठोली व चिढ़ाना चलता रहता।
 
आजी बताती- सुमन बचपन से ही कमजोर थी, कभी टाईफाईड हुआ तो कभी पीलिया। गोरी चिट्टी, लंबी कद काठी पर वजन कम अत्यंत दुबली, अतः बाबा उसके लिए व उसके खाने को लेकर सदा चिंतित रहते। सुमन को अधिक लाड़ प्यार व उसके लिए अधिक चिंता, अन्य बच्चों की शिकायत का विषय था। सब बच्चों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की, सुमन आती ने भी हिन्दी में एम.ए किया।
 
धीरे-धीरे सभी की शादियां हुई, बढ़ते गए, तीज त्यौहारों पर आना जाना चलता रहा। दोनों बड़ी आत्याओं की अपेक्षाकृत बड़े खानदानों में शादियां हुई जहां संपन्नता अधिक थी, ऐशो आराम के साधन उपलब्ध थे, गहने कपड़ों की कमी नहीं थी, पर सुमन आती की शादी साधारण परिवार में तय हुई। ससुर स्कूल में प्रधान अध्यापक - अंग्रेजी के प्रगाढ़ विद्वान, पर मुफ्त में सभी को पढाते। फूफाजी भी स्कूल में व्याख्याता दिखने में भी आती से उन्नीसा। आती दुबली वे स्थूल, आती गोरी चिट्टी वे गहरे श्याम वर्ण के, आती सबसे छोटी वे दो भाई व तीन बहिनों में सबसे बड़े, यहां बड़ा सा अपना घर, वहां तीन कमरों का किराए का घर। शादी के समय जब आती की मर्जी पूछी तो उन्होने स्पष्ट कहा - लक्ष्मी भाग्य में हो तो, मेहनत से आ ही जाएगी व जिम्मेदारी तो पति के साथ हर प्रकार की मेरी भी होगी। लोग अच्छे समझदार व प्रेम करने वाले होने चाहिए।  फूफाजी से हुई संक्षिप्त मुलाकात में वे उनकी स्पष्टवादिता, साफगोई के साथ हरपल हंसते रहने की, सादगी व स्नेह से स्त्री के प्रति सम्मान रखने की भावना व मानसिकता को पहचान गई थी।
 
आफिस जाने का वक्त हो गया था। कार चलाते हुए भी आज मन बार-बार आती के बारे में ही सोच रहा था क्योंकि सुबह-सुबह ही भैया ने फोन पर बताया आती ने अपने हिस्से का घर काका के नाम कर दिया है। सामान्य से परिवार में विवाह होने से आती को सदा किफायत व सादगी से ही रहना पड़ा था। उसने भी सरकारी स्कूल में व्याख्याता की नौकरी कर ली थी। ससुर जी रिटायर हो गए थे, दस जनों के परिवार में ननदों, देवरों व सास-ससुर की जिम्मेदारी वे बड़ी समझदारी व अपनत्व से निभा रही थी जिसके बदले उन्हें सबका प्यार आदर व स्नेह सम्मान मिल रहा था, पर आर्थिक अभावों की छाया उनके कपड़ों की सीमित संख्या व गले की काली पोत व हाथ की कांच की हरे रंग की चूड़ि‍यों से झलकती। मायके से मिले गहनों को भी उन्होंने लॉकर में रख दिया था, वक्त जरूरत पर देवर की पढ़ाई या ननद की शादी के लिए।
 
मायके आने पर जब आजी ने अपनी ओर से सोने के मंगलसूत्र बनवा देने की पहल की तो आती का जवाब था, इन्होने जो अपनी हैसियत से पहनाया है वही मेरा गहना है। फिर मेरी सास काली पोत पहने और मैं सोना तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा। जब हमारी हैसियत होगी, ये मुझे सोने से लाद देंगें यह मुझे विश्वास है।पति के प्रति आती का स्नेह सम्मान व स्वाभिमान देख सब खुश हो गए थे।
 
तभी आती व फूफाजी का तबादला दूसरे शहर में हो गया। दो घरों की गृहस्थी का बोझ आती ने बड़ी सरलता व उदारता से बांटा था। उन्होंने फूफाजी से कहा ससुरजी की पैंशन से उस घर का खर्चा चलना मुश्‍कि‍ल है। आपकी पूरी तनखा वहां भेज दीजिए, मेरी तनखा से यह घर चलाएंगे। उनकी इस सोच का पता उनकी ननदों ने ही कुछ वर्ष पूर्व बातों बातों में दिया था। यह सिलसिला 5-7 वर्षो तक चला। आती व फूफा ने मेहनत कर पैसा जोड़ बहनों की शादी की, देवर को पढ़ाया। इसी बीच उनका बेटा हुआ और घर में रौनक आई।
 
आफिस का काम निपटाते-निपटाते लंच का समय हो गया। लंच ब्रेक में अपनी सहयोगियों से आती के बारे में चर्चा हुई तो सभी कहने लगी -  अपने हाथ आई चीज छोड़ने का जज्बा बहुत बिरलों में होता है।
 
आर्थिक से झूझते हुए भी, आती ने सभी से रिश्तेदारी अपने तरीके से निभाई। ससुर का देहांत होने के बाद फूफाजी का तबादला होने व बेटे के छोटे होने से उन्होंने नौकरी छोड़ दी। सास की सेवा करना व बेटे को बड़ा करना अपना धर्म मान लिया, पर ईश्वर ने उनका साथ दिया और उसी शहर में एक प्रायवेट कालेज में उनकी नौकरी लग गई। पर आती का संघर्ष खत्म नहीं हुआ था। उनकी सास को पैरालिसिस हो गया, अब सास का सबकुछ कर कालेज की नौकरी करना और भी मुश्किल हो रहा था। आशीष् की पढ़ाई, घर के काम, नौकरी व सास का सबकुछ बिस्तर पर करना दो तारों की कसरत हो रहा था। हम जब कभी आती से मिलने जाते, उसके प्रति श्रध्दा से भर जाते। आती को हर पल खटते व परिश्रम करते देख पड़ोसी व रिष्तेदारों ने सलाह दी व फूफाजी ने प्रस्ताव रखा - मां को शांति निकेतन में रख देते हैं। पर आती ने सजल नेत्रों से दृढ़ता से इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। बेटे बहू व पोते के होते हुए, मां कहीं ओर रहे, यह मुझे बर्दाश्त नहीं होगा, न ही मैं चैन से जी पाउंगी। और फिर दस वर्ष तक पूरे परिवार ने उनकी घर पर ही सेवा की। पूरा गांव, कॉलेज आती की तारीफ करते नहीं थकता।
 
एक दिन अचानक फूफाजी को सिरदर्द हुआ, थोड़ा सा चक्कर आया व डॉक्टर ने बताया ब्रेन टयूमर है। आती ने हिम्मत नहीं हारी व इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में पढ़ रहे बेटे की सहायता से जीवन भर की जमापूंजी लगा मुंबई ले जाकर उनका इलाज करवाया। ईश्वर की असीम कृपा से फूफाजी को जीवनदान मिला। वे हमेशा कहते - यह सब सुमन की प्रार्थना, कठोर व्रत तपस्या व दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ मुझमें आत्मविश्वास बनाए रखने का ही नतीजा है, जो मैं स्वस्थ्य हूं। सुमन ने मेरे ऑपरेशन थियेटर में जाते समय रोने की बजाए बड़ी दृढ़ता से कहा था - आपको मेरे लिए अच्छा होना है, हमें घर बनाना है आशीष की शादी करके पोते-पोती खिलाना है व शादी की पचासवीं सालगिरह मनाना है। और सच में ईश्वर की कृपा से आती को यह सब नसीब हुआ। ब्रेन टयूमर के ऑपरेशन के बाद भी फूफाजी स्वस्थ रहे और हम सबने उनकी शादी की पचासवीं सालगिरह धूमधाम से मनाई।
 
मुझे याद आने लगा दादाजी की तेरहवीं के बाद जब वसीयत खुली तो पता चला दादाजी ने अपने मकान का एक हिस्सा आती के नाम किया था। तीन बेटों व एक बेटी में मकान बांट दिया था अन्य दो बेटियों को कुछ भी नहीं। दादी ने कहा चूंकी शादी के वक्त उन दोनों को अच्छे संपन्न परिवार में ब्याहा और सुमन का अपना घर भी नहीं था अतः दादाजी ने यह निर्णय लिया।
 
दादाजी के इस निर्णय को सबने बड़ी सहृदयता से स्वीकारा। दोनों बहनो ने न कोई तकरार की, न भाईयों ने गिला। कुछ ही वर्षो में आती ने सोंसर में अपना घर बना लिया था। बाद में आशीष की नौकरी इंदौर में लगी व उसकी शादी भी हो गई। वह किराए से रहने लगा, तभी आती ने सौंसर का बड़े शौक से बनाया घर बेचा व बेटे बहू को किराया न देना पड़े इसलिए इंदौर में घर बनाया।
 
दादाजी के दिए मकान को सुधार कर किराएदार रख दिए। 3-4 साल निकल गए। मन में विचार घुमड़ रहे थे, अचानक आती ने घर काका के नाम क्यों कर दिया । मैं आती से मिलने कॉलेज के बाद उनके घर पहुंची। जन्मदिन की बधाई देने के बाद बातों ही बातों में पूछा- यह साहसी निर्णय क्यों लिया? पिता की संपति में हिस्सा न मांगने के उदाहरण व उदारता कई लोगों के द्वारा देखी थी पर हाथ आई हुई संपत्त‍ि छोड़ने का साहस कौन दिखाता है? वह भी तब, जब कानूनन आपका अधिकार है। फिर फुफाजी आशीष व बहू सब राजी कैसे हुए?  
 
आती का जवाब था - जीवन भर जो संघर्ष मेरे नसीब में था मैंने किया। भले ही मेरा ससुराल संपन्न नहीं था पर प्रेम व स्नेह मुझे भरपूर मिला। तेरे फूफाजी ने जो सम्मान सहयोग व समानता का दर्जा दे सदा मेरा साथ दिया उससे मुझे अत्यंत सुख व सुकून नसीब हुआ। बाबा के मन पर मेरे संघर्ष का बोझ था अतः उन्होंने अपने तरीके से मुझे मकान में हिस्सा दे उतारा। उनका सम्मान करने के लिए मैंने अपना हिस्सा रख लिया था फिर भी मेरे भाई बहनों ने कभी गिला शिकवा नहीं किया व मुझसे वैसे ही प्रेम स्नेह संबंध रखे। एक ही चिंता मन में थी। अपना घर बेच यहां बेटे बहू के पास आए हैं। पता नहीं आगे क्या हो, अब संघर्ष करने की हिम्मत नहीं, कम से कम पिता की छत का तो आधार होगा।
 
तेरे फूफाजी तो बरसों से पीछे पड़े हैं - हमें कुछ नहीं चाहिए सब लौटा दो। इस बार आशीष व बहू ने भी कह दिया -  आई हमारे पास भगवान का दिया सबकुछ है आप चाहे तो मकान लौटा दीजिए।
 
अब, जब मुझे तसल्ली है कि मेरे जीवन भर का संघर्ष सफल है। मेरे पास रिश्तों की अपार संपत्ति है व मेरे बेटा, बहू, पोता हमारे प्रेम का प्रतिफल, हमें पल-पल हमारा ध्यान रखकर, सम्मान देकर रख रहे हैं तो फिर इस निर्जीव संपत्ति को रखकर मैं क्या करूं? जनम भर तेरे काका ने मेरे आई बाबा को अपने साथ रखकर उनकी सेवा की थी। मकान के इस हिस्से पर वास्तविक हक उनका था, अतः मैंने उनको लौटा दिया। मैं सोच रही थी सबको अपना-अपना मिल गया, रिश्तों की जीत के एहसास से आंखे सजल हो गई।
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